पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/७३०

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वसिष्ठ विश्व देवोंने दैव्यस्तोत्र द्वारा पुकरमें तुमो धारण | ऐन्द्र महाभिषेक द्वारा सुहास पैजवनशे ममिपित किया किया था। प्ररए शासम्पन्न पसिष्ठने दोनों (लोक) था। इसोसे सुदास पैजयनने समस्त पृथ्वी जय कर को ज्ञान पर सहस्र दान किये थे। पम द्वारा यिस्तोण अश्वमेध यज्ञ किया था। पस्नग्यन करने की इच्छासे पसिष्ठने उर्वशोसे जामप्रण पसिष्ठ सुदासके पुरोहित होने पर भी सौदास या दिया था। सबसे प्रार्थित होकर मिन और परणने मुदामफे पुत्रोंने उनके सी पुत्रोंका प्राणसदार किराया! कुम्भक मध्य युगपत् रेत सेक किया था। अन तर इस विषयको ले कर वृद्द तामें लिखा है- मध्यमे मानका प्रादुर्भाव हुया। लोग रहते हैं,कि ___ महात्मा यसिष्ठ सौ पुत्रोंका निधन पर एक जियासु पसिएमृपि भी उमासे उत्पन्न हुए थे। राक्षमने घमिष्ठका रूप धारण कर उनसे कहा 1 'तुम (ऋग्वेद ७३३११ १३) राक्षस हो, मैं घसिष्ठ । इस उपलक्षमें यसिष्ठने वहुन-से सक देवे थे। यही प्रक्स हिताफे म मण्डल में १०४ यसिष्ठ किस प्रकार ऋपि हुए, इस सम्बन्ध ऋग्वेद (बा८८३४) इस मशर लिखा है- सक्त में से १६ मण्या मत है।रासे १६ भूक में स्पष्ट लिखा है- जब में ( पसिष्ठ) और पक्षण दोना गाय पर चढे "पा मायानु यातुधानत्याह या या रक्षा शुचिरस्मीत्याइ । थे जब समुद्र के मध्य नाप बदी तजोसे जा रही थी, इन्द्रस्त इन्तु महता पधेन विश्वस्य जन्तारपम्पदोष्ट ॥' उस समय शोमा पकाने के लिपे मैं हिदोले पर जो 'यातुधान' (राषस) कद्द कर मेरा सम्बोधन करता परेवानन्दसे खेट करता था। ययण पसिष्ठको नाय है तथा जो राक्षस 'मैं शुचि' यह बात कहता है, पर ले गये थे अपने महातेमसे उन्होंने निन सुकर्म द्वारा महा आयुध द्वारा उसका विनाश करे ये सब अधम हो यसिष्ठको भृषि बनाया था। उनका दिन और उपा! कर पतित होधे । यद्धि'त हायें, इस प्रकार स्तय करेगे, इसीस मुदिनमें यसिष्ठका वेदमें इस प्रकार उल्लेख देख कर मध्या हे स्तोता दिया था। परमार मायने लिखा है- 'यमिष्ठ परयत्ती वैदिक ग्वेदसे मालूम होता है, कि वसिष्ठ और उनके प्रधमें ब्राह्मण कह पर गण्य तो हुप हैं, परतु यथार्थमें याधरगण सुवास राजक पुरोहित थे। सुदास पिजयनये ये ब्राह्मण नहीं थे। उनके जन्मक मम्य धमें गोलमाल पुत्र देवयतक पीन और वियोशसके यशधर थे। यसिष्ठ था, इमी कारण कहीं तो ये ब्रह्माको मानसपुत्र, ही पैजयन मुद्रासक पौरोहित्य कालम राजास प्रचुर धन मित्रावरण मौर वहीं उर्ची पुन पद पर अमिहिन रत्न पाया था। ग्घेदमें सुहास पैजवनके दानस्तुति पिपा सूत देने जात है पसिष्ठ हो उस सूक्त के पि अध्यापक मोक्षमूलतका प्रमाण उद्यत कर दे हैं। (ऋग्वेदमें ७ मपहना सात ) आय प्राह्मण ही बतलाया है। उनके मतस घेदमें पसिष्ठ ऋग्वेद म गएडलक २३य स्त में लिखा ई- मिलारुणके पुनरूपम यर्णित होने पर भी मिल पा सूर्य तृष्णातुर राजाओंसे परिस्त टिपाथों पसिष्ठोंने दी समझे जात है। दश राजामौके साथ प्राममें मादित्यकी तरह पदको कृष्ण यजुद या ततिरोप महितासे मालूम हाना ऊपर उठाया था। दिने स्तुतिकारी पमिठा स्तोल हैसिौदाससे जब मिष्ठ पुर मारे गये, तब उन्होंने सुना था तथा राजामोंके लिये विस्तीर्ण लोक प्रदान पिया। बदरा लेनपे लिये चेष्टा को। था। गोलक दण्डको तरह मातगण ( शनुगण) परि कोपोतकी ब्राह्मण (४ अध्याय) में मासी छिन मोर अल्पसक थे। मनन्तर यसिष्ठ उन्होंफे पुरा र पसिष्ठक पुनलगम भोर सोदाम परामयको पात दित तुप तथा हासुभोंकी प्रमा पृधि होने लगी। यहा रिपी है। मनुम हिना (८1११०)में रिया है कि महर्षि पमिष्ठ भरतोंक भी पुरोहित हेदि हैं। गण और गण कायमम्पादनके लिये अपय मापा जरते ऐतरेय ब्राह्मण (२९ में लिखा है,पसिष्टने थे। मा प्रकार पसिष्ठ पितमा पैजयनराजा लिप दुप