पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/८

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यदि हमेशा आश्रय दिए हुए है. तो सर्वदा समो [ है, उसे निदान कहते हैं। विप्ररुष्ट और सनिष्टके भेदसे प्राणोको पाडित रहना पडेगा। यदि वायु पित्त और निदान दो प्रकार है। विरुद्ध आहार विहारादिको विप्र क्फ भिन्न है तथा ज्यरादि रोग भी भिन्न है, ऐसा कहा । हट अर्थात् दूरवर्तिनिदान तथा कुपित यातादि वोपको नाय तो ज्याके समय अन्य प्रकारका लक्षण न ) सन्लिाष्ट अर्थात् निक्टवत्तीनिदान कहते हैं। दिखाई दे कर केर वाय, पित्त और कफा लक्षण रोग विशेष दिखाई देनेके पहले जिन सा भों हा क्यों दिखाई देता है। इसलिए वायु पित्त और द्वारा भावी रोग अनुमा किया,नाता है उसका नाम पको ही ज्वरादि रोगका कारण कहा है। इसकी पूर्वरूप है। पूरारूप भी दो भागों में विभक्त है, सामान्य मोमासामं कहा गया है कि वायु पित्त और कफ्में और विशेष । जिस पूर्वरूप द्वारा घायु पित्त और श्लेमा ही ज्ञरादिरोग दिवार देना है मही, पर उसमें हमेशा इन तीन दोपोंका कोई भी विशेष लक्षण न दिखाई दे कर नहीं रहता।लिस प्रकार विजली, हवा, वर्षा और बन क्सिी भावी रोगमात्रका अनुमान किया जाता है, उसे आकाके सिवा दूसरी जगह नहीं दिखाई देते यद्यपि । सामान्य पूर्वरूप कहते हैं। फिर जिस पूर्पकर द्वारा घे माशशमे हमेगा नहीं रहते, किसी कारण द्वारा मावी रोगका दोपभेद तक अनुमान दिया जा सकता 'आकाशमें उदय होने हैं, मरादिगेग भी उसी प्रकार ) उसे विशिष्ट प्रवरूप कहते हैं। यह विशिष्ट पूर्व रूप स्पष्ट अन्य कारणसे घायु, ति और फको आश्रय पर। रूपमें दिवाइ इनेसे उसे रूप कहत हैं। पस्तुता जिन दिखाई देता है । तरङ्ग या बुदउट जिस प्रकार जलसे } सव लक्षण द्वारा उत्पन्न रोग नाना जा सकता है उस मिन नहा है अपच जल रहने पर भी उसमें निर | का नाम रूप है। यच्छिन्न तरङ्ग वा वुवुद नही रहता अन्य कारण निदान विपरीत पा रोग विपरीत अथवा दोनांक द्वारा यह नरमें उत्पन होता है, यरादिरोग भी उसा विपरीत कार्यकारक औषध विशेषके सेवन तथा उसी प्रकार अन्य कारण द्वारा घायु, पित्त और कफमें उत्पन्न | प्रकार भाहार विहारादि द्वारा रोगका उपशम होनस होता है। | उसका उपाशप कहते हैं। इसके विपरीतका नाम अनु किसी प्रकार सामायिक नियमको लड्डुन करने अथवा पशय है । इस उपाय और अनुपाय द्वारा रोगा गूट प्रत्फे ममायमे यायु, पित्त और कफके मध्य पक यो लक्षण निर्णय करना होता है। दोप जन कुपित हो कर एक्से अधिक होप बढता है। यह द्धित दोष उसी / गारोरिक अवयव विशेष अवस्थान या विचरणक प्रकार क्सिी कारण द्वारा कुपित होता है। पाठे घह रोगोत्पादा करता है, तब उसे सम्माप्ति कहते है ।सण्या कुपित दोष जव शरीरके किमी एक देशका आथय लेता | विकल्प, प्राधान्य, बल और कालानुसार यह सम्प्राप्ति है, तब पर दागत रोग उत्पन्न होता है । सहि व्यास मिन मिन्न हुआ करती है । ८ प्रकारके घर, ५ प्रकार होनसे ज्यर भादि सादातरोग हुआ धरता है। दोप। के गुल्म और १८ प्रकार के कुष्ट भादि रिभेदका नाम दुपित हो कर चाहे शरीरफ देना मात्रय परे। सपश है। द्विदोपज और विदोपा रोगके कुपित दोपों चाहे सारे शरीरका, या प्रकापमान हो रत्ता मेंसे कौन दोष किस परिमाणमं दुषित हुआ है, यह प्रोप होता है। रकफ इपित हनिसे हो यह और अधिक जाननफ रिये प्रत्येक देोपका लक्षण विचार कर जा गयान हो उठना है। इसी कारण प्राया समारोगाम / अल्पाश विभाग किया जाता है उसका नाम लिए ज्वरका लक्षण दिशा देना है अथात् शरीर अण गौर है। ऐसे रोगाके मिलित दोपमि जो छोप मपन पानी घेगरती मी मालम होती है। निदान द्वारा दूषित होता है यही प्रधान तथा निदान, पूर्वरूप 27, उपाय और सम्माति ये पाव उस पुपित दोपफे ससर्गसे भय दो दोप जय गानक कारण है। कुपित होते हैं तब यह अप्रधान कहलाता है। जिससे दाप इपित हो पर गात्पादन कर सकता। नोरोगसमा निदागों द्वारा उत्पान देता है तथा Vol. 2