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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१४८

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गाका

अपांक्तेय समझना चाहिये। धर्मशास्त्रकार कश्यप कहते हैं कि हन्ता (हत्या करने वाला), कुटिलाङ्ग, चोर और नक्षत्रसूचक ब्राह्मण का समस्त कार्यों में ही परित्याग करना चाहिये। दूसरे-दूसरे धर्मशास्त्रों में भी गणक (ज्योतिषी) की खूब निन्दा की गई है। किन्तु संग्रहकारों का मत है कि जो ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन व व्यवसाय करते हैं, वे पतित या निन्दनीय नहीं हैं; क्योंकि ज्योतिषशास्त्र वेद का एक अंग है। वेद और धर्मशास्त्र में ब्राह्मण ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन कर सकते हैं, ऐसा विधान है। यदि अध्ययन करने से ही पतित वा निन्दनीय कहा जाए तो धर्मशास्त्र का विधान मिथ्या होता है। ​इसके अतिरिक्त कई एक शास्त्रों में ज्योतिष की बहुत सी प्रशंसा भी लिखी है:

“"त्रिस्कन्धवेत्ता एवं पूज्यः श्राद्धे सदा द्विजमध्ये।
नक्षत्रसूची खलु पापरूपी हेयः सदा सर्वशुभकर्मसु ॥" (वसिष्ठ)

​ जिन्होंने ज्योतिष शास्त्र के स्कन्धत्रय (तीनों स्कन्धों) का अच्छी तरह अध्ययन कर व्युत्पत्ति लाभ किया है, वे श्राद्ध में सब ब्राह्मणों के मध्य पूजनीय हैं। किन्तु जो नक्षत्रसूची हैं, अर्थात् ज्योतिष शास्त्र से अनभिज्ञ होने पर भी नक्षत्रादि की गणना कर जीविका निर्वाह करते हैं, वे ही पतित और निन्दनीय हैं। ​

“"ग्रन्थतश्चार्थतश्चैवं कृत्स्नं जानाति यो द्विजः।
अग्रभुक् स भवेच्छ्राद्धे पूजितः पंक्तिपावनः।
नासांवत्सरिके देशे वस्तव्यं भूतिमिच्छता ॥" (वराह)

​ जो ब्राह्मण ज्योतिष के समस्त ग्रन्थों का अध्ययन कर उसका प्रकृत (वास्तविक) भाव समझ सकते हैं, वे श्राद्ध में अग्रभुक्, पूजित और पंक्तिपावन हैं। जिस देश में ज्योतिषी नहीं हैं, और जो अपना कल्याण चाहते हों, उन्हें उस देश में रहना नहीं चाहिये। इसके अलावा 'सूर्यसिद्धान्त' और 'सिद्धान्तशिरोमणि' में ज्योतिष की भली-भांति प्रशंसा की गई है। ​

शास्त्रों में दोनों तरह की बातें लिखी गई हैं। एक में गणक की प्रशंसा और दूसरे में निन्दा की गई है। यदि प्रकृत प्रस्ताव से इसकी मीमांसा न की गई तो शास्त्र-विरोध हो सकता है। इसी कारण संग्रहकारों का कथन है कि शास्त्र गणक के विषय में दोनों तरह से लिखे गए हैं। जिसने यथार्थ में ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन नहीं

किया अथवा अध्ययन करने पर भी व्युत्पत्ति लाभ नहीं की, वे ही नक्षत्रसूची हैं। ये द्वार-द्वार घूमते हैं और किसी के द्वारा जिज्ञासा (पूछे) नहीं किए जाने पर भी नक्षत्रों की गणना कर गृहस्थों का शुभाशुभ फल कहा करते हैं। इसी कारण शास्त्रकारों ने इन्हें 'नक्षत्रसूची' नाम से उल्लेख किया है। ये यथार्थ में ज्योतिषी नहीं हैं। ये ही पतित, अपांक्तेय और निन्दनीय हैं। पहले जो सब प्रमाण लिखे गए हैं, वे भी दूसरे वचनों के साथ मिलाकर इसी तरह व्याख्या करने होंगे। एवं इत्यादि वसिष्ठ वचन द्वारा स्पष्ट रूप से ही नक्षत्रसूची की निन्दा की गई है। इसके अतिरिक्त दूसरे-दूसरे शास्त्रों में भी नक्षत्रसूची की निन्दा देखी जाती है। जो प्रकृत प्रस्ताव से ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन करते हैं, वे निन्दनीय या अपांक्तेय नहीं हैं।

​वृहत्संहिता में लिखा है कि जो शुद्धजाति (सद्वंशजात), प्रियदर्शन, विनीतवेष, सत्यवादी, जिनका पक्षपात निन्दनीय हो, जिनकी शरीर-संधि सविभक्त और उपचित हो, जिनके हाथ, पैर, नख, नेत्र, चिबुक (ठोड़ी), दाँत, कान, ललाट और मस्तक प्रभृति चारुता-सम्पन्न (सुन्दर) हों, जो स्वर से गंभीर और मिष्टभाषी हों, जो देश और काल का तत्त्व जानते हों, जो शास्त्रीय तर्क में सभा में जाकर कभी भी भीत (भयभीत) नहीं होते, जो निपुण हों, वासनाग्रहगणित जानने के लिए कौतूहली हों, देवपूजा, व्रत और उपवास करने की जिनकी प्रवृत्ति हो, वे ही ज्योतिष शास्त्र अध्ययन करने में उपयुक्त हैं। ​ग्रहगणित अर्थात् पौलिश, रोमक, वासिष्ठ, सौर और पैतामह—इन पाँच सिद्धान्त शास्त्रों में जो युग, वर्ष, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, अहोरात्र, याम, मुहूर्त, नाड़ी, विनाड़ी, प्राण, त्रुटि प्रभृति काल और तत्त्व निरूपित हुए हैं, उसके सम्यक् वेत्ता (ज्ञाता) तथा सौर, सावन, नाक्षत्र और चान्द्र—ये चार तरह के मास, अधिमास और अवम प्रभृति के ज्ञान से भिन्न, षष्टि संवत्सर, युग, वर्ष, मास, दिन और होरा प्रभृति के अधिपति निर्णय में तथा सौरादि परिमाण में प्रवीण, ग्रहों के शीघ्र, मन्द, याम्य, उत्तर और नीच-उच्च प्रभृति के कारण निर्णय में पटु (कुशल) हों। इनके अतिरिक्त जो दूसरे-दूसरे ज्योतिर्मण्डल के दुरूह विषयों की अच्छी तरह मीमांसा कर सकें...