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गण्डूषा गतभत् का
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प्रकाश में लिखा है कि दतुअन और जिभी करने के बाद शीतल जल देकर बार-बार कुल्ला करना चाहिये। इससे कफ, अरुचि और मुखमल दूर होता है। कुछ गर्म जल से कुल्ला करने पर कफ, अरुचि, मुखमल और दाँतों की जड़ता जाती रहती है। विष, मूर्च्छा, मदात्यय, राजयक्ष्मा और रक्तपित्त— इन समस्त रोगाक्रान्त मनुष्यों के लिये गण्डूष धारण अहितकर है। जिसकी आँखें दूषित या मल-कूपित हो गई हों अथवा जो मनुष्य अत्यन्त दुर्बल हो, उनके लिये उष्ण जल से कुल्ला करना प्रशस्त नहीं है। गण्डूषा (सं० स्त्री०) गण्डूष-टाप्। गण्डूष।
गण्डोपधान (सं० क्ली०)गण्डस्य उपधानम्, ६-तत्। उपधानविशेष, गालबालिश, वह छोटा तकिया जो गाल के नीचे रखा जाता है।
गण्डाल (सं० पु०)१. गुड़। २. ग्रास, कौर।
गण्डालपाद (सं० वि०)गण्डाल इव पादौ यस्य, बहुव्री०। गण्डाल के जैसा वर्तुलाकार पादविशिष्ट, जिसके पैर गैंडे के समान मोटे या गोल हों।
गण्य (वि०)१. गिनने योग्य, गिनती के लायक। २. प्रतिष्ठित, जिसकी पूछ हो, जिसे लोग सम्मान करते हों।
गत् (सं० त्रि०)गच्छति गम्-क्विप मकारस्य लोपः। गमनशील, जो चलता हो। यह शब्द प्रायः दूसरे शब्द के साथ प्रयोग किया जाता है।
गत (सं० त्रि०)१. गया हुआ, बीता हुआ। २. प्राप्त, पाया हुआ। ३. समाप्त, पूरा किया हुआ। ४. पतित, गिरा हुआ। ५. ज्ञात, जाना हुआ। ६. लब्ध, पाया हुआ। ७. गमन, जाना, चलना।
गतौंड (हिं० पु०)हिजड़ा, नपुंसक।
गतकलुष (सं० वि०)गतं कलुषं पापं यस्य, बहुव्री०। निष्पाप, जिसका पाप नष्ट हो गया हो।
गतकल्मष (सं० त्रि०) निष्पाप, जिसे पाप न हो।
गतकल्य (सं० क्ली०)गतकाल, बीता हुआ समय।
गतका (हिं० पु०)लकड़ी का एक डंडा। इसके ऊपर चर्म की खोल लगी रहती है। यह ढाई वा तीन हाथ लम्बा होता है। यह प्रायः खेलने (गतका खेलने) के काम में आता है।
गतकार्य (सं० वि०)१. जिसका कर्त्तव्य कार्य नष्ट हो गया हो। २. अतीत कर्म, जो काम बीत गया हो।
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गतकाल (सं० क्ली०)बीता हुआ कल।
गतकीर्ति (सं० त्रि०)गता प्रतीता नष्टा वा कीर्तिर्यस्य, बहुव्री०। जिसकी कीर्ति नष्ट हो गई हो, जिसका यश लुप्त हो गया हो।
गतक्लम (सं० त्रि०) जिसका श्रम दूर हुआ हो, विश्रान्त।
गतकुल (सं० पु०)वह सम्पत्ति जिसका कोई अधिकारी न बचा हो, लावारिस माल।
गतचौबीसी— जैनियों के भूतकाल सम्बन्धी चौबीस तीर्थङ्कर। नाम— १. निर्वाण, २. सागर, ३. महासाधु, ४. विमलप्रभ, ५. श्रीधर, ६. सुदत्त, ७. अमलप्रभ, ८. उद्धर, ९. अङ्घज, १०. सन्मति, ११. सिंधु, १२. कुसुमाञ्जलि, १३. शिवगण, १४. उत्साह, १५. ज्ञानेश्वर, १६. परमेश्वर, १७. विमलेश्वर, १८. यशोधर, १९. कृष्ण, २०. ज्ञानमति, २१. शुद्धमति, २२. श्रीभद्र, २३. अतिक्रान्त और २४. शान्त। (इष्टकत्तीसी)
गतत्रप (सं० त्रि०) गता त्रपा लज्जा यस्य, बहुव्री०। निर्लज्ज, लज्जाहीन, बेशर्म।
गतनासिक (सं० वि०)गतनामिका यस्य, बहुव्री०। नासिकाशून्य, जिसके नाक नहीं हो, नकटा।
गतनिबन्धन (सं० क्ली०)पाशभेद, बन्धनजाल, एक प्रकार का फंदा।
गतपाप (सं० त्रि०)गतं नष्टं पापं यस्य, बहुव्री०। निष्पाप, जिसके पाप दूर हो गये हों।
गतपुण्य (सं० त्रि०)जिसका पुण्य नष्ट हो गया हो।
गतप्रत्यागत (सं० त्रि०)पूर्वं गतः पश्चात् प्रत्यागतः, कर्मधा०। १. जो जाकर फिर लौट आया हो, गमन और प्रत्यागमन। २. सङ्गीत में ताल के साठ भेदों में एक।
गतप्रत्यागता (सं० स्त्री०) वह स्त्री जो अपने स्वामी के घर से भाग गई हो और फिर थोड़े दिनों के बाद लौट आई हो।
गतप्रभ (सं० वि०)गता दूरीभूता प्रभा यस्य, बहुव्री०। जिसमें प्रभा नहीं हो, निष्प्रभ, तेजरहित।
गतप्राण (सं० त्रि०)गतः प्राणो यस्य, बहुव्री०। जिसके प्राण ने शरीर त्याग कर दिया हो, मृत।
गतबुद्धि (सं० त्रि०)गता बुद्धिर्यस्य, बहुव्री०। बुद्धिशून्य, निर्बोध, अज्ञान, अनजान।
गतभर्तृका (सं० स्त्री०)गतो नष्टः प्रोषितो वा भर्ता यस्याः, बहुव्री०। विधवा स्त्री, जिसका पति मर गया हो या परदेस गया हो।
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