पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/१३२

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१२२ महाकानयेप-महाकाव्य होती है। किसी तरद दुःयरोग, मापद विपद भा पहने। . "काय रमात्मा गारम दोपास्तस्याप !..:. पर यह तन्त्रोक महाकाल-मन्त्र विधिपूर्वफ अपनेसे उत्पपईतयः मोसा गुप्पारावारीसपः।" . उसको शान्ति होती है। ____३शियानुचर भेद। ४ यात्रार्यभेद । ५ गुन्मभेद।।। (गाहिरपाय ! रसगडाधर मतसे मानन्दपिरोपजनक शो पाय. ६ आम्रवृक्षमेद। महाकालयेय (संपु०) सम्प्रदायभेद । यही काग्य है। . महाकाली (सं० रखी०) महाकाल परन्ययें खियां डीए । "भानन्दविशेष-जानकाय काम्यम् ॥" (HET. कौस्तुभफे मासे- महाकालफी पत्नी । इसके पांच मुन और आठ भुजाएं। "कपि या निर्मित काम ' मानी जाती हैं। देवीभागयतमें लिया है, कि यह देयो ! ' . . पराशक्तिको तामसोशक्ति है। ___साच मनोदर-चमत्कारिणो मना" "तस्यान्तु सात्त्विकी शक्ति राममी सागसी तथा। भर्धात् जो करिको कयित्यपूर्ण वातमि रमा हुमा । महालक्ष्मीः सरस्वती महामाजीति साः खियः॥" । मनोहर, फिर भी गमकारपूर्ण होता, उसी रमनामी (देवीमा० १२०) ' काव्य पहने है। २दुर्गाको एक मत्तिको नाम । शक्तिको पक उक्त सक्षणान्यित काय दो प्रकारका है. . अनुचरीफा नाम । ४ जैन मतानुसार पोडश विधा- काव्य भार धयकाप । जो काय्य पोपल भमिगपके . वोफे अन्तर्गत एक। यह अयसर्पिणीफे पांच मत उपयोगी हैं, उन सबको दृश्य भौर जो फेयल प्रयन को देवी हैं। करनेफे उपयोगी है, ये धम्याध्य है। . महाफालेय ( स० लो०) सामभेद । फिर यह भ्रश्यकाप्य भी दो तरहका है। कितने । महाफालेल्यर (सं० पु. ) उज्जयिनी शिवलिङ्गभेद । । हो गएडकाव्य और फितने दो महाकाव्य है। इस समय महाकालेश्वर रस (सपु०) रसोपविशेष। इसकी। महाकाव्पके सम्यग्धमें कुछ कहेंगे। महाकार या प्रस्तुत प्रणाली-लोहा, दस्ता, तांवा, भयरक, पारा, 2 और गह किस तरह रचा जायेगा तथा इसकी किस गंधक, सोनामपखी. हिंगला विप, जायफल, लयर। पिषय पर रचना होगी। दारचीनी, इलायची, नागेश्वररस, धतरेका पोज और जो सब काय एक पसर्गसेपित है और . जपपालका पोज प्रत्येक १ तोला, मरिच तोला इन्हें हार शास्त्रानुसार जिनके मारे मपपप संगटिग है, भांगकी पत्तीफे रसमें २१ बार भायना देकर रत्तीको पदी महाफास्य कहलानेक पोग्य। । . गोली बनाये। गनुपान गदरकका रस माना गया है। साहित्यदर्पणके मतसे महाकाव्य मर्ग द्वारा प्रपिट वयों और पदों के लिये माघ रत्तीको मासा यतलाई गई। या भाया होगा। किन्तु इस मर्गका बहुत पोरा पा है। रसका सेवन करनेसे खांसी, दमा मौर गलेशा। बहुत कम होगा दोपायद है। रसको संख्या माग रोग जाता रहता है। (मैपायरत्ना• कासाधिका०) कम ग हो सफेगी। पर उसे भी मपिक मर्ग मारा मदाफालोप (सं० पु. ) सम्पदापयिरोप। महाकापका दिमाग करना उचित है। कवि . . महाकाव्य (सो०) मध्य तस् काव्यञ्चेति कर्मधा। नुसार सोम. गम्तर्गत पपितामको किसो एकदमै पाण्यशाजविशेष। पांग-सायन्य। रमना कर अन्त में चातको योजना कानों पादि। . रसात्मक पापयका नाम काय है। ति पुष्टयादि । सौ में कोई सर्ग भविin माना सरह पदों या दोष देदको पिएति पयस्यादिको सप्प इस कालका अप.] पनि विरचित देखा जाता है। प्रत्येक म कर्ष साधक है। फिर माधुपांदि गुण, गाँदी, पाचाली गापो मर्ग में जो पर्णन किया जायेगा, उसमा मामा mदिरोति तथा भनुमास, उपमा प्रभृति र और रहना ही माहिये। मालदार शप भी इसका उस विधायक है। ____महाशाय रहार, योर मया मान रही सीमा