पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/१४८

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महादेव महादेव उग्रसाचे मोम . पालन होता है। पीछे इस विश्व ब्रह्माण्ड पर जय प्रलय तिथिनिर्णय, तिथिरत्न और निर्णयसिद्धान्त नाम उपस्थित होता है, तब उन्होंके ललाट-फलकस्थ तृतीय; तीन ग्रन्धके प्रणेता। धर्मतत्त्वसंप्रहके रचयिता ।१० तामस नेवसे क्रोधाग्नि निकल कर समस्त विश्वसंसार- निवन्धसर्वस्वके प्रणेता। ११ महारसायनविधि नामहः । को दग्ध करता है। । वैद्यकमन्थके रचयिता । १२ यजमानवैजयन्तीफे प्रणेता । . ___महादेव सतीकी भामको शरीरमें लगाने और प्रम- १३ योगसूत्रटीका और हठयोग प्रदीपिका-टीकाके. प्रपा यासे उनकी अस्थिमाला गले में पहनते है। आत्माराम यनकर्ता) १४ राजसिह-सुधासिन्धु नामक कायके हो कर ये एक वर्ष तक सतीकी शवदेहको कंधे पर चढ़ा : रचयिता । प्रन्यकारने अपने प्रतिपालक राजसिंहफे ' रोते हुए पागलकी तरह सभी स्थानों में घुमे थे। उसो नामानुसार प्रन्यका नाम रपा है। १५ सन्नानदीपिका समयसे वे अपने अगमें विभूति लगाते हैं। महादेवका नामक ज्योतिःशास्त्र के रचरिता। १६ सुबोधिनी माम प्रधान अख त्रिशूल है और उनके धनुपका नाम पिनाक प्रत्यके प्रणेता। १७ सात्ममवोधके रचयिना । १८ है। इनके एक दूसरे प्रसिद्ध अस्त्रका नाम पाशुपत है। होरामदोपके रचयिता। १६ एक ज्योतिषी । इनके पिता- महादेवने प्रसन्न हो कर यही अस्त्र अर्जुनको दिया था। का नाम काहशित था। इन्होंने फुझपदीप, महादेवी, त्रिपुरका विनाश करके चे त्रिपुरारि नामसे प्रसिद्ध | मुहूर्तप्रदोप, मुहर्तसिदि, मेघमाला चौर सारसंग्रह नामक , हुए। समुद्रमन्थनसे उत्पन्न विष पीनेके कारण उनका कई ज्योतिग्रन्थ लिखे हैं। १६६१ ई० में इन्होंने परनित नीलकण्ठ नाम पड़ा। परशुरामने महादेवसे अविद्या । मुहृत्तप्रदीपको एक टोका रची थी। २० धुन्धुकफे पुत्र। सीखी थी । महादेव सदा योगमग्न रहते, इसी कारण वे इन्होंने दुर्गसिंदकन कातन्त्रगृत्तिको शब्दमिद्धि नामक दिगम्बर हैं। सिर पर जटा है, गिरिकन्दर उनको बहुत एक टिप्पनी लिनी है। २१ नारायणके पुन । इन्होने प्रिय है। चन्दन, कीचड़, ढेला और सोना उनके लिये फाग्येहिप्रयोगहिरण्यक नामक ग्रन्थको रचना गती। २२ समान है। एक दिन गइसे भय खा कर कुछ सोने । लुनिगके पुत्र । १२६४ ई० में इन्होंने श्रीपतिहत ज्योतिषः । महादयको शरण ली। महादेवने उन्हें अभयदान दे रतमालाको एक टोका प्रणयन की। २३ सोममायके कर अपने अंग आश्रय दिया। तभीसे उनका अल-। पुन । इन्होंने उज्ज्वल हिरण्ययेशिसूत्रटीका, प्रयोगमा . द्वार नाग है। इस विश्वसंसारके आधार पर भगवान् । यन्ती नामक हिरण्यकेशिकल्पसूत्रटोका, श्रीतचन्द्रिका भूतमापनको पहन करनेको क्षमता और किसी भी और हिरण्यकशिमूवश्योगरत्न नामक कुछ टीका लिलो नहीं है, इस कारण स्वर विष्णु उनके यानरूप, गृपभ हैं। ये सोमयाजी उपाधिसे भूपित थे। हो कर विराजते हैं। ये सभी भोग सुखों पर लात मार | महादेवऔरङ्गालके काफतीय यंशीय पक राना, गणपति कर प्रसन्न वदनमे श्मशानमें वास करते हैं। फे पिता। शिय देयो। (ब्रह्मवैवर्त) । महादेव-येडमेले गौर पलिगारफे एक दण्डनायक महादेव-१ अद्भुतदर्पण नामक नाटकके प्रणेता। २ (शासनका)। ये पश्चिम चालुक्यराज य सोमेश्यापे । पुधमनोहरा नामक मुग्धवोघटोकाके रचयिता। इन्होंने मामन्त थे। स्वयंप्रकाश तीर्थके निकट विद्या सीखी थी। ३ अध्ययः । महादेव-आमामप्रदेश के गारो पार्यतीग नि दक्षिण पूर्य फोप नामक व्याकरणामिधानके प्रणेता। उक्त प्रन्यों में प्रवाहित एक नदी । नदीगर्गमें कोयलेकी शान पा .. इन्दोंने सिद्धान्त कौमुदी और तस्यबोधिनीका मतानु: गई है। ... सरण किया है । '४ आश्वलायनस्रौतसूतव्याख्याफे महादेव उप्रसार्यभाम-देवगिरिको यादयगीय एक रामा.. रचयिता । ५गलमस्त उदाररोघय प्रन्यके टोकाफार । खपाल पुत्र । ' अपने भाई पापक याद ये सिंहासन . फादम्परोटोकाफे प्रणेना। ८ सन्द्रलोक नामफ अलङ्कार । पर अधिष्ठित हुए। इन्होंने १२६०से १२७२ १० सफ' और रसोदधि नामक रसतरङ्गिणी टोकाके रचयिता। राज्य किया। शिलादिपि पढ़नेसे मान्दम होता , कि .