पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/१५०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


१३८ महादेव सरस्वती वेदान्तिन-महाद्रावकरस महादेव सरस्वती येदान्तिन्-स्वयम्प्रकाशानन्द सरस्वतीके महाद्योत ( स० स्त्री०) तालिकों को एक देवीका नाम! . शिष्य। इन्होंने तत्त्वचन्द्रिका, तत्त्वानुसन्धान और महादायक (सं० पु०) दापयो रोगानिति णिच् ण्युल, उसको टीका, सांख्य सूत्रवृत्ति, सांख्यप्रवचन-वृत्तिसार महांश्चासौ द्रावकश्चेति । औषधयिशेर । प्रस्तुन प्रणाली और १६६४ ई०में विष्णुसहस्रनामकी टीका लिखी है। अहस, चितामूल, अपाङ्ग, इमलीको छाल, युम्हडेका - महादेव सर्वशवादीन्द्र-एक विख्यात पण्डिन, न्यायसार डंठल, सीजका मल, तालजया, पुनर्णया और येत इसको विचारके प्रणेता राघव भट्टके गुरु। ये शायद १२५० भस्मको कागजी नीचके रसमें मिला कर छान ले। पीछे. .. ई०में विद्यमान थे। उसे कड़ी धूपमें सुखने दे। अनन्तर यह मूपा हुना महादेव हरियंश-वृहज्जातक प्रकाशके रचयिता। इन्हों. क्षार २ पल, फिटकरी १ पल, निगादल २ पल, सैन्यय ' ने १५२१ ई० में राजा रामभद्रको सभामें विद्यमान रह ४ तोला, सोहागा २ तोला, होराकस १ तोला, मुद्रामा कर उक्त प्रन्थ लिखा था। १ तोला, समुद्रफेन १ तोला, इन सब द्रव्यों के चूर्णको महादेवानन्द-अद्वैतचिन्ता-कौस्तुभके प्रणेता। वकयन्त्रमें चुआ कर अरक तय्यार करे। इसोका नाम महादेवाश्रम-२ एक योगी, तर्कदीपिकाके प्रणेता महादायक है। इसके द्वारा रसादिका कारण होता है। विश्वनाथाश्रमके गुरु। इस भरकका चार पांच बुद जल में डाल कर सेवन करने. . २ सांख्यकारिकावृत्तिके प्रणेता। से यकृत, लोहा और गुल्मादि नाना प्रकारके रोग नष्ट : महादेवी (सं० स्त्री० ) महादेवस्य पत्नोति, पत्न्यर्थे डोप होते हैं। (भैपन्यरत्नावली) यद्वा महती चासौ चेति । १ दुर्गा। इनके नामको | दूसरा तरीका-शुद्ध स्वर्णमाक्षिक, सैन्धव, रसायन, । व्युत्पत्ति- समुद्रफेन, सजोमिट्टी और सम्मलक्षार, प्रत्येक १ तोला, "पूज्यते या मुरैः सर्व महाश्रय प्रमाणतः। . सोहागा ७ तोला, निशादल और फिटकरी. प्रत्येक ३॥ धातुर्महेति पूजायां महादेवी ततः स्मृताः ॥" (देवीपुराण) तोला, यवक्षार १४ तोला, फसीस, पुष्पकसीस, धातु. महयातुका अर्थ पूजा है, सभी देवगण इनको पूजा ! फसोस पुल १४ तोला, इनके चूर्णको यथायन्समें सुगा फरते हैं इसलिये इनका नाम महादेयी पड़ा है। लेनेसे महादायक बनता है। यह लोहा और यहादरोग- २ राजाकी प्रधान पत्लो या पटरानीकी एक पदवी में यहुत लाभदायक है। जो हिन्दू कालमें प्रचलित थी। महादायकरस (स० पु०) औपविशेष । प्रस्तुत महादेवीत्य (संशो०) राजाकी पटरानीका कम या प्रणाली-ययक्षार २ भाग, फिटकरी ३ भाग, इसे गायके भाव। बछड़े के मुतमें पीस कर सुखा ले। पोछे किसी सीसे. महादेवीय (सं० वि०) महादेव सम्पकोय, महादेवरचित। के बने यरतनमें चिथड़े और मिट्टीका प्रलेप दे कर उसमें महादेवेन्द्र सरस्पती-परमामृतके रचयिता । इन्होंने प्रहा। उक्त चूर्णको रन छोड़े। अब उस परतनको सीसफे नेन्द्रसे विद्याशिक्षा प्राप्त की थी। ‘यने किसी दूसरे यरतन पर गाँधे मुह बैठा कर दोमो महादैत्य (सं० पु०) महाश्चासो दैत्यश्चेति । १ मीत्य | मुखमें लेप लगा दे। नोचेको हांडीके दमें एफ रहे। मन्यन्तरफे एक दैत्यका नाम 1 ( गण्डपु० ७८ अ०) । और नोचे गड्ढा रदेगा। गढ़े में एक और वरतन रणना २ द्वितीय चन्द्रगुप्तफे पितामह एफ राजा। जरूरी है। भय सबसे ऊपरयाले यरतनके पैदे पर भाग महादै तमस (संकी०) सामभेद। वाल दे। मागको गरमोसे परतनमें जो.ट्रय है यह गलने महाभूत (सं० त्रि०) अत्यन्त, गवरन । लगेगा और उसका रस टपक कर गर में राणे हुए यर. महाच ति ( सं त्रि०) १ उज्ज्वल आलोक, चमकीली तनमें गिरेगा। भनन्तर उस रमने लयन घणया रोशनी। २ चन्द्र-मएडलफे जैसा अत्यन्त उस्यल•| सारित ताघ्र मिला फर १ रतीको गोली यमाये । इस ज्योतिःप्रकाश। मोरधका सेवन करने से प्लीहा भौर यद प्रयोग हो