पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/१६०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


१४९ . महापाप्मन--पहापिसान्तकरस "महागायु गर्न स्यात् उदद लेराव 1. उक मतभेदको प्रमाणित करने के लिये. यनिष्ठादिमी दद्यात् पाषु पठारा ज्ञात्या म्याधयलायतम् ॥" उक मतके विशिष्ट उपासक माने गये हैं।.:.. (मलमासत०) | महापाशुपतमत (सं० मो०) शियमपिये। महापाप्मन (स.नि.) अतिशय पात्मा, घोर पापी। महापासफ (सं० पु०) पसति पापते निराकरोति परकाले. महापारणिक ( संपु०) युद्धशिष्यमेद । श्वरादिकमिति, पस-ण्युल, ततः महाश्चासौ पासा.. महापारुपक (सं० पुं०) घक्षमद। श्वेति । बौद्ध भिक्षक । पाप-चनुक आम महापारेवत (संशो०) महश तत् पारेयतञ्चेति । फल प्रबजित, गोमीन, महोपासक : . . . वृक्षविशेष, यड़ी खजूरका पेड। पर्याय-स्वर्णपारेयत, महापिचुमई (स० पु०) पर्यंतनिम्य, बकाएन । :, . सामाणिज, पारिक, रक्तरैवतक, पृहत्पारेयता द्वीपज, | महापिएडतेल (सं० लो०) पातरकाधिकारोक्त सलील छोपसार ) इसका गुण मधुर, बलकारक, पुष्टियर्दक, विशेष । प्रस्तुत प्रणाली-कटुतेल ४ सेर, काढ़े के लिये गृप्य, मूछो भोर भ्रमनाशक माना गया है। गुलश, सोमराजी, गन्ध भादुल प्रत्येक १२०० सेर, जल __ (राजनि०) ६४ सेर, शेष १६ सेर । काथ पृथक् पृथा होगा, पूध १६ महापा (सं० पु० ) १ दागयमेर। २ राक्षसभेद । । सेर। चूर्णफे लिये शिलारस, धूना, सम्दालू, तिफला, महापाल (सं० पु.) राजपुत्रमेद ।। भंग, कटाई, दन्तीमूल, फंकोला, पुनर्णया; चितामूल, महापाश (सं० पु०) महान् पाशोऽस्य । १ यमदूत पिपरामूल, फुट, हरिद्रा, दायहरिदा, पन्दन, रामदन, विशेष। (मृहदम पु० ५६ म.) महाश्चासी पाशश्चेति । फरस, श्येतसपंप सोमराजी पोज, चाकुदका पोज, २ पृहत् पाश, यड़ा जाल। अढ़ सको छाल, नीमको छाल, पटोलपन, अलाशीका महापापत (सं०५०) १ पफुल, मौलसिरी । (पद्यकनि०)पोज, असगंप भोर सरलफाट, प्रत्येक २ तोला। मग २ पशुपतिके उपासक शैवसम्प्रदायविशेष। स्कन्द- नियम इस तेलको मालिश करनेसे यातरक्त मौर कृपारि पुराणमें लिखा है, कि शिवभक्तमात्र हो महापाशुपंत कह विविध प्रकारको पीड़ा दूर होती है। महापिण्डीतक (सं० पु०) पिण्डी तमोतीति तन, "दरेयाययोगेंद न करोति महामतिः । संशा फन्, तता मदांचासी पिएकोतकरचे ति, पिएस. शिवभकः स विशेयो महाशुपसभ्य स॥" कारफलत्वावस्य तथास्यं । एन्णवर्ण महामदमास, (सन्दपु०) मैनाफा पेड़। पर्याप-याराह । गुण-घेष्ठ, प, मौर. फिन्तु यामनपुराणमें मतभेद देखा जाता है। यह इस तितरस, कफ, सद्रोग और भामाशयरोगनाशक । . . . प्रकार है- माघ शेष परियायमन्यत् पाशुपत मुने । महापिएटीतर (सं० पु०) महाभ्यासी पिएटीसकसि। सीय कालवदनं चाय च कपालिन । पृशयिशेप, पढे मैनेका पेर। पर्याप-श्येग nिt शैयाबासीन सय शक्तिगिरस्य प्रियः गुवः । तर, परदाद, ११, सोपतय, शप. पिएटी m। तता शिध्यो बभूवाय गोपापन इति भुतः। इसका गुण-कपाय, उस विदोषनाशक, धर्मरोग और महापाशुपत नागोहरद्वाजी सोमनः।. रत्तोपनाराक माना गया है। (रामनि०) ...... सस्य शिन्योऽगुभद्राना गृपमा गोमोगरा महापित्या (सं० पु.) प्राचीनकालमा एक प्रकारका फासस्पो भगवानासीदास्प धनः। . धार या पिशुपाठ जो शाकमेधने दूसरे दिन होता था। .. मार शिष्यों को पानाम्ना भरपरी भुने। महापिसान्नारस (मपु) रमौरपपि तुर. महावी न सदस्य गिप्पन भोपान। . . प्रणाली-अली, जायरान, जरामांसी, सातार, माति, जोदर इति माती मात्या शूद्रो महाः " . लोहा, गारफ मोर मेलमिल प्रत्येक पर रार माग!' लाते हैं।