पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/१७७

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महाभारत १६१ भक्षण,सन्तानके लिये अगस्त्य ऋषिका लोपामुद्रा नाम्नी भीमका उद्धार, पाण्डवोंके काभ्यवनमें फिर आना, - स्त्रीका परिग्रह कोमार ब्रह्मचारी ऋष्यशृङ्गका चरित, पुरुषधेप पाएडयोंको देखने के लिये वसुदेवफा काम्य. ' जमदग्निके पुत्र परशुरामका चरित, कार्शवीर्याका वध, वनमें आना, मार्कण्डेय समस्याघटित बहुतेरे उपाण्यान, । हैहय वध, प्रभासतीर्थ में यूणियोंके साथ पाण्डयोंका इन सब महर्णियों द्वारा येण-पुव पृथुराजका उपा ': सम्मिलन, सुकन्याका उपाण्यान, शतिके यशमें व्यवन | ख्यानकीर्तन, महानुभव ताय ऋपि और सरस्वतीफा • मुनि द्वारा अश्विनीकुमारद्वयके यज्ञोय सोमरसका दान, | संवाद, मत्स्योपाख्यान, मार्कण्डेय समस्या और पुरावृत्त अश्विनीकुमारों द्वारा च्यवनमुनिका योवन प्राप्त, कीर्तन, इन्द्रय म्नका उपाख्यान, धुन्धुमारका उपाख्यान, 'मान्धाताका उपाख्यान, जन्तु नामक राजपुतका उपा-1 पतिव्रतोपाण्यान, अङ्गिराका उपाख्यान, द्रौपदी और ख्यान, सोमकराज द्वारा बहुपुत्र लामार्ण पुत्रविनाश द्वारा सत्यमामाका कथोपकथन, पाण्डयोंका फिर ऐतवनमें याग और सौ पुर्तीका पाना, अत्युत्तम श्येन-कपोतका प्रवेश, घोषयात्रा, इसमें गन्धयों द्वारा दयोधनका पकड़ा भाख्यान, इन्द्र, मग्नि और धर्म छारा शिविराजको परीक्षा, जाना, लजाभिभूत दुर्योधनको अर्जुनका छुड़ाना, युधि. मायक्रोय,उपाण्यान, जनक राजाके याम नैयायिक हिरका मृगस्वप्न दर्शन और काश्यकचनमें फिर जाना, प्रपर धरणात्मज बन्दीके साथ विमर्पि अष्टावकका भादा- सविस्तार मोहिद्रीणिक उपाण्यान, दुर्वासा उपाख्यान, नुवाद, भष्टायकके साथ विवादमें यन्दीको पराजय, परा- आश्रमसे जयद्रथ द्वारा द्रौपदीका हरण और भोम द्वारा जय- जय करनेके बाद अष्टावनाका अपने पिता कोड़कोद्रयका पश्चशिखीकरण, रामोपाख्यान, सावित्रीका उपा- "सागरसे डूबने से बचाना, यवक्रीतका उपाख्यान, महानु- स्यान, इन्द्र के लिये कर्णका अपने दोनों कुडलोंको उतार , भय. रैभ्यका उपाख्यान, पाण्डवोंका गन्धमाइनको । फर दे देना, इससे प्रसन्न हो कर इन्द्रका पुरुपधातिनो- यात्रा और नारायणाश्रममें वास। यहां रहते हुए | शक्ति कर्णको देना, आरण्यका उपाख्यान, धर्म द्वारा सौगन्धिक आहरणार्य द्रौपदी द्वारा. नियुक्त भीमके | अपने पुत्रका अनुशासन, परलामके बाद पाण्डयोंका . कदली-बनके पथमें हनुमानका दर्शन, भीम द्वारा पन पश्चिम गोर जाना इत्यादि । वनपर्वमें इन्दी सय यनका ध्वंस, यहां राक्षस, मणिमत् महावीर यक्षोंसे | विषयों का उल्लेख है । इसमें २६६ अध्याय और ११८६४ भीमका तुमुल संग्राम, भीम द्वारा जटासुर नामक राक्षस- श्लोक हैं। का वध, वृषपर्वा नामक राजपिके पास पाएडयोंका ! ४ मिराद पर्व । • आना, फिर यहांसे पाएडयोंका आप्टि-सेनाभ्रममें जाना विराट् राज्यमें उपस्थित होने के बाद श्मशानमें ..और यहां हो रहना, पाञ्चालो द्वारा भीमका उत्साह- | शमीवृक्षका दर्शन, उस पर पाएडयोंका अस्त्र बर्दन, भोमका कैलाश पर चढ़ना और महावली मणि रखना, नगरमें जा कर छभवेशमें उनका यहां रहना, मत् आदि राक्षसोंसे घोरतर युद्ध करना, पाण्डव और फामाभिभूत दुर्गत कीचकके पाञ्चालीके प्रति विषय कुवेरका सम्मिलन, भ्राताओंके साथ मजुनको भेट, भोगको प्रार्थना और भीम (पृकोदर ) द्वारा उसका वध, , सम्यसाचि मजुनको दियअनप्राप्ति, इन्द्रकार्यार्थ पाण्डयोंको योजनेके लिये दयाधनका चारों भोर हिरण्यपुरवासी नियात कपच नामक दानवों और पुलोम | चरीका मेगना, उन चरों द्वारा पाएडवोंका अनुसन्धान -पुस कालकेयों के साथ अर्जुनका युद्ध और उन सबोंका | न पाना, प्रथमतः विगतीय सैन्य द्वारा यिराटुका गोधन- . अर्जुन द्वारा वध होना, महाराज युधिष्ठिरफे सामने | हरण और इसके लिये इन लोगोंये माय बिरादराजका अर्जुनका मन दिखानेका उद्योग करना भीर देवर्षि | | लोमहर्षण महासंग्राम, भीम द्वारा गोधन विराट का उदार, -नारद द्वारा यख दिखाना याद करना, पाएडयोंके गन्ध । तथा पाएडयों द्वारा गोधनका लौटाना, कौरयों द्वारा गो मादनसे उतरना, इसी महावन पर्णताकार अजगर सर्प, प्रहण, अर्जुनके साथ युद्ध करने में सभी कौरवोंकी हार, द्वारा भीमका पकड़ा जाना, युधिष्ठिरफे प्रश्नार्य कहनेसे किरीटीका विक्रम प्रदर्शन कर गोधनका लौरा ले माना, Vol. XIII, I