पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/१८४

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पहाभारत और देवी सरस्वतीको प्रणाम कर पोडे जयका उचारण ! रामायण और महाभारतफे मादि और अन्त में प्रति करे। 'जो ऊपर लिये गये नियमानुसार महाभारतका सभी जगह नारायणका वर्णन है। . . . . . ., पाट फरते हैं उनके निकर नियमस्प और शुचि हो महा .. . .. .(हरिया पी रामह-यभार), 'भारत सुननेसे अशेर पुण्य प्राप्त होता है। . . यूरोपीय मत! : .:.:. ... महाभारत पढ़ने के समय कर्तव्य । महाभारत पढ़ने- ____महाभारतके. मयंधमें यूरोपीय संस्थत विद्वान के समय प्रति पर्वमें जाति, देश, सत्य, माहात्म्य और पथेष्ट मालोचना की है। किन्तु उनका मा इस देशके धर्म प्रवृत्तिके अनुसार ग्रामणोंको जो दान करना होता पण्डितोंके मतसे नहीं मिलता, उनका मत मचमुच है उसका विधान इस प्रकार कहा गया है। पहले | आश्चर्यजनक है। उनके अभिप्रायका सार मर्म नोये लिसा जाता है। . . . . प्रामाणको स्वस्तिवाचन करा कर कार्य आरम्भ करे।। . . . . । प्रसिस जर्मन पण्डित येपर ( welxr ) साहक्के पर्ण समाप्त होने पर अपने माध्यानुसार उनको पूजा करना उचित है। आदि पर्व ममाप्त होने पर पाठकको मतसे-'महाभारतको प्राचीन अन्य नहीं कह साते। १ली शताब्दी में लिधि क्रिसोसटोम मन्थको छोड़कर यथाविधि वरन और गन्धयुक्त मधु पायस भोजन कराये। उसके पूर्ववर्ती किसी प्रन्यमें महाभारतका स्पष्ट भावीक पर्वा शेष होने पर फल, मूल, घृत मीर मधु- मिथित पायस भोजन तथा गुमोदक-दान, सभापर्ण प्रसङ्ग नहीं मिलता। यहां तक कि पाणिनिशे समय, मी शेष होने पर अपूप और मोदफफे साथ हयिष्यान्न भोजन, महाभारत मही रचा गया था। क्योंकि, पाणिनिके धन पर्नफे शेपमें तरह तरह के जगलो फलमूलादिका दान, युधिष्टिर, दस्तिनापुर, 'यासुदेय आदिका उल्लेग करने विराटपके शेषमें विविध वस्तु, उद्योग पर्वमें सर पर भी उन्होंने 'महाभारत' पाण्ड' मा पाएदथ' प्रकारके, अमोए और गन्धमाल्यादि, भीष्म पर्वा | शम्दका उल्लेख तक भी नहीं किया है। आश्चलापन और शाङ्गापन गृहासूवमें । भारत और महाभारतका उत्कृष्ट दान और अन्नदान, द्रोण पर्णमें अच्छी तरह उल्लेख रहने पर भी यह मक्षित हो माझा जायेगा। भोजन करा कर शर, धनुप और पड़ गदान, कर्णः पाजसनेयसंहिता इन्द्रको हो 'भजुग' कहा गया है। पर्व में अच्छा तरह ग्राह्मण माजन, शल्यपर्य में यजुर्वेदको मालोचना करनेमे मालूम होगा, कि एक मोदक, गुड़ोदन और अपूपयुक्त आहार; गदापर्य में और पाजाल में किसी प्रकारका विरोध नहीं था। दोनों मग मिला हुमा अन्न, खो पर्व में रत, ऐपिकपर्य में घृतो- में गादो मित्रता शो। शतपथ-ग्राह्यण देनेमे हो माना दन, यिपान भोमन, माध्यमेधिक पप में इन्छा- जाता है, कि परिक्षितके लएको अजयका परित उस नुसार भोजन, प्राधमयासमें हयिष्यान्न भोजन, शान्ति साप भी जनसाधारण स्मृति पय पर ममुयल था। .पर्य में मोपल, महामस्थानिक पर्व में गन्धमाला और . उनके अम्पुदय धीर मधपतनको उस समय भी अन. अनुलेपनदान तथा सर्ग पर्व में हविय भोजन कराना साधारण भूले नहीं । समस्त महामारत तीन चाहिये । पोछे हरिष पाठशप होने पर हजार घालणा शो में पिमक किया जा सकता - मूल . को पिलाना उचित है। में महामारतका वर्णन, रे मन मायीम मान .: धेयकाम पुरषको यया और पत्नपूर्वक महामारत और उपाख्यान संवाद तथा ३रे आधुनिक घनमें आलिया 'सुनमा चाहिये। जिसके घरमें महाभारत है यह व्यक्ति का कर्तव्य, विशेषतः प्राहमणों का पता-प्रसङ्ग है। 'मानो नित्य जपशील है। महाभारत सभी शाखा में | इसी अंशी ना, ययन, पहलयादिका उar 'प्रधान तथा मोक्ष और सत्य प्राप्तिका निदान है। पृथ्वी, शाता है । महासमरका यन हां महाभारतका मूल 'गी, सरस्वती, ग्राह्मण, पिण्णु भौर भारतसंहिता नफा उद्देश्य है, किन्तु इस सम्मायने २००० मारसे मषिक गई नाम लेनेसे मपसाद उपस्थित नहीं होता। पेद, । डोक नहीं है। यह मंग रामायण मुन