पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/१८६

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महामारत ज्ञानमें विभिन्न है। अतः प्राचीन भारपायिकाको कहानी में यदि कुछ भी सत्य रहे, तो पद स्वीकार करता : उदा देना जैसा सहज नहीं है, पूर्वतन धर्म चित्रका होगा कि बहुन दिनों के प्रतिष्ठित ममिजात कुलशमें अलग करना भी वैसा ही असम्भव है। इसीलिपे पर- उयतर सभ्यताका लक्षण परिस्फुट था, किन्तु नगोदित . पचों फपिने पहले की बातोंको न उड़ा कर उसमें अपनी इतर पाण्डवंशमें यह प्राचीनता विलकुल न थी। इसके समयोपयोगी परिवद्धित नीतिको शामिल कर दिया | बहुत दिन बाद यह फिरसे सम्पसमाजमें माधिपस्य है। इससे महामारतका भाकार पहलेसे कुछ बढ़ गया। फैला कर प्रतिष्ठित हुमा था। कहानी भीर परिसमम्ह. किंतु प्राचीन लोगोंके निकट जो सरल और धर्म का सम्यक परियमन करना परपती कयियोंकी पिट. समझा जाता था, नीतिशानसम्पग्न माधुनिकको निगाह कुल इच्छा न थी। सनीतिका प्रचार करने के लिये हो । में यह यशस्कर नदी भी समझा जा सकता है। जैसे परयत्ती कवियों ने पियरीन मोर परिपम किया है। . . ! मादि गल्पमें लिखा है, कि अर्जुनने निराश्रय अवस्थामें कोई कोई कहते हैं, कि कुय पोशाल-युग हो मूल बात है, कर्ण को मारा था। हो भी सकता है, पूर्व नीतिने इसे दोप पीछेसे पाण्डप्रसोड़ दिया गया है। किन्तु इसको भी न समझा हो, पर वर्तमान नीति इसे कभी भी माननेको फो भित्ति नहीं है। पाण्डुपाञ्चालफा परस्पर समाय तैयार नहीं। "समान समानमें अर्थात् जोधमें न्याय महासमरका. कारण है, यह भले ही कमा सकता है। युर करो" यही हुमा परबत्ती कवियोंका वचन । किन्तु फिर किसीने भारतफे धृतराष्ट्रको पैदिक पराराष्ट्र के . अर्जुन जैसे धर्मारमा व्यक्ति निराधयका प्राणबंध फर साथ मिलानेका प्रयास किया है, किन्तु गह भी समी. . " अन्यायकार्य कर सफें, इसे परवती नैतिक उचित नहीं चोन नहीं है कारण, यजुर्माहाणके. घृतराष्ट्र प्रात घे, समझते। इसीलिये उन्होंने प्रकाशित किया, फिजय पाण्डुयश उस समय विलफुल महात पा. मारत. यह स्वयं भगवानका भादेश था तय फिर न्याय और काप्यफे पाण्यन प्ररत है, कुररामशी कामात भन्यायफी पया यात रही? परवती फयिकी इच्छा थो, चिलित है। सच पूछिये तो, उस समयके कुधराम पाण्यशकी फीति घोषणा गौर सन्नीतिका प्रयत्तम। दुर्योधन थे। अभी फुग्यशका प्रमाय जाता रहा, माग फहीं कहीं पर कविने नीतिके निकट कीर्तिकी पलि दे। मातको रह गया है। पाण्टुयश पुरोदितोंने पादुश दी। अर्थात् नीतिफे निकट कीर्तिको तुच्छ समझ की विजयघोषणाफे समय उनका गौरप पदाने लिपे । रणा है। यहां तक कि, कुरगण पाएडयोंको लगती वातो. हो फुरुयंगको येदका प्रभापशाली कुरु पतलाया था और में गाली दे कर कहते है, 'जव दो व्यक्ति लड़ रहे हैं, तय सो कारण इन्होंने घेदफे धृतराष्ट्रको रामा फुरको जगद उसमें तीसरेको पढ्नेको क्या करत, और इस प्रकार पैठाया है। यथार्थमें येदोता धृतराष्ट्र बन पोछे पाह- मित्रका पक्ष ले कर शतका निधन करना क्या धर्म है | पंशका अभ्युदय हुमाः। प्रमो प्रकार ये मालपोजनं. अर्जुन इंसते हुए उत्तर देते है, 'पपा आश्चर्य ! तुम लोग मेजयको परान भारत मायकमा पुग्न बालाने से बाज नहीं मुझे प्ययका दोषी ठहराते हो! जब देखा, मेरा बांधय मापे है। ये मानते थे, कि जो जितने पुराने है ना शानुफे हायसे सताया जा रहा है, तब शलुको आघांत उतना हो भावर होता. मोर सिमा मिलना मादर करना क्या कर्तव्य नहीं। यदि प्रत्येक स्वयं युद्ध करे, होताये उतने ही उमरोसा गौरय हैं। म तो फिर विवाद हो किस लिपे युसनीति पेसा नहीं महाकायको परीक्षा कर देनेसे मादम दोगा.-कियो करती। सचमुच ऐसा मालूम पड़ता है, कि कुरुमीका कारणों से इस महाकाव्यका 'मसार हा गया अभिप्राय कौन अशा भोर कौन पुरादे से पृथक करने है। पहला कारण है, मदापायीन वागमें पाया से लिपे गठित नहीं हुमा है। किन्तु पाण्यंश नीति- 'मारि सम विषयों का समापै मोरगरा स्वाना. को परिपुष्टि इसे इतलापे देती है। मध्यापक हाप- यिक रूप मभिनय घटनाका संयोजन। शान्ति - . . मिनिसने अन्त पद स्थिर किया कि मदासमरको | पहले कारपके परिपोप मने पिपर है. हि