पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/१८८

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भारतकी मालोचना। १७२ महामारत दुयोधन शीत ऋतु है, द्रौपदी पृथियां है, युदादि ऋतु। ."द जगदसन्न मोकाना पुष्पगंयाम् परिवर्तन है, पाशा खेलनेको जगह (जुनापाना) गीत चतुर्विंशतिसादसों के मारतरियाद। ... . अनुसंचारक नाशनिक थरस्थान है तथा खेलमें जय। उपाख्यानग्निा साकार मोच्यते बुः १०२ .. ही पृथिवी पर गीतका गाविर्भाव है, इत्यादि। .. तोऽपाशा भगः सो तापिः। . .. कुछ दिन हुए, अध्यापक जाफोधिने यौद्ध पर्गका मनुभमणिकाया वृत्तान्तानो सयाम " १०१ . उत्पत्ति विषय जो प्रबन्ध लिखा है उसमें ये प्रसद्गतः पुण्यात्मा लोगोंके लिये यह शतसदन (मास) - .. मदागारत रचनाकालफा उल्लेख कर गये हैं। उन्होंने श्लोकात्मक महाभारत रचा गया है। किन्तु भारदेखने - कहा है, कि महाभारतको लोग चाहे कितना ही प्राचीन पहले पहल २४००० श्लोकमयो मारतसंहिनाकी रचना । षयों म कहे. पर ये इस यूटपूर्य दो या तीन शताब्दीसे को थी। पण्मुितोका कहना है, कि उपाण्यान-को पहले का फमी भी नहीं कह सकते। इसके समर्थनमें छोट महाभारतकी संभया इमी हो होती है। पौधे उनका कहना है कि महामारसमें ना या ययनशातिको | संक्षेप में सामान संक्षेपमें सर्वार्थका सङ्कलन करके उन्होंने १५७ श्लोका । । पदों भो पंजासयासी नहीं यतलाया गया है और न उमः। भनुमणिकाध्याय रचा। . . . में पायम बुद्ध यथचा पारसिक प्रगायका कोई उल्लेख . उक्त चोयोस सोकों का प्रन्य दो भारतसहिताकर लाता है। इस भारतसंहिताको ही हम लोग मारि महा .' भारत समझते हैं। यो संहिता सम्पायन पेर . पाश्चात्य परिसतीने महाभारतफे सम्बन्ध जो ध्यासको रचना है। यह मति प्राचीन प्रय-माय. ' ' मालोचना की है और आज करते भी हैं, उसके साथ लायन मीर सांगशयनगृह्यसूत्र में इसको भारत बतला. हम लोगोंका मत नहीं मिलता। फिर उनको आलोचना विलफुल भित्तिहीन और अमूलक है, ऐसा भी नहीं कह ____ "नुमन्नुमिनियाभ्यापनमा ममामगाराधमांचा... ' सकते। गादि महाभारत मिग्न भिन्न स्थानमें मिन्न - चान्ये भानास्ति सा गुप्यन्त्यिति ।" ... मिन मनुयक हाथ पड़ कर बड़ा हो गया है, इसम.. ..... ..... ... ....... संदेह नहीं। महाभारत में लिया है- ___ मर्याम् उपनयनकालमें मुमत, मिमी, सायन, समन्यादि भारत फेचिशखिमादितथापरे । सापरिचरायन्ये विमा सम्पगधीयते ॥ रसूलमाप मार भारतधर्मायार्थ क्या गया जितने भावार्य है समी तृप्त होयें (पेसा करना होता शिविध संहिताशाने दीपयन्ति मनीषिणः । ___ माश्यलापनने दूसरी जगद प्रासादि पियमा प्याल्यानु गुराज फेचिद् मन्यान धारपिनु परे।" मी । (भादि० २१५२-५३)। इतिहास पुराणादि पढ़ने की व्यस्था दो ... • - फोई ग्रामण 'नागयणं गास्टत्यं' इत्यादि प्रथम मंत! • "मायुगवा कपार कीर्तिपन्ता मानोरापान स्याममाता।" ( मार ) ..::: " से, कोई भास्तिक पर्यसे और कोई उपरिचर' राजाफे । पदुतेरे पति का कहना किस भाfati. उपाण्यानसे इस महाभारतका प्रारम्भ हुमा' समझ कर पदस स प्रकार पगिडत लोग कई तहरो संदिसाका! संहिताका दीमाम्यमापन एघासून तिहास'माला

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भाचार्य लगा । कोई तो अन्यम्यागयानमें पटे है। गया है। महाभारतमें भी लिया है- भीर को प्रन्यका लगाने में हो निपुण है। . तिहासाः पवारमा मितिमा मान्य पस्य ) ': अतः यह कहना होगा कि यन पहले ही महा . 'माया माध ममी इतिहारों और विश्मि सिन. भारलका कौन भन आदि और कौन मंग अन्न धा, . इसका को ठीक नहीं। 'भादिकम मध्या: का पचाकमा १स प्रग्य पर्णन किया गया में लिाद- . . . मग मक्ष है।