पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/१९१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


१७७ महाभीता-महाभ्रवटी "एक"नाम। " शिव भृगी नामक द्वारपालका करना होगा। यह तेल शिर पर लगानेसे पालीका एक नाम। गिरना बंद हो जाता है तथा मन्यास्तम्म, गलप्रह, शिरो- महामोतो (स० स्त्री०) लजालुपक्ष, लजालू । रोग, कर्ण रोग और चक्षुरोग मादिमें यह तेल विशेष महामीति ( स० पी०) महती भौतिः। १ अतिशय लाभदायक है। (भैवध्यरजाकर क्षुद्ररोगाधिक) ___ मर्य, भारी डर। (वि०) २ महामयनस्त, जो बहुत महाभैरव (सं० पु०) महान् भैरवः । शरमरूपी डरता हो। महादेव । 'महाभीम (सं०.३० महानतिशयो भीमः, भोपणाति “योऽसौ महाभैरवाख्यः सकापः शारभी हरः । त्वात् शिवांशसम्भूतत्वाच तथात्व। १ राजा शान्तनु- भैरवः पृथगेवाय गणाध्यक्षोहरात्मजः।। का नामभेद । २ भृङ्गिनामक शिवद्वारपाल। (नि.) 3 (कालिकापुराण ४६०) अतिशय भयानक, अत्यन्त धरावना।. महाभैरवी ( स० स्त्री० ) तान्त्रिकोंके अनुसार एक यिया महामीय ( स० पु० ) महान अतिशयो भीरुः। १ का नाम । ___ ग्यालिन नामका परसाती कीदा। (नि.) २ अति- | महाभोग ( स० वि० ) महान् आभोगः विशालता यस्य । शय भयशील, अत्यन्त डरपोक । महाविशालताविशिष्ट, अतिशय विशाल । महाभीपर्णक (सं०नि०) अतिशय भयावद, डरावना ।। "ततस्तत्र महाभोग सच्छायस्कन्धमुन्दरम् । महाभीष्म ( स० पु० ) महानतिशयो भीमः। राजा गुहचन्द्रो ददर्शासावेक न्योधपादकम् ॥" शान्तनुका एक नाम । (कथासरित्सागर १५२०६ ) 'महाभुज (स० लि०) महान्ती भुगौं यस्य । महायागु, मदामोगा (स० सी० ) महान आभोगः परिपूर्ण तास्याः आजानुलंबित पादु, जिसको चाहे बहुत लंघो हो। या महान् भोगः सुखरूपमस्याः। १ दुर्गा। महाभूत (सलो०) महम तत् भून ति कर्मधा० "महाणाधनी देवी महाभोगा ततः स्मृता ।" पञ्चतन्मान भ्यः स्थौल्यावस्य तथात्य। १ पृपिण्यादि (देनीपु० ४५ म.) पञ्चभूत । पक्षी, जल, अग्नि, घायु और आकाश पे पञ्च भगवती दुर्गा महाथ का साधन करती हैं इसलिये . तत्त्व है। २ स्थावर अङ्गमांश। उनका महाभोग नाम पड़ा है। (पु०२ सर्प, सांप । महाभूतदान (स' लो०) शास्त्रोक्त दानविशेष । ३ गृहत् परिधिविशिष्ट पड़े येरेका । महाभूमि ( स० स्त्री० ) महती भूमिः। १ विपुल भूमि। | महाभोगी ( स० पु०) महत् चमाया फणाघर, बड़े २ महादेश। फणचाला सांप। महाभूपण (स' छो०) मूल्यवान् अलकार, कीमती महामोज ( स० पु० ) १ एक राजाका नाम। २ राज- जेवर। चमवत्तीं। ३ बड़ा भोज । महाभृङ्ग (सपु०) महांश्चासो भृङ्गश्चेति । नील भृत | महामोट ( स० पु० ) भोट या तिभ्यत राज्य । राज, नीले फूलयाला भङ्गराज । महामोम ( सं० पु० ) पुराणानुसार एक रानाका महाभृङ्गराजतेल ( स० ली० ) तैलोपविशेष। प्रस्तुत ___प्रणाली-तिलतैल ४ सेप आनूपदेशोत्पन्न सुधौत भृङ्गा- महान ( स० लो०) घनमेघ, गहरी घटा। राजरस १६ सेर, चर्ण लिपे मजीठ, पद्मकाष्ठ, लोध, | महाप्रयटो (स० सी० ) पटिकोपविशेष । प्रस्तुत ___ रक्तचन्दन, गेरुमट्टी, विजयद, हरिद्रा, दारदरिद्रा, नागे- प्रणाली-अवरक तांबा, लोहा, गंधक, पारा, मैनसिल, १.श्वर, प्रियङ्ग, मुलेठी, प्रपोएडरीक और श्यामालता, ! सोदागा, यवक्षार और त्रिफला प्रत्येक नोला। ये प्रत्येक द्रष्य एक एक पल। इन्हें दूधके माथ पोस फर सव द्रव्य शोधित होने चाहिये। पोछे उसमें आध नीला __पाक करे। पोछे तैलपाकफे विधानानुसार इसका पाक | विष टाल कर भगको पत्तो, फेशरिया, सोमराज, भूर- . .. Vol, AVII, 45