पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२०४

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१८८ प्रहायान ‘प्रचारित 'पतञ्जलिका बनाया हुआ योगशाख पढ़नेसे | ये स्वर्गीय मातृका हिन्दू देवदेवियोंको पत्नीरूपमें गृहीतः । उनके मनमें योगका उदय हो आया । तदनुसार घे| न हो कर स्वर्गस्य योधिसत्त्वोंको पत्नी निर्धारित हुई। योगाचार या योगाचार्य नामक एक महायान शाखाका थी। साथ साथ भौतिकप्रक्रिया, चक्र-धारणो प्रभृति , • उद्भव कर गए हैं। उन्होंने अपने जीवनका अवशिष्ट समय अनुष्ठानका भी अमाव नहीं था। उन्होंने भी दुष्पग्रह अयोध्या और मगधर्म विताया था'] राजधानी राजा का प्रकोप निवारण करनेके लिये मन्तयुक्त फवचादि ..गृहमें उनकी मृत्यु हुई। उन्होंने एक योगशास्त्र लिखा धारण करनेको सीखा था.) · अन्तमें यही मन्त्रयान कह.. है। ग्रीनपरिव्राजक यूएन चुवङ्गके मतसे असङ्गने ही लाने लगा। . . . . . . महायानके मध्य तन्त्रका प्रचार किया। ___ आलोचना द्वारा जाना जाता है, एक समय मधुरा, ____उनके छोटे भाई वसुबन्धु बाल्यावस्था सङ्कुमद्र कावुल, कानोर, कार्लि, नासिक, अमरावती, उद्यान, नामक काश्मीरवासी एक हीनयानके निकट पढ़ते थे। 'पक्षाव, नालन्दा प्रभृति 'स्थानों में महायानधर्मको प्रधा- • वादमें ये काश्मोरसे अयोध्या आये और कट्टर सर्वास्ति- नता प्रतिष्ठित हुई थो.। इसका प्रमाण शिलाफलक और चादो वन गए। पहले तो उन्होंने अपने भाईके वनाये। बौद्धसङ्घाराम अब भी दे रहा है। यों शताब्दी में कन्नौज- । योगशास्त्रको तीव्र निन्दा की पर पीछे घे महायान- राज हर्षवर्द्धन, शिलादित्य महायान मतके पृष्ठपोषक मतका अवलम्बन कर नालन्दा मठके आचार्य हो गये। तथा होनयानोके घोर विरोधों हुए थे। हपंचरित पढ्ने । कुछ दिन वहीं रहनेके बाद उन्होंने वृद्धावस्था नेपाल | से जाना जाता है, कि उनको विधया वहन, राज्यत्रो घौद्ध । .मतान्तरसे अयोध्या) जा कर देहरक्षा की । उनका अभि- भिक्षु णो हुई थी। धर्म कोप बौद्धदर्शनका एक प्रधान नथ है। इसके | उसी समयसे हिन्दुप्राधान्यको पुनः सूचना हुई। अलावा घे यहुतसे महायानप्रथोंको टीका लिख गये हैं। कर्णसुवर्णराज शशाङ्क और काश्मीरराज दुर्लभचद्ध मके । असेड और वसुयधुके वाद-हिङ नाग, गुणप्रभ, स्थिर- समयसे ही हिन्दूधर्मको धीरे धीरे उन्नति तथा बौद्धधर्मः .. मति, सदास, बुद्धदास, धर्मपाल, शीलभद्र, जयसेन, की अवनति होने लगी। इतिहास पढनेसे मालम, होता है, चन्द्रगोमिन, चन्द्रकीर्ति, गुणमति, वसुमित, यशोमिन, कि वीं शताब्दीके मध्यभागसे हो यथार्थ में पौधोका भथ्य, बुद्धपालित, रविगुप्त :प्रभृति 'बौद्धाचार्यों के नाम अधःपतन हुआ। ... ...F:- पाये जाते है। ये सव महायान-सम्प्रदायके अल. ६४० ई०को तिव्बतमें जो महायान मत प्रचारित हुआ, ङ्कारस्वरूप थे। इनके रचित धर्मशास्त्र तथा टोका बौद्ध | उसमें भी तान्त्रिकताको प्रभाव देखा जाता 7 पद समाजको बड़े ही आदरको यस्तु है।. . . | तान्त्रिकंतांपूर्ण महायान-मंत ही पीछे मन्त्रयान' नामसे . ठो और वीं शताब्दी में प्रौद्धविज्ञानकी उन्नतिको परा- प्रसिद्ध हुआ। बङ्गालके सभी पालराजा इसी मग्न. काष्ठा देखो गई। उस समय दोनों सम्प्रदायने धर्मचर्चा- यानमिश्रित महायानके पृष्ठपोषक थे। उनके समयमें की ओर विशेष ध्यान दिया था। . . . . . . . सारा बङ्गाल-विहार मन्त्रयांन मतमें ही दीक्षित हुआ था। ज्यों शताब्दोके, अन्तमें परिव्राजक इसिंह, अपने पहले ही कहा जा चुका है, कि शून्ययादफे सिया महा. .भारतभ्रमण प्रन्यमें लिख गये हैं, कि उनके पहले महायानोंके और सभी अनुष्ठान हिन्दूधर्मानुकूल थे, सुतरी मति धर्मकीर्ति यौद्धधर्म रक्षामें विशेष यत्नयान थे। ये - उक्त मतावलम्यो 'तान्तिक, "विशेष प्रभेद नहीं था। .प्रसिद्ध हिन्ददार्शनिक,कुमारिल भट्टके समसामयिकी जब बङ्गालमें 'सेमराजामौका अभ्युदयं और .