पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२०६

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महायान

7 DA 'प्रचारित 'पतञ्जलिका बनाया हुआ योगशास्त्र पढ़नेसे । ये स्वर्गीय मातृकाए हिन्दू-देवदेवियोंकी पत्नीरुपने गृहीत -उनके मनमें योगका उदय हो आया । तदनुसार | न हो कर 'स्वर्गस्थ योधिसत्त्वोंको पत्नी निर्धारित हुई • योगाचार या योगाचार्य नामक एक महायान-शाखाका थो। साथ साथ भौतिक प्रक्रिया, चक्र-धारणी प्रभृति : • उद्भव कर गए हैं। उन्होंने अपने जीवनका अवशिष्ट समय अनुष्ठानका भो अभाव नहीं था। उन्होंने भी दुष्टप्रह- अयोध्या और मगधमें बिताया था। राजधानी राजा का प्रकोप निवारण करनेके लिये मन्तयुक्त कपचादि .. गृहमें उनकी मृत्यु हुई। उन्होंने एक योगशास्त्र लिखा | 'धारण करनेको सीस्वा था। अन्तमें यही मन्त्रयान कहः । है। चीगपरिव्राजक यूएन चुवङ्गके मतसे असङ्गने ही लाने लगा। . . . . . . . महायानके मध्य तन्त्रका प्रचार किया। आलोचना द्वारा जाना जाता है, एक समय मेधुरा. उनके छोटे भाई वसुवन्धु वाल्यावस्थामें सडभद्र काबुल, काश्नोर, कालि, नासिक, अमरावती, उद्यान, . नामक काश्मीरवासी एक हीनयानके निकट पढ़ते थे। पक्षाव, नालन्दा प्रभृति 'स्थानाम महायानधर्मको प्रधा. • यादमें वे काश्मीरसे अयोध्या आये और कट्टर सर्वास्ति नता प्रतिष्ठित हुई थी। इसका प्रमाण शिलाफलके और बादो बन गए। पहले तो उन्होंने अपने भाईके बनाये | बौद्धसङ्घाराम अब भी दे रहा है। यों शताब्दी में कन्नौज- : योगशास्त्रको तोब निन्दा को पर पीछे वे महायान• राज हर्षवर्द्धन, शिलादित्य महायान मतके पृष्ठपोषक मतका अवलम्बन कर नालन्दा मठके आचार्य हो गये। तथा हीनयानों के घोर विरोधी हुए थे।. पंचरित पढ़ने .. कुछ दिन वहीं रहने के बाद उन्होंने वृद्धावस्था में नेपाल | से जाना जाता है, कि उनकी विधवा वहन राज्यम्रो बौद्ध मतान्तरसे अयोध्या) जा कर देहरक्षा की। उनका अभि- | भिक्षुणी हुई थी। ... धर्म कोष वौइदर्शनका. एका प्रधान नथ है। इसके उसो समयसे हिन्दूप्राधान्यको पुनः सूचना हुई। अलावा चे बहुतसे महायानप्रथोंको टीका लिख गये हैं। कर्णसुवर्ण राज शंशाङ्क और काश्मीरराज दुर्लभवद्ध नके , असङ्ग और वसुबधुके बाद हिङनाग, गुणप्रभ, स्थिर- समयसे ही हिन्दूधर्मको धीरे धीरे उन्नति तथा बौद्धधर्म मति, सङ्गन्दास, बुद्धदास, धर्मपाल, शीलभद्र, जयसेन, की अयनति होने लगी। इतिहास पढनेसे मालूम होता है, चन्द्रगोमिन, चन्द्रकीर्ति, गुणमति, वसुमित, यशोमित्र, कि वो शताब्दी के मध्यभागसे ही यथार्थम पौधोका'

भथ्य, बुद्धपालित, रविगुप्त प्रभृति बौद्धाचार्यों के नाम |

पाये जाते है। ये सब. महायान-सम्प्रदायके अल. | ६४० ई०को तिव्वतमें जो महायान-मंत प्रचारित हुआ, ङ्कारस्वरूप थे। इनके रचित धर्मशास्त्र तथा टोका वौद्ध | उसमें भी तान्त्रिकताको प्रभाव देखा जाता है। यह समाजकी बड़े ही आदरको वस्तु है। . .. तान्त्रिकंतांपूर्ण महायान-मंत ही पीछे 'मन्त्रयान' नामसे . वो और वीं शताब्दीमें बौद्धविज्ञानकी उन्नतिको परा- प्रसिद्ध हुआ वडालके सभी पालराजा इसी मग्न. काष्ठा देखी गई। उस समय दोनों सम्प्रदायने धर्मघर्चाः | यानमिश्रित महायानके पृष्ठपोषक थे। उनके समयमें की ओर विशेष ध्यान दिया था। . . . . . . . 'सारा बहाल-विहार मन्त्रयांन मतमें ही दीक्षित दुमा था। यीं शताब्दीके, अन्तमें परिवाजक इत्सिंह. अपने पहले ही कहा जा चुका है, कि शून्यवादफे सिया महा. भारतभ्रमण ग्रन्थमें लिख गये हैं, कि उनके :महले. महा- यानोंके और सभी अनुष्ठान हिन्दूधर्मानुकूल , सुतरी मति धर्मकीर्ति बौद्धधर्म रक्षा विशेष यत्नयान् थे। ये उक्त मतावलम्बो तान्त्रिक "विशेष प्रभेद नहीं था। प्रसिद्ध हिन्दूदार्शनिक कुमारिल भट्टके समसामयिक थे। इसीलिये जब बटाले में सनराशामाको अभ्युदय और ७यो शताब्दी में ही उत्तरदेशीय वौद्धसमाजमें अर्थात् / हिन्दूधर्म में जब उनका अनुराग हुमा, तवं जनसाधारणमें महायानोंके मध्य तान्त्रिकताका स्रोत. प्रवाहित था। मी अनायास तान्त्रिकपय फ़ैल गया। इसमें उन्हें कुछ विशेष तान्त्रिकोंके संमिश्रणसे वौद्धसमाजमें प्रकृति (शक्ति), असुविधा न हुई । इस प्रकार मन्त्रयानामसागलम्यो गुत.. ..मातृयाकिनी, योगिनो प्रभृतिके उत्सवको प्रचार हुआ।। से बयासी दिग्दूराजाके प्रभायसे हिन्दुताविकासमी ..

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