पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२११

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महाप्रसारणोतेल-पहाराजाधिरान १६३ पल, शिरोपकी छाल ५० पल, लाय २५ पल, लोध २५॥ यत्रो और लयाप्रत्येक पल, मृगनामि६ पला कपूर पल इन्हें एक साथ ८४०० सेर पानी में पाक करे। जब || पल इन्हें लगे डाल कर पाक करें। पीछे इसमें १२८ सेर पानी रह शाय, तय उसे उतार ले। पोछे उसमें मृगनामि ६ पल और कपूर ॥ पल छोड़ दे। । कांजी ६४ सेर ( यद्यपि कांजीफा परिमाण २६ भादक! महाराज प्रसारिणोतेलमें जो कांजी देनेका विषय धनलाया गया है, तो भी ६४ सैर हो देना चाहिये, नहीं कहा गया है, यह निम्नोक्त शुक्नका लक्ष्य फरफे। शुफ्त तो तेलसे केवल कांजीको ही गंध निकलेगी) दूध 80 यनानेका नियम-अनाजका मांड़ । सेर, कांजी ८० सेर, सेर, दही ४० सेर, दहीका पानी १६ सेर, ईखका रस ३२ / दही २ सेर, गुट २ सेर, मालम्लक ( कांजीये नीचेका सेर, वरेका मांस ३०० पल, पाका जल १८० सेर, शेष अन्न) १ से, अदरक, २ सेप, पिपरा, जीरा, सैन्धय, ६८ सेर, मजीठ ६० पल, जल ६० सेर, शेष १५ सेर हरिद्रा और मिर्च, प्रत्येक २ पल, इन्दे' पकल कर घोके पहले इन्हीं सब योंके साथ तेलपाक करे । पीछे उस ! वरतनमें ८ दिन तक रख छोड़े। पोछे उसमें दारचीनी, में भल्लातककी गुठली ( असह्य होने पर लाल चन्दन), तेजपत्र, इलायची और मागेश्यरत्येकका चूर्ण ६ तोला पीपल, सौंठ, मिर्च, प्रत्येकफा रस ६ पल, हरीतको, डालना होगा। इसीको शुक्ल कहते हैं। 'बहेड़ा, सायली, सरल काष्ठ, सोयां, फर्फरङ्गी, पत्र, इसी शुक्तसे तैलपाक करना होगा। विशेष अमिछ कचूर, मोथा, नागरमोथा, पमपुष्प, भेट, पिपरामूल, घेद्यको बड़ी सावधानोसे तथा शुचि हो फर यह नेलपाक 'मजीठ, असगंध, पुनर्णया, दशमूल, चकवंद, रसाअन, करना चाहिये। यह महाराजप्रसारिणी तेल राजसेथ्य गन्धतृण, 'दरिद्रा, जीयनीयगण प्रत्येक २ पल। पहले है। इसको शक्ति अन्यान्य प्रसारिणी तेलफी अपेक्षा इन सबका चूर्ण डाल फर रेलपाक करना होगा। लवड़ बढ़ी बढ़ी है। इसके प्यवहारसे सगी प्रकारको यात. गधयोल, तेजपत्र, धूना, शैलज, प्रियंगु, पसनसको | व्याधि जाती रहती है। -अंडे, सौंफ, जटामांसी, देवदाय, लवणयोटि (लोयान) (भैषज्यरत्ना० यात व्याधिगंगाधि०) नालुका, काष्टखोटी, छोटी इलायची, फन्दुरखोटी, मुरा- महाराजयटी (सखी०) यटिकापर्यविशेष । प्रस्तुत मांसी, तीन प्रकारको नषी (पहला गूलरपत्रके जैसा, | प्रणालो-पारा, गंधक और अवरक, प्रत्येक दो तोला, - दूसरा उत्पलंफे जैसा, तीसरा घोड़े के गुरफे असा), | पृद्धदारक, रांगा, लोहा प्रत्येक १ तोला, सोना, कपूर ' दारचीनी; तेजपत, चथ्य, सहासी, यम्पेको फली, । और तांवा प्रत्येक ८ तोला, गांजा, शतमूली, श्येतधूप, दीनेका फूल, रेणुक, चोर पंफोली और भंटी, प्रत्येक | लवङ्ग, तालमखाना, भमिकुष्माण्ड, तालमूली, शकशिम्मी,

३ पल इन साके चूर्ण और गन्धोदकके साथ दूसरी- जातिफल, जैत्री, विजयंद और गोपचल्ली प्रत्येक दो माशा

बारपाक करना होगा। गन्धोदक साधनका नियम- इन्दै तालमूलोके रसमें पीसे । पीछे नियमानुसार इसे तेजपन्न, पलक, रासखसकी जड़, मोधा, सुगंधवालाका तैयार कर ४ रत्तीको गोली बनाये | इसका अनुपान मधु मूल, प्रत्येक २५ पल, फुट १२॥ पल जल १०० सेर शेष है। इसके सेयनसे सब प्रकारफे यातिक, पैत्तिक, ५० सेर, दूसरा पाक इसी गन्धजलके साथ होगा। श्लैमिक और साग्निपातिक ज्वर, गांसी, दमा, कमला, ..: इस गन्धजल और चन्दन जलफे साथ पीछे का लिया| प्रमेह और रक्तपित्त मादि रोगीको शान्ति होती है। पह 'हुमा कल्कपाकं करना होगा। चन्दनायु प्रस्तुत करने । बल और पुएिकर है। इस भीग्धका 'सेपन कर यदि . का नियम,-५० पल चन्दनको ५० सेर जलमें सिर कर नित्य स्त्री प्रसङ्ग किया जाय, नोक मीर यन्नका हास "जय २५ सेर जल पच रहे, तब उसे उतार ले। पूॉक नहीं होता। (रसेन्द्रयाग अराषि०) . ' .. गन्धंजल ५० सेर गौर चन्दनजल २५ सेरफे साथ मागे-महाराजाधिराज (सपु०) १ पटुत बड़ा राजा, मक 1. घर, पुट, दारचीनो, केशर, श्वेतचन्दन, गठियन, लता- राजाओंमें थे छ। २५ प्रशारकी पदवी जो निटिग ___फस्नूरी, लया, भगुरू, फंकोल, अयिनी, जापाल, इला! भारत सरकारको भोर पई गायों की मिलती है। ____Vol. XVII. 49