पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२२९

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महाराष्ट्र २०६ किया। तव अलाउद्दीनने मौका देख कर अपना दावा; मुबारकको इस विद्रोह दमनके लिए दाक्षिणात्य माना बढ़ाया। देशके अन्यान्य हिन्दू राजा देवगिरिफेराजाकी! पढ़ा। हरपाल मुसलमानोंके हाय पर भीर मार झाले सहायतार्थ तैयार हो रहे थे। रामचन्द्र राव और कुछ गये । इस तरह महाराष्पदेशसे हिन्दराज्य विलुप्त हुमा । दिन अवरुद्ध अवस्थामें रहते तो प्रतिवेशी नरपतियोंकी । मुसलमान लोग दिनों दिन प्रश्न हो उठे और सारे महा. सहायतासे ये उन्मुक्त हो सकते थे। किन्तु दुर्ग-रक्षाके, राष्ट्र में अपना प्रमुत्य फैलाने लगे। लिए कृतसङ्कल्प होने पर उन्हें मालूम हुमा, कि अवरोध- महाराष्ट्र देशके प्राचीन हिन्दू राजयंशका इतिहास से पहले जिन पोरोंको उन्होंने शस्यपूर्ण समझ कर अय तक संक्षेपमें कहा गया। मुसलमानों के आगमन भण्डारमें रखवाये थे, घे असल में नमकके वोरे थे। देव-। पर्यन्त जो जो प्रधान घटनाए महाराष्ट्रदेशमें हुई है, दुर्विपाकसे सहसा रसद घट जानेसे उन्हें अलाउद्दीनसे उनको तालिका नीचे दी जाती है। दवना पड़ा। उन्होंने ६०० मन मोती, २ मन रत, १००० रामायण काल......महाराष्ट्रदेशमें अनाय-नियास । मन चांदी और ४००० हजार रेशमके थान तथा महामारत-काल......महाराष्ट्रमें आर्य-उपनिवेशको अन्यान्य बहुमूल्य पदार्थ दे कर अलाउद्दीनसे सन्धि मोल प्रतिष्ठा। ली। इसके सिया पलिचपुर जिला मुसलमानोंको देना इम्पो पूर्व ३५० से ७३ नक अशोकके उद्योगसे पड़ा और नियमित कर दे कर दिल्लीश्वरकी अधीनता बौदधर्मका प्रचार । खोकार करनी पड़ी। तब अलाउद्दीन घेरा उठा कर देशाय दह, मोज, अपने देशको बाल दिये। राटिक, महारठ इसके बाद अलाउद्दीनने अपने युद्ध चचा जलालउद्दीन रठ कुड़ आदि खिलजीको किस तरह मार फर दिलीफा सिंहासन हथि- जातियोंका अधिपत्य। याया, यह इतिहास प्रसिद्ध वात है। उनके पादशाह ०.पूर्ण ७३से२१८६० नफ सातवाहन शका होने पर रामदेव रायने कई वर्षे सक दिलोको कर नहीं राजत्य। भेजा। इस कारण अलाउद्दीनने मालिक काफूरको २१८ ई०से ६०० ६० नक भाभोर, राष्ट्राट अधीनतामें तीस हजार अभ्यारोही सेना उनके विरुद्ध । आदिका आधिपता। युद्धार्थ भेजी । १३०७ में सेना देवगिरिफे पास पहुंची। ६०५ ई०से ७४७ ६० तक पूर्व भालुस्य। मालिक काफूरने उन्हें कैद करके दिल्ली भेज दिया । यहां | ७४८ ई०से १७३ ई. तक राष्ट्रकट। छ: मास तक फैद रखने के बाद भलाउद्दीनने उन्हें सम्मान ६७३ मे १५८६ ई. तक उत्तर-वाटुश्य। के साथ लौट जानेको अनुमति दी। इसके याद रामदेय' १९८७ से १३१८ ई० तक यादय यन । रायने वरावर दिल्लीश्वरसे मेल रखा। उस जमानेका साहित्य । १३०६ १०में रामदेव रायकी मृत्यु दुई और महाराष्ट्र देशमें बहुत प्राचीन ममममे पालिमापा शङ्कर राव राजसिंहासन पर येठे। उन्होंने दिलीवरफे। प्रचलित थी । सातवाहनयंशफे राज्यकालमें महाराष्ट्र साप विरुव भाचरण किया, जिससे १३१२१०में घे नामक प्रारत भागका इस देश में नया मालपादिप्रदेशम मालिक काफूरफे हाय मारे गये। भी प्रचार था। मारतप्रकाश का यररात्रिका मत है, इस समय देवगिरिमें मुसलमानोंका आधिपत्य हो गया कि इस महाराष्ट्री भापासे शौरसेनी, मागधी और अलाउद्दीनको मृत्युफे याद दिलीके दरवारमै जो गड़बड़ी पैगाचां आदि देशोय भागों को उतातिरह।साहित्य फैली थी, उस मौके पर रामदेयके जामाता हरपालदेपने दर्पणके रचयिताने "गाधामु महाराष्ट्री प्रयोजपेत् । पिद्रोही हो कर दाक्षिणात्यसे मुसलमान शासकोंको प्रयांत् नारकर्म महाराष्ट्री भाषामें सहीतादिको रचना मार भगाया। १३१८० अलाउद्दीन तृतीय पुय , करने का विधान किया है। सातवाहनको मत. Vol. XVII, 53 .