पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२३१

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महाराष्ट्र २११ । महम्मदशाहकं बाद जितने भी मुलतान हुए, उनके नौकरी करके दी अपना गुजारा चलाया करते थे। ये विस्तृत विवरणके साथ इस इतिहासका कोई सम्बन्ध विधी राजा उनके धर्म पर आधात न करते थे। उस • नहीं है। उनके राजत्य-काल में भी दाक्षिणात्य में हिन्दू समय राज्यमें जो विद्रोह हुमा था, उममें दिन्दुनि मुसलमानोंका विवाद मिरा नहीं। सिया मुन्नी सम्पः । प्रकाश्य पसे विलकुल ही योग नहीं दिया था, न उन. .दाय मो परस्पर लड़ता झगहता रहा। मध्य एशियासे को इसमें सहानुभूति ही थी। इस यंगके राज्य-कालमें धर्मान्ध मुसलमानोंको आतम ज्यादा म होनेसे दाक्षि महाराष्ट्रमें तुकी, रानी, हवमी, मुगल शादि विभिन्न णात्यमें मुसलमानीका क्रमशः द्वास होने लगा। कुछ ! वंशके मुसलमान आ कर बसे थे। धीरे धीरे इनको - ही दिनों में इस्लामधर्म पर हिन्दू धर्म का प्रभाव पड़ा।' प्रतिष्ठा ऐसी वढ़ी कि पासमें अगर विजयनगरका हिन्द • बहुतसे मुसलमान हिन्दू देव-देवियों के प्रति श्रद्धा करने । राज्य न रहना तो महाराष्ट्रको अवस्था हुन मोचनीय लगे। हो जाती।छ भी हो, मुसलमान व्यापारियोंफे प्रयत्न १५२६ ६०में पासणीवंशका मिलोप हो गया। इस ' से इस समय देशके चैदेशिक वाणिज्यने यास कुछ . शके सुलतानोंने कुल १७६ वर्ष महाराष्ट्र राज्य किया उन्नति कर ली थी। मुसलमान लेसोका कहना है, कि था। साकी १५यो शताब्दी में इसके समान प्रयलपरा- । दामनी राज्यमें चोर उत और रानानियों का पर कान्त राजवंश सारे भारतमें और नहीं था। दिल्ली. विलकुल न था । मुसलमानोंकी फोनिगसे बड़ी बड़ी बादशाहगणको भो इन राजाओं के प्रति टेडो नौगाह करने. इमारतें भी बन गई थी, जिससे देश स्थापत्य गिल्य. का साहस नहीं होता था। इस वंशकै प्राचीन राजाऑने की बहुत कुछ उन्नति हुई। मुमलमान बालकों की शिक्षा. जैसी सुव्यस्था को यो, उससे इनका राज्य और मो के लिए वामनी सुलतानोंने ग्राम प्राममें पाठमालाएं स्थायी रह सकता था। परन्तु पीछेके सुलतानगण सोल दी थीं। पूर्तकार्याः भो उनकी लापरयादी न थी। जरा जरासे कारणों पर दूसरोंके राज्य हड़पने पर उतारू । यिदर और फुलयाम उनको राजधानी धी। हो गये और इस तरह राज्य विस्तारको फ्रोशिश करने पानाश देगी। लगे, तथा नये जीते हुए राज्यों को समुचित व्यवस्था न परिदशाही यंग। कर सके। सूयेदार लोग बहुत जगह पलयान हो उठे बामनीयंश मुलतानोंका गौरयस्य जितना ही पौर सुलतान होनयल होने लगे। महम्मद गवानके अस्ताचल की ओर गढ़ने लगा, उतनी ही उनके. राज्यम' मन्त्रिस्यकालमें इन विषयों पर एक बार ध्यान गया था। सिया और सुन्नी सम्प्रदायोंमें झगडे को आग धधकन • पल्तु उनको ध्यवस्थासे राजकर्मचारियोंको आजादी पर , लगी। इस मौके पर महम्मदशाहफे राज्यकालमें (१४८३. चोट पहुंची, जिससे घे उसके घोर विरोधी हो उठे।। १५१८६०) महाराष्ट्रनि एक बार यिद्रोद कर मस्तकः इस कारण गवानको मृत्युकै याद फिर चारों तरफ उठाया था, किन्तु कासिम यरिद नामक एक मुसलमान विशालता फैल गई। जिस माल बामनो राज्यका, सरदार प्रयत्नमे यह विद्रोद व गया। सुननानने लोप हुमा, उसो साल यावरने उत्तर-भारतमें मुगट- मरदार के इस कार्यसे खुन हो कर उनको तरको पर साम्राज्यका सूत्रपात किया था। मुगलौने ही अन्तमें दी। ये विदर प्रान्तको सूपेदारी पा कर १४१५ मामनी राज्यको अन्तिम शापाको कार डाला। सलतानो प्रभुत्यको अन्योकार कर न्याधीन हो गये। प्रजा सुप्त-दुस्तके प्रति वाहनो-यंत्रके राजा मोका पद सग्दार दरिदगादीवर भादि पुरुष है। इनके ध्यान था। विना कारण ये हिन्दुओंको कष्ट न देने थे। घारीने "शाह" उपाधि प्रदान की गी। अहमदनगर हि लोग उनके शासन काल में कमी उप पद पर सौर वोडापुरके म्येदारों के साथ कनर होनेमे बन्दि नियुक्त नदी दुप, न उन्दै सामरिक विभागमे ही नियुक्त शादी राज्य बहुत कुछ धाप हो गया ।मन्त दाक्षि. दोनेका मधिकार था। ये ती यारी और कम तनवादमें ! पात्यमें मौरजेषको सूपेदारोले समय उन्होय. मादेशाने