पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२४८

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महाराष्ट्र सरदारने विशेष या अर्जन किया था। परयत्ती सुलतान सरदार थे ये भी कुतुब शाहफे राजामें घुस.फर विविध इब्राहिम फुतुबशाहके सिंहासनारोहणके उपलक्ष्यमें जो प्रकारसे उपद्रय करने लगे। ग्राहिम कुतुब शाहको गड़बड़ी मची थी, उसमें जगदेव रावने इब्राहिम को सबसे | अमलदारीके अन्तिम भागमें . मुरार राव नामक एक अधिक सहायता की थी। और तो पया, हग्राहिमको उस ब्राह्मणने मन्त्रित्व लाम किया था। राजनीति कुशलता. ने सिंहासनारूढ़ कराया था यह कहने में भी अत्युक्ति ! में ये सारे दाक्षिणात्यके समी मुसलमानों को परास्त नहीं । इससे इब्राहिम कुतरशाहने अपना मन्त्रिपद दे कर फर नेता बने थे। जगदेव रायको विशेष पुरष्कृत किया था। इस समय राय। इसके बाद आयू-हुसेन फुतुब शाहके ममलमें (सन् । राय नामक एक मरहठा-सरदारने अपनी कार्यदक्षता १६५८-८७ ३०) मरहठों को बड़ो उन्नति हुई। मदनपन्न दिखला कर सुलतानको विशेष प्रीति लाभ को थी। नामक एक ब्राह्मगने मन्त्रीका पद पाया.। मुरारपन्तको । इन दो सरदारोंके यत्नसे गोलकुएडा-दरवार और साम चेपासे मालगुजारी में सुधार होनेसे प्रजा खूब 'युगी रिक विभागमें वहुनेरे मरहठे भत्तों हो गये। मुसलमान थो । मुसलमान कर्मचारिगण उनका विसनावरण सरदारोंने यह देख असन्तो प्रकार किया और सुलतान करके भी मृतकार्य न हो सके । फुतव शाहने भन्तमें के सामने मरहठोंको सदा शिकायत किया करते थे।। मुगलों के हायसे रक्षा पानेके लिये शिंघाजीके पुत्र सुलतानने पहले तो उनकी बातों पर ध्यान तकन दिया. शामाजीसे सन्धि कर ली। इससे मंगल बड़े मध . किन्तु पीछे विचलित हो कर राय रायको प्राणदण्डको हुए। स्वयं औरङ्गजेबने उसके विरुद्ध याला कर गोल. आशा दो। जगदेव रावने यहांसे भाग कर निजाम । कुण्डाको दिल्ली में मिला लिया। शाहके राज्यमें आश्रय लिया। किन्तु वहांसे भी कुछ जातीय अभ्युदयके कारण। ' हो दिनों में उनको ऐसो स्याति बढ़ी, कि स्वयं निजाम पाठक ! इस इतिहासके पढ़नेसे यह स्पए मालूम साहयको भी भयभीत होना पड़ा । समग्र देश पर होगा, कि तीन सौ वर्ष राजत्वकालका प्रधमा प्यतोत अधिकार कर मुसलमान-यशके विलुप्त करने की जो होने पर ही मरहठो के अम्युइयंका घोज यपन हुभा इच्छा परवत्ती मरहठोंके हदयों बलवती हुई थी। इस : था। इस समयसै पहले मुसलमान अपने राजामे किसा समय उसकी प्रकाशता सूचना मिली। मशः जगदेव , ऊंचे पद पर हिन्दुओ को नियुक्त करते न थे। इधर राध क्षमताशाली हो उठे। इसके बाद उन्होंने बहुतेरे , उनके एकमात्र आश्रयस्थल विजयनगरफे रामा पर वार मरहठा, मुसलमान, अरवी, इरानी और हयशी-सैन्यको बार माझमण कर हिन्दू-शकिका मूलोच्छेद किया मा ले कर कुतवशाही राजा पर टूट पड़े, किन्तु इस युद्धम रहा था। फिर भो, महाराष्ट्रदेश- उनका शासन स्थायो । जगदेव रायको ही पराजय हुई। उस समय ये आदिल न हो सका। जिन सब कारणो'स मसलमानों का मघा शाहको अघोनतामें कार्य करने लगे। उनकी सहायता- पतन और मरहठों का युदय हुआ था, इस तरह । से फुतव शाहने भी निजाम शाहको वारम्बार युद्ध में जर्ज हैं:- रित कर दिया। यहाँके नायकों (जमींदारों) के साथ मुसलीम-सम्पता हिन्दू सम्यता पर अपना धित साजिश फर उन्होंने तेलङ्गदेशके भातर्गन अधिकांश कार न जमा सकी ! स्थापत्यशिल्प मादि इन दो एसके । किलों पर अपना प्रभुत्व जमा लिया। उस समय कुतुव! सिया प्रायः किसी विषय हो हिन्दू-सम्यता पर शाहने पर कर जगदेव रावके साथ सन्धि और मित्रता: प्रभाय विस्तार करने की शक्ति मुसलमानों को म यो। स्थापित कर सय यखेड़ोको तय कर दिया। नियाजी मुसलमानी सभ्यता महाराष्ट्र के प्रामों या सामामिक भीर शाहजीके पहले जग, राव जैसा महापरामम- 'माचार-विचार व्यवहार मादि जातित्यकी मिसियोंका गाली वीर मरहठा-सरदार और कोई पैदा न हुमा था1 यिनाश कर न सको। मुसलमानी सभ्यता के संघर्ष इस समय विजापुर के सुलतामफे अधीन जो मरहठा-1 से महाराष्ट्र-सभ्यताने अपने मस्तिस्यको रक्षा करनेमें