पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२५०

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'पहाराष्ट्र ऐसा हुआ था। मरहठों को स्वातन्त्राप्रियताका नमूना । धर्मोपदेशक भक्त कवियोंके जीवनको कार्यावलीके Im मुसलमानी राजामें इतिहासके पन्नों में भरा पड़ा है। घनिष्टभावमें सम्बन्ध रखता है। अगरेज इतिहास लेना । अतएव यहां धर्म और साहित्यगत उन्नतिका संक्षिप्त परिः , हिन्दूहृदयके धर्मभाव सम्बन्धमे गनमिशतानिधन स.. चय प्रदान करने से भी नहाराष्ट्र जातिके अभ्युदयका । प्रणीत इतिहास प्रन्थोंमें भी इन सब विषयोंका समावेश अध्यरहित कारण पाठकों को हृदयङ्गम हो सकता है। नहीं कर सके हैं। इसो कारण हमें यहां पर स्खतास · महाराष्ट्र-धर्मोन्नति । भावमै इस विषयका उल्लेख करना पड़ा। . . राजपूतों और सिखो की तरह मरहठों का अभ्युदय । बौद्धयुगके अवसानकालमें थोमस् शङ्कराचार्य के किसी व्यक्ति विशेषकी चेपासे या फेवल ,जातीय पौरुष ! यतसे चतुर्वर्ग मूलक प्राचीन वैदिक धर्मने, प्रवर्तित मीर गुणसे नहीं हुआ है। ये अभिनय धर्मामृत पान करनेसे : सुसंस्कृत हो कर महाराष्ट्र देश में जो भाकार धारण किया बलवान हो अभ्युदयके मार्गमें अग्रसर हुप थे। इसीसे : था वही महाराष्ट्र जातिको उन्नतिको पथ परिलकार कर . राजपूतो और सिखों को अपेक्षा इनको सफलता विशेष देता है । इस धर्मको महाराष्ट्रदेशमें भागयत धर्म . रूपसे हुई थी। फलतः समप्र जातिको बहुत दिनोंको कहते हैं । भागवत धर्मस पैदिक यागयज्ञादि और शिक्षा और साधना विविध तरहको तथा विभिन्न सम्म- । बौद्धों के शुष्क शानमार्गका माहालय हास हो कर गति , दायफी फमिक धर्मोन्नति और बहुसंख्यक मसाधारण प्रधान हरिसंकीर्तन, भजन-पूजनादि कार्य और जीव. पौरुषेय तथा अतुल बुद्धिवैभव आदि समताके फलसे : ब्रह्मका विश्वाम प्रधान मंगरूपमें गिना जाने टगा। महाराष्ट्र जातिका अभ्युदय हुआ था। इसो कारणसे बौद्धधर्म के प्रमायसं जो जातिभेदका मूल शिधिक हो उनकी उन्नति राजपूतों और सिखों की तरह एक देशीय गया था, अभो वह भी हद हो गया और उसोसे यश । न हो कर जगत्फे आन्यान्य सम्य जातियोंको तरह सर्वाः । परम्परागत गुणकर्मका उन्नति होने लगी । इस प्रया. ङ्गीण रूपसे साधित हुई थी। अच्छी तरह रोपा हुया ' का कुफल दूर करने के लिये इस नवपमंक प्रयत्न कौने पेड़ यड़ा होने पर जिस प्रकार फलफूलो से युक्त हो वर्तमान कालके संस्कारोंको तरद कहीं भी प्राण. दर्शकों के मन को मोहता है और कुछ दिन बाद फल प्राधान्यका लोप करने की चेष्टा न कर अपने कौशलसे फूलके झड़ जाने पर निस्तेज हो जाता है उसी प्रकार | प्रामणमिन्न जातिको मर्यादा पमिका रास्ता निकाला। महाराष्ट्रीयगण मुसलमानों के कयलसे छुटकारा पानेके | पहले ग्राह्मण-सेपा ही शूद्री के पक्ष मुक्तिका एकमास बाद उन्नतिके सोपान पर चढ़ कर अतुल ऐश्वर्य और उपाय-स्वरूप या। अभी उसके पाले में इस ऐश्वरीक घिस्तृत भूभागके अधीश्वर हुए थे। यहांको प्रायः | तत्यपूर्ण सरसधर्ममें ब्राह्मणों को तय नमादिका मो सभी श्रणियों में असंख्य समर-कुशल, दिग्यिायो पीर अधिकार हो गया। इस सेयाका उत्कर्ष दिवाकर मसाधारण प्रतिभासम्पन्न राजनैतिक धर्मसंस्कारफ, समाजमें सम्मागलामका पर मो परिकार कर दिया । मगजतः योगो, स्वभावमात कवि और समाजसंस्कारक गया। पेसो नूतन ध्यपस्थाफे फालसे महाराष्ट्र शर्म महापुरुषों ने गन्म ले कर महाराष्ट्रीय सभ्यताको परि. रामदास और एकनागस्यामी आदि ग्राह्मणमातानोने जैसा पुष्टि की यो। अमो उन सव.गुणों के प्रभावसे वे लोग सम्मान पाया था, संन्यासिपुत्र मानेभ्यः वैश्यावर मुका.. ऊपर वसलापे गये पेटकी तरह निधन हो गये हैं। राम, शूदजातिके मामदेय भौर वोघले बाया तथा सम्पा धर्मफे विना कभी भी किसी जाति या साहित्यको योसा मादि मगयन्द्रको मे भी पैसा दो सम्मान पाया, उन्नति मोर श्रीरद्धि नहीं होती। जिन सब कारणों से उससे किया भी मशमें कम महीं। परंतु माजन्म । महाराष्ट्रदेश में अग्रामण शूद्रों को इस प्रकार सर्व विषपणी ग्राण-तनया मुनाबाई यार कर्माबाईफो नगद सनादामी उन्नति हुई थी, उनमेंसे धर्मसंस्कार ही प्रधान कारण और मोराशई मादिगद शासीय मणियां भी मलिणे . था। महारराष्ट्रीय मातिफे मम्युदयका इतिहास यहां के प्रमायसे मायालासयनिताको प्रशामानन दुई गो।।