पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२५२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


२२४ महाराष्ट्र देशसे समस्त जाति के निस्तेज प्राणमें अतुल पलका: जनिक धर्म महोत्सवमें यह भाय परिपुष्ट हो कर मरः . . संचार हो पाया। अब मुसलमानों के अत्याचारसे , हठोंके स्वाभाविक सम्मिलन और शक्तिका पूर्ण विam स्वधर्म की रक्षा करनेके लिये वे लोग अपने प्राणको हुया। न्योछावर करने तय्यार हो गये। उक्त साधुगण जनः। आपाढ़ो और कार्तिकी एकादशो उपलसमें महाराष्ट्र साधारणको संसारमें रह कर सदाचार शान, भक्ति और । देशके प्रधान तीर्थ पण्डरपुरमें प्रतियपं यड़ा मेला लगता सब जीवों पर समान दृष्टि रखनेको शिक्षा देते थे। है। जिस समयको बात कहो जाती है, उस समय भी श्यरफे प्रेममय स्वरूप, सव जीयों में उनका अधिष्ठान, देशके सभी साधुसंन्यासी इस मेलेमें पाढरपुर आते साधनमार्गमें विभिन्नता रहते हुए भी साध्यविषयके थे। ये आपसमें तर्कवितर्क कर अपने अपने धर्म .. अभिन्नत्य सम्बन्धमें विश्वास, ये सब उन साधुपुरुषों के ; मतको मार्जित और गठित करनेकी कोशिश करते थे। उपदेशसे महाराष्ट्रवासियों के चित्तमें अच्छी तरह मुद्रित । इन सब विभिन्न देशसे धाये हुए साधुपुषयों के एक . हो गये। केवल यही नहीं, उनके उपदेशसे महाराष्ट्र । दर्शनलाम और तीर्थाधिष्ठात्री देवताको पूजा करने के वासियों में एकताका भी संचार हो गया था। लिये लाखो नरनारियां पएढरपुर भातो घो। महाराष्ट्र राजपूत जातिके मध्य जिस प्रकार एकताका अभाव देशमें खास कर पएटरपुरमें धर्मोत्सयके समय जात. देखा जाता है, मरहठों में वैसा नहीं है। शौर्य, साहस, ' पांतका विचार नहीं किया जाता था । माज भी यहां सहिष्णुता, सरलता और दूरदर्शिता आदि विविध सद् ब्राह्मणसे ले चण्डाल तक सभी एक जगह जमा होते गुणोंको नर एकता भी महाराष्ट्रजातिका एक स्वाभव और हरिकीर्तन करते हैं। उस समय नयदीक्षित सभी सिख गुण है। किन्तु उन लोगों के मध्य मराठा क्षत्रियों में ! श्रेणोके मरहठे भीमानदोक विस्तृत वालुकातट पर वियादप्रियता वा भ्रातृविरोधिता अत्यन्त प्रयल है। इसी इकट्ठे हो कर नाच गान के साथ हरिकीर्तन करते थे। दोपसे मुसलमान शोसनकर्ता विविध कौशलसे उनके भक्तहृदयके आनदोच्छाससे चारों ओर प्लायित हो मध्य विवाद यहि सुलगाने और उन पर अपना प्रभुत्व जाता था। उस मक्तितरङ्गमे गोता मार कर प्रमयियश. अक्षुण्ण रखनेमें समर्थ हुए थे। किन्तु पूर्वोक्त साधुः : चित्तसे ब्राह्मण चाण्डाल आपसमें मालिशन करते हुए पुरुष और भक कवियोंके उपदेश तथा धर्मप्रचार-गुणसे हरिकोर्शन करते थे। इससे उनका मापसका मनो- आपसकी विवाद वह्नि बढ़ने न पाई और उनके जातीय ! मालिना दूर हो जाता और एकताका सञ्चार होता था। अभ्युत्थानका सूत्रपात हुआ। आजकल जिस प्रकार जातोय महासमिति भऔर पाई। ___ नये धर्मामृतका आस्वाद चख कर उस समय मर- शिक समितिफ यार्षिक अधिवेशन के पटसे भारतय को धर्मविपासा ऐसी वढ गई थी, कि साधुपुरुषों के विभिन्न सम्प्रदायको शिक्षितमएडलोमें सहानुभूतिका धर्मोपदेशपूर्ण कथकता और संकीर्तन सुनने के लिये दूर संचार होता है, उसी प्रकार उस समयके साधुपुण्यों- दूर देशके लोग एक जगह जमा होते थे। शिवरात्रि, के यत्नसे महाराष्ट्रदेशमें होता था । भन्समें मरहठी. रामनवमी, जन्माष्टमो और प्रसिद्ध महापुरुषोंके आवि. फे इस प्रवल स्वधर्मानुरागने उन्हें स्वधर्मला लिये र्भाय और तिरोभायादि पर्यो में जब एक पक साधुपुरषके | मुसलमानों का मूलोच्छेद करने में उत्साहित किया था। आश्रममें अपरापर साधु-संन्यासिगण शिष्यमएडलोफे जो लोग इस महत् कार्यको करने के लिये अग्रसर हुए साथ आते और मधुर घोणा तथा मृदङ्गादि वजा फर! ये उनके अधिनायकका नाम यामदारमा गियानो , संकोत्तन और मक्तिका माहात्म्य गाते थे उस समय महाराष्ट्र देशकी तरह इस समय भारतवर्ष के सरे यहां हजारों की भीड़ लग जाती थी । इस प्रकार य दुमरे प्रदेशों में भी भकिमयान उदार मार्यजनिक धर्म में कई बार होता था। इससे घोरे पोरे आपसमें सहा- भोर सार्यनिक धर्म महोत्सयाक्किा प्रयासन हुआ था। गुभतिका सधार होने लगा। आपिर पएदरपुर, सार्य- : किन्तु महाराष्ट्र में इस मान्दोलग जमा अन्या पाल