पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२५४

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पहाराष्ट्र - - रनाथस्यामी थे। उनके बनाये हुए प्रयों में वृहदशाच्यः। ही पाण्डित्य और तर्फ विचारको बाहुल्य देवा मा गृत्ति, भगवद्गीताको टोका और योगयाशिष्ठका मा-है। पड़ दशन धौर मष्टादश पुराण यामनके करतलगत न्तर उल्लेखनीय है । मधुर पदविन्यासके गुणसे निम्नोक्त थे। निगमसार, जीयतत्य, कर्मतत्त्य, येदतरस, ए. तीन प्रयों का विशेष आदर है। स्तुति, नामसुधा, कृष्णलीला आदि विपयोंमें उन्होंने __रगनाथके भतीजे श्रीधर एक लोकप्रिय कवि थे। मौलिक अन्यको रचना की है। यथार्थदीपिकाको छोड़ उनके बनाये पाण्डवप्रताप, हरिविजय, रामविजय, शिव- कर अन्यान्य प्रन्योम प्रसादगुण यथेए देखा जाता है। लीलामृत और जैमिनीय अश्वमेघ ये पांच अन्य बड़े हो उनके बनाये हुए भदरिफे तीन शसफका मनुवाद मनोरम हैं। ऐसा अन्य महाराष्ट्रीय दक्षिण-पधौ यात अनेक जगह मूलप्रन्यको अपेक्षा बहुत सरस हुमा है। कम देखने में आता है। महाराष्ट्र-रमणी-समाजमें और महाराष्द्रदेशमें पामन जैसे उत्कृष्ट काव्यानुराद मौर संस्कृत भाषानभिश पाठकमएडलीमें श्रीघरसे बढ़ फर विद्वान् 'न भूतो न भविष्यति' अर्थात् न हुए ग दोंगे। और किसी भी कविका सम्मान नहीं हुआ। श्रीधरने सरलार्थपूर्ण यमक रचनाका चातुर्य उनको प्रतिमाका जित्ने मन्य बनाये उनमेंसे कोई भी ५० हजार लोकसे एक प्रधान गुण है। कमका नहीं है। एकनाथके पोते मुक्तेश्वर रामायण | और महाभारतके आधार पर दो स्वतन्त्र फायग्रन्थ लिख दिल कवि यामनके पूययती तथा महाराष्ट्रीय गये हैं। मुफ्तेश्वरका रामायण विशेष प्रशंसनीय नहीं भापामें यमक, चित्रकाध्य और फूटश्लोक रवगाफे प्रथम होने पर भी महाभारतमें उनको फयिप्रतिभाका जैसा पथमदर्शक थे। उन्होंने विहण चरित, रसमारो, यिद. परिचय पाया जाता है पैसा महाराष्ट्र साहित्य भरमें जोपन, सीता स्वयम्बर, पिमणी-स्ययम्बर और यह. संख्यक पदायलीको स्थना कर महाराष्ट्र साहित्यको फिसीका नहीं है। सोधकप्रवर 'पहिरापिसा'ने इस सेवा कर गये हैं। जयराम स्यामीका शान्तिपञ्चीकरण समय श्रीमद्भागयतका दशम स्कन्ध मराठी भाषा अनु तथा फेशय स्यामी, मानन्दस्यामो और मोरयादेय घाद किया। आदि कवियों की भक्तिमानपूर्ण कवितायलो भो उल्लेख. १०वी शताब्दोके दूसरे :श्रेष्ठ कवि वामन पण्डित नीय है। थे। वे भी यदुतसे प्रन्य रन गये है । पामन पदले घोर नयादी, फर्मकाएइके एफान्त पक्षपाती और कट्टर ___ अभी तुकाराम और गमक्षासका नामोल्लेख करमेमे वैष्णय थे। देवभाषा मित प्रापत जनकथित भाषामे ! ही इस युगके फयियों का परिचय एफ प्रकारसे शेष. वोलचाल करना घे पाप समझते थे। नाना देशाम हो जाता है। तुकारामका यरित और उनके पवित्र पर्यटन कर उन्होंने बहुतसे विजयपोका संग्रह किया। अमनका विषय पाठकों को अच्छी तरह मालूम होगा। था। किन्तु रामदास स्वामीफे निकर उनका पंचूर्ण तुकाराम राष्द देखो । उनको भगा नामफ भलिपूर्ण मा। तभीसे ये मतमतको भयलायन कर मकि- फपितामाला पढ़ कर बम्बई शिक्षायिभागफे भूतपूर्व दि. मार्गफे प्रचारमें लग गपे। रामदास स्वामीय उपदेश पटर सर मलेकसएकर प्राएट मदोषयने कहा है- से उन्होंने संस्कृतका परित्याग कर देशीय भाषामें प्राय: जिन्होंने सुझारामका ममह पढ़ा. उमफेनिकट मोनि- लिखना भारम्म कर दिया। मराठी भाषामें यथार्थ- तरयकी प्रशंसा करना gort दीपिका नामफ उन्दोंने जिस टीकाकी रचना को उसमें गोदापरीके किनारे सयुमाम, १६०८ को राम. षष्ठी दक्षता साप सांण्य, जैन, बौर भादि मतीका दासका जन्म हुआ। पयंपनमें रामको सामना , गएडन और अतायादका समर्थन किया गया। इनमा विशेष अनुराग था। ध्रय प्रहलादिका परित है। हानेश्वरके मायार्थदीपिकाका प्रसार-गुण जैसे : सुन कर स्वपन में ही उनके हृदय पर दमको मोतप्रोतभायमें विद्यमान है यपादोपिकाम मी पैसा: लालसा बलवती हो गां यो। पिाहमे पहले की ये