पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२६७

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महाराष्ट्र २३७ तक मुसलमान-शक्ति अक्षुण्ण रहेगी तब तक मर- च्यावान दिया था, उसका भी मम ऐसा ही था। मरहठों- हठे निश्चिन्त हो कर शान्तिरक्षा न कर सकेंगे। क्योंकि के दिल्लीके सिंहासन पर अधिकार न करने पर भी जब दिनों दिन क्षीण होते रहने पर भी उसकी अनेक शाखायें दूसरा इस पर अधिकार कर लेना चाहे, तब मरहठोंके हो भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों में परिव्याप्त हो रही थी। इस दिल्ली पर अधिकार कर लेने क्षति क्या है ? पेशयों के 'शाखाशक्तिसमूहके क्रमशः स्वातन्ता अवलम्बन करने मनमें १८वो शताब्दीके अन्त तक यहो भाव जमा हुआ 'पर भी वे अपनेको मुगलसाम्राज्यका प्रधान अययय : था। समग्र भारत में हिन्दुसाम्राज्यको स्थापनामें कमी .समझते थे। उनकी यह धारणा थो, कि भारतवर्षका दिन उठाना पड़ेगा, शिवाजीके समयमें इसका अनु शासनाधिकार भी न्यायानुसार उन्हीं को मिलना' मान किया जा नहीं सकता था। किन्तु पेशवों के लिये चाहिये। केन्द्रशक्तिका हास होने पर भी वे अपने यह वहुत तरहसे सहन हो गया था। विशेषतः दिल्लीके पाहुबलसे भारतके विविध अंशोंमें मुसलमान गौरव : प्रति समस्त जातिको कुदृष्टि करा दे सकने पर स्वदेशके अक्षुण्ण रखेंगे-ऐसा उन्होंने सङ्कल्प किया था। इस . छाटे छोटे मुसलमान राजाका नष्ट करना सहज दो .शाही शक्तिका विनाश होने पर भी ये अपना प्रभुत्व । जायेगा--यहो सोच कर वे अग्रगमननीतिको विशेष पक्ष. अक्षुण्ण रखनेमें विरत नहीं हुए। पाती थे। प्रतिनिधि परशुराम त्रिम्बक आदि कई राज. . मरहठोंने सोचा, कि शिवाजीक समयसे ५० वर्ष , पुरुष वाजीरावको आकताको न देख सकनेके कारण मनवरत चेष्टा करने पर जब मुसलमान शक्तिको दमन ' या अन्य किसी कारणसे भारतमें हिन्दू साम्राज्य

करनेमें हम समर्थ हुए हैं, हमने स्वदेश स्वतन्त्रताको स्थापनके घोर विरोधो धे।

'लौटा लिया है, तब सूयेदारोंको प्रभुत्व क्यों करने देंगे। परिणाम देख कर विचार करनेसे कहना होगा, कि 'दूसरे मुसलमानोंकी केन्द्रशक्तिके विनष्ट होने पर भारत- प्रतिनिधिका अपेक्षा पेरावाका नोनि हो अधिकतर श्रेय- . वर्ष एक तरह विना राजाका हो गया था। सभी मुगल-, स्कर थी। क्योंकि, दिल्लाकी शक्ति के क्षाण हात ही भार- सम्राटके स्थानको अपने वाहुबल और बुद्धि चातुर्यासे। तोय क्षमताशाली व्यकियोंने ही वादशाहा गौरयके उत्त- .अधिकारमें लेनेकी चेष्टा कर रहे थे। मरहठोंके साथ युद्ध, राधिकार या समस्त भारतका प्रभुत्व लाम करने की करनेसे ही मुगल-सिंहासन शक्तिहीन और शन्यप्रायः चेपा को थो । ऐसे समयमें उस प्रति मागिताक हुआ था। ऐसी दशामें उनके रहते मुसलमान आ कर क्षेत्रसे दूर रहना मरहठोंक लिये कठिन था । उशा- मुगलसिंहासनको अधिकार कर ले-मरहठे यह कैसे कांक्षा या दुराकांक्षाको अपेक्षा भात्म-रक्षिणा नोति. सद सकते थे। इसीसे देशमें फैले हुए मुसलमानोंका के वशवत्ता हो कर उन लोगों को इस पथका अनुसरण उच्छेद साधन कर महाराष्ट्र साम्राज्यका विस्तार करना करना पड़ा था। पचास वर्पक वाद गृरिता राज्य स्थापक • मरहठो ने अपना कर्त्तव्य स्थिर किया। महाराष्ट्रकेशरी । क्लाइव भी इसी तरहके विचार और कार्यप्रणालीका शिवाजीफे समयमें हो इस नीतिका सूत्रपात हुआ था। अनुसरण करने पर वाध्य हुए थे। बालाजी विश्वनाथ उन्होंने महाराष्ट्रके स्वाधीनता-सम्पादनके बाद दक्षिण ने सैयदोंके सहाय द्वारा दुर्यल वादशाहसे जिस तरह 'कर्नाटक प्रदेशको भी विजय किया था। इसी समयसे | चौथ और सरदेश-मुखीकी सनद मिली थी, सन् १७५५ कन्या कुमारी अन्तरीप तक मरहठों का प्रसार हुआ था। ई०में क्लाइयने भी उसो तरह शाह आलमसे दीवानीको इस समय उत्तरमें नर्मदाको पार कर दिलोके राजनीति सनद प्राम की थी। - -क्षेत्रमें प्रवेश करनेका अधिकार प्राप्त करनेको इच्छामे बाजीरावने शाहुके दरवाग्में जो भाषण दिया था .मरहठे योरों के लिये नितान्त स्वाभाविक था। और भविष्यमें कर्तव्य के लिये जिस नीतिका अनुमरण - बालाजी विश्वनाथ और उनके वंशधरोंके मनमें भी करना स्थिर किया था, उसके फलसे महाराष्ट्रमाताज्यमें - ऐसी धारणा हुई थी। वाजोरायने शाहुके दरवारमे जो एक सामन्तमण्डलीको संष्ठि हुई। उनकी स्थिर की हुई ___Vol, . .