पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२७८

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२४६ महाराष्ट्र फाशी, प्रयाग और अयोध्या-उद्धारको चेष्टा इस समय । कठिन दण्ड देना और प्रजाको लटना आदि आरम्भ कर . भी एक वार हुई थी; किन्तु कोई फल न निकला । जो| दिया। उसके जैसा लंपट कापुरुष महाराष्ट्र-समाजमें. कुछ हो, मरहठोंकी ऐसी वैमवोन्नति इससे पहले और इसके पहले कोई भी नहीं हुआ था। अदरेजो की कुटिल कमी भी नहीं हुई थी। अभी साम्राज्यमें जैसी नीतिका मर्म समझनेको उसमें बिलकुल शक्ति न हो। शान्ति विराजती थी, कि वाजोरावके भी समयमें वैसो आगे चल कर उसने सेनापतियोंको.inden न थी। यद्यपि पेशया माधवरावको उमर थोडी थी, करनेके लिपे अङ्गारेजों से सहायता मांगी। ऐसे व्यक्ति तो भी महाराष्ट्रीय सरदारमण्डली उनकी फरमायरदार हाथसे राज नष्ट होना. असम्भव नहीं। यशोषन्तराव :, थी। उत्तरमें शतद् से ले कर दक्षिण में तुङ्गमद्रा तक ] होलकरने एक बार अगरेजों को परास्त कर महाराष्ट्र- विस्तृत महाराष्ट्र-समाजमें एक भी शलु नजर नहीं पराक्रमण दिखलाया था। उनके मरने पर होलकरराज्य आता था। प्रातःस्मरणीया अहल्यावाईके मुशासनसे बालकको मोडाभूमि हो गया। शिन्दे रात दिन आमोद- मालव, येराय, नागपुर, गुजरात, महाराष्ट्र, कोकण आदि प्रमोदमें लिप्त रहता था। नागपुरमें भोसलेगण आपस. प्रदेशोंकी प्रजा सुखी थी। में लड़ कर खून बहाने लगे। राष्ट्रीय अधःपतनका . अधःपतन। । इतिहास पृथ्यो भरमें प्रायः एक-सा था। दुर्भाग्यवश ऐसी अवस्था सदाके लिये न रही। .. - जो नानाफड़नयोस बहुत दिन राज्यरक्षा फरक कालचकके परिवर्तनसे अनेक प्रतिकूल घटनाए घटी। सारे महाराष्ट्र-समाजके फ़तशताभाजन हो गये थे, . जिससे महाराष्ट्रोंके सौभाग्यसूर्य अस्ताचलके पथिक | उनको कैद करना हो वाजीरायका पहला काम था। इस होने चले। १९६४ ई०से लगायत १८०० ई०के मध्य | कामके लिये वह शिन्देको दो करोड़ रुपया देनेको राजी माधोजी शिन्दे आदि प्रधान प्रधान सेनापति और नाना. हुआ। शिन्देने नानाको कैद कर वाजोरावके हाथ फड़नवीस आदि राजनीतिज्ञ व्यकिगण एक एक कर सौंपा। वादमें उसने जव पूर्व कथनानुसार दो करोड़ परलोक सिधारे। पेशवा सवाई माधवरावका भी २१ रुपया मांगा, तब पेशवाने उसे पूना लट फर उतनी रकम वर्षको अवस्था (१७६५ ई० ) में देहान्त हुआ। ऐसी इकट्ठो करनेका हुकुम दिया। तदनुसार शिन्देने नगरके लगातार दुर्घटनासे थोड़े ही दिनोंके मध्य राजकार्य- प्रधान प्रधान व्यवसायियोंका खजाना लट फर दो करोड़ धुरन्धर व्यक्तियों और समर-कुशल सेनापतियोंके अभाव- रुपये जमा किये। इसके कुछ दिन बाद हो याजीराधने से महाराष्ट्र-समाज शक्तिहीन हो पड़ा। अनेक जगह जैसा मनमाना काम शुरू कर दिया, कि शिन्देको बाध्य 'अवला यत्र प्रयला वालो राजा निरक्षरो मन्त्री' हो गया। अतः सुकर्णधारके अभावसे महाराष्ट्रोंका राष्ट्रपोत हो कर नानाफड़नवीसको कारामुक्त करना पड़ा । किंतु नानाको अधिक दिन जीवित रह कर राजकार्यका कालसागर में डूब गया। संस्कार करनेका अवसर नहीं मिला। इस समय तरुणावस्थामें याजीराव महाराष्ट्र-सिंहा- सन पर बैठा। यह रघुनाथराव और आनन्दीवाईका महाराष्ट्र राज्यको विश्ललता देख कर शत्रु होने पुत्र था। माता पिताके सभी गुण उसमें पाये जाते मस्तक ऊंचा किया। निजामके दोयान मथुनुलमुलक थे। फल यह हुआ, कि कपटाचार और दुतताने | खुर्देकी लड़ाई में फेदो वन कर पूना में रहता था । इस .. पारुणी और वाराङ्गणा राजसमा प्रवेश किया। शोर्य, | समय बाजीराव उसे छोड़ देने तथा युद्ध में जितने देश साधुता और स्वदेशप्रीति धीरे धीरे लुप्त होने लगी। हाथ लगे थे उन्हें निजामको वापिस करनेमें वाध्य सामरिक खर्चको घटा कर यह विलासन्यसनमें राजस्व- हुए। शिन्दे और छोलफरक बोच इस समय अनयती का अधिकांश उड़ाने लगा। . छोटी छोटी बातोंके लिपे चल रही थी। याजीराप दोनोंमें मेल तो क्या कराते उस . उसने राजभक कर्मचारियोंकी हत्या करना, उन्हें कठिन | आगको और मो मुलगानेकी प्राणपणसे कोशिश करने