पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२८२

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महाराष्ट्र आदर पाते थे। मरहठे कवि भी अपने काय्यप्रन्यको प्रचलित। व्यवस्था हुई थी। फलतः फैदियों के प्रति कठोर पद.. फरनेके लिये राज साहाय्य लाभ करते थे। पटकमनिरत हार तथा फाँसीको सजा दी जाने लगी। राजद्रोहियोंको ब्राह्मणों को अपने अग्निहोत्रादि शास्त्रविहित अनुष्ठान निर्विन हाथोके पैरम यांध हाथोको दौड़ा कर उसका प्राण ले सुसम्पन्न करने के लिये ब्रह्मोत्तर सम्पत्ति दी जाती थी। लेते थे। किन्तु उस समय आजकल जैसी विद्रोहको ऐतिहासिक गीत गानेवाले भी राजदरवारसे उत्साहित ! बाहुल्यता न थी। सिंहासन अधिकार करने की चेष्टा किये जाते थे। पेशवा चेद-विद्यालय और फाव्यदर्शना- करनेवालेको राजद्रोही कहा जाता था। मद्यपायो राज.. दिके अध्ययनार्थ पाठशालादिको व्यवस्था और परिचा-/ विधिसे दण्डित होता था । त्रियों तथा ग्राह्मणोंको .. लनके सम्बन्धी भावश्यकीय अर्थ घ्यय करते थे। जो अपेक्षारत लघुदण्ड को दी व्यवस्था थी। व्यभिचारफे. लोग अपने व्ययसे विद्यालय या पाठशाला खुलवाते थे, | दोपसे स्त्रियां दासीकी तरह विकनो थों। उनसे उत्पन्न उनलोगोंको 'पाएट' आजकलका 'एड' या साहाय्य दिया - होनेवाली सन्तानकी भी दासमें गिनती होतो थी । दास. जाता था। दरिद्र पालकोंकी शिक्षा तथा उनके भोजन- . व्यवसायो इन्दों को ले कर अपना व्यवसाय चलाते थे। के लिये राजकोपसे प्यवस्था की जाती थी। शिल्पकलामें | शान्यरूपसे दासदासियों के प्रायः विक्रय करने के कोई . उत्साह देने के लिये शिल्पियोंको यनाई चोजोंको मरहठा | आशा न थी। राजे अधिक मूल्य दे कर खरीदते तथा अर्थाके पुरस्कारसे. जो राजकर्यमें विशेष क्षमता दिखाते थे, उनको उन्हें पुरस्कृत करते थे। विशेष सम्मानको उपाधिसे पुरस्कृत किया जाता था। पेशवोंने ऐसो व्यवस्था की थी, जिससे अदालतका महाराज शाहुने यह प्रथा प्रचलित को थी । महा-.. विचार निरपेक्षता तथा दक्षताके साथ चलता रहे । राष्ट्र राज्यके अन्त समय तक यह प्रथा प्रचलित थी। विचारकके पद पर व्यवहार-विशारद, युद्धिमान्, पाप- फिर आजकलकी तरह जिस किसीको उपाधियां नहीं भीर और साधुप्रकृति व्यक्ति ही रखे जाते थे। दीवानी मिला करती थी। विशेष गुण न दिल्याने पर किसीको मुकदमेमें घादी-प्रतिवादीका काम मनोनीत पञ्चके साहाय्य जल्द उपाधि प्राप्त नहीं होती थो । समराङ्गणमें तथा देशके से चलता था । इस तरहके विचारमें किसी पक्षको कार्य में जो जीयन विसर्जन करते थे, उनके सीपुत्र और किसी तरहके असन्तोपका कारण नहीं रह जाता था। आत्मीय सजनको बहुत वृत्ति मिलती थी। इस कार्य में राज्यके सय स्थानों के मुकदमोंकी अपील करनेके लिये | मरहठा राजे कभी भी पणता नहीं करते थे। शहरमें. पूनामें एक बड़ी अदालत भी रहती थी । फौजदारी | कोतवाल तथा ग्रामों में पटलों पर शान्तिरक्षाका भार मुकदमे में आसामीसे जुर्माना और प्रतियादोसे पुरस्कार धार्पित होता था। पेशयोंने कई बार प्ययसाय पाणिज्य. लिया जाता था। नानाफड़नवीसके मन्त्रिपद प्राप्ति की उन्नति के लिये उत्साह प्रदान किया था । देव. तक महाराष्ट्र राज्यमें असामियों के प्रति कठोर दण्डको माराधनाके लिये देयोत्तर भूसम्पत्ति भी पान दो व्यवस्था न थी। फांसी या शूली, कत्ल करना आदि | जाती थी। किसी तरहका प्राणदण्ड भी महाराष्ट्रमें न था। फिलेमें। __महाराष्ट्रीकी टकसाल। . कैद कर रखना हो उस समयकी बहुत बड़ी सजा थी। महात्मा शियाजीने दक्षिणमें स्वाधीन दिन्दूराज्य- .. कैदखानेमें भी फैदियों के प्रति कोई दुय यहार नहीं किया स्थापनका प्रयासी हो कर सन १६६३ ईमें सबसे पहले जाता था, वरं सद्व्यवहारकी ही व्यवस्था थी। इसके अपने नामसे धातुमुद्राका प्रचलन कराया। उसमें पहले वाद महाराष्ट्र शक्तिको अयनतिके साथ देशमें जिस तरह | मुसलमानोंकी अमलदारीमें मरहठोंके स्वतन्त्र मिपका अधिकतासे अराजकता बढ़ने लगी वैसे ही कठोर दण्ड- प्रचलित होनेका कोई प्रमाण नहीं मिलता। शिवाजीके का पिधान किया गया। कालकमसे चोर और लुटेरों पिता राजा शाहजोके समपने सब जगह आदिलशाही ' की अधिकता होनेसे धाकुओंको जानसे मार सालनेको । सिका चलता था। सन् १६७३ ६०में उनकी मृत्यु हुई।