पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२८५

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महाराष्ट्र . . २५३ • करते थे। किन्तु माधवराव पेशवाको अब पता लगा, किन होता था। किन्तु शिवाजी तथा शाहुको सिपकों कि इन टकसालोंमें खराब और नकलो रुपया भी तैयार पर (देवनागरी) हिन्दी अक्षर दिखाई देता है । कुलावाके होता है तब उन्होंने सन् १७६५ ई० में इन सब टकसालों- आंग्रे अपने सिक्कों पर 'श्री' खुदवाया करते थे। जश. को बन्द कर दिया। किन्तु यथा शोघ उन्होंने धार- वन्तराव होलकरके सिक्कों पर भी हिन्दी अक्षर रहता बाड़में पाण्डुरङ्ग नामक एक कर्मचारीफे तत्त्वविधान था। पेशयों के सिक्कों पर हिजरी सन् हिन्दी में तथा एक सरकारी टकसालघर पोला । यहां ही इन प्रदेशों के | अन्य विषय फारसीमें अङ्कित था। पाको सभी सिक्को' लिये रुपया ढलने लगा। उस समय जिम इकोस टक- । पर फारसी अक्षर ही खुढे रहते थे। गायकवाड, आदि सालोंको वन्द कर दिया गया था उनको नामावली पूना हिन्दू राजे भी फारसीके ही पक्षपाती थे। के दफ्तर में दिखाई देती है। कुछ दिनोंके बाद इन सब पेशवों के शासनकालमें रुपयेकी तरह अमी टकसालों में कुछ टकसाल खोलनेको फिर आज्ञा दी। चौअन्नी तथा दुअन्नीका भी प्रचार था। फिर पैसेका • गई थी। | भी प्रवार कम न था । किन्तु पैसके प्रचारमे किसी . सब प्रदेशों में एक ही तरहका सिक्का नहीं ढाला तरहकी रुकावट नहीं होती थी । उत्तर नर्मदासे • जाता था। यागलकोट प्रान्तमें भिवाजीराव पेशवोंके तुगभद्रा नक सभी जगह एक ही तरहका पैसा प्रचलित प्रधान सूर्यदार थे । वादामी, यागलकोट, हुमगुन्द आदि था। कुलावा, पनवेल, धारवाड़ आदि सभी उकसोलघरों- मौजे उनके अधीन थे। उनके हुषमसे जो सिक्का तैयार में शिवराई हो पैसा दलता था। इस पैसेकी एक पीठ होता था, लोग उसकी मल्हारशाही रुपया कहते थे। पर तीन सतरमें "श्रीराजा शिव" और दूसरी पीठ पर • इस सिक्केकी कीमत १५ आने ही थी। पेशवोंने इसी 'छत्रपति' खुदा रहता था। महाराज शाहुने अपने नामका सिषकेको सारे देश में चलाना चाहा था, इसके लिये। पैसा भी चलानेकी चेष्टा की थी। किन्तु उनको सफ- वे दो रुपये सैकड़े बट्टा भी देना चाहते थे। कुछ चला लता नहीं मिली। यह कहने की जरूरत नहीं, कि केवल भी था, किन्तु इससे राजकोपकी बड़ी हानि होने लगी। शिवराई हो पैसाके सारे देशमें प्रचलन होना महात्मा , अतः उन्हें यह उद्योग छोड़ देना पड़ा। शिवाजीके प्रति जनताफी श्रद्धाका द्योतक है। इस समय महाराष्ट्रदेशके मिन भिन्न प्रदेशोंमें भिन्न भिन्न प्रकारक! भो महाराष्ट्र के कई स्थानों में शिवराई पैसेका प्रचलन सिक्कों का प्रचलन था। उन सर्वोका नाम और मूल्य दिखाई देता है। सन् १३०८ फसलीमें यह अफवाह पेशवोंके दफ्तरमें लिपिवद्ध दिखाई देता है। अन्तिम फैलो, कि शिवराई पैसा उठा दिया जायेगा। इससे सारे पेशवा बाजीरावके समय एक पूनामें हो कई तरह। देशमें हलचल मच गई। किन्तु अधिकारियोंने एक विज्ञप्ति चांदोके सिक्के चलते थे । धातुको विशुद्धताके निकाल कर उस अफवाहको अलोक प्रमाणित किया। अनुसार उनके नाम और दाममें भी फर्क होता था। पेशों के समयका साहित्य मिष्टर चपलिनको रिपोटंसे मालूम होता है, कि पनामा पेशव.फे अभ्युदयकालमें महाराष्ट्र देशमें अच्छे रफसालघर सन् १८२२ ६०में वन्द हुआ था। किन्तु कुछ सङ्गीत गायक 'अमृत राय' ( १६६८.१७५३ ६० ) पैदा दिन बाद ही पाजारमें रुपयेका अभाव हो जाने पर हुए थे। घे "ब्राहाविद्यामरण" संस्थत प्रत्यक रच- फिर उसे खोलना और रुपये ढालनेका काम जारी। यिता और, काशीवासी मतानन्दस्वामीके शिष्य थे। करना पड़ा था। सन् १८३८ ई० में पूनाका टकसालघर लोगोंके मुइसे सुनाई देता है, कि उन्होंने विविध उपा. .. सदाके लिये यन्द हआ। बागलकोट, कोल्हापुर स्यान, पदावलो और सोता-स्वयम्बर आदि विषयों पर फुलावा भादिफे टकसालघर भी इसी समय बन्द | कितने ही पद पनाये । अमृत रायको वनाई कविता- 1. में यथेष्ट माधुर्म्य दिखाई देता है। रघु नाथ पण्डित उस समयके प्रायः सभी सिषकों पर फारसी अक्षर अमृतरायफे समसामयिक थे । उनका मलोपाध्यान ____Vol, ASII, 64 '" '.