पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२९३

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महादामदेव महाविद्या २६१ महावामदेष्य (स'० लो०) शान्तिकमौके समय पढ़ा । महायिदेह ( स० पु० ) पुण्यक्षेत्रभेद।। जानेवाला एक प्रकारका साम । महाविदेहा (स' स्त्रो०) योगशासके अनुसार मनकी महायायु (सपु०) १ प्रवल मटिका, भारी तूफान ।। एक वहिवत्ति। २ वायुभूत। महाधिया ( स० स्त्रो०) विद्यने ज्ञायते इति विव-षय महावारुणी ( स० स्रो०) वरुणो देवताऽस्या वरुण-अप टाप, महनी विद्याशानं तत्त्वसाक्षात्कारो धा यस्था। डोप महती पाणी। गंगा-स्नानका एक योग । गीण. देवीविशेष । इन महाविद्याको संख्या दश है, यथा-- चान्द्र चैत्रमासको कृष्ण त्रयोदशोके दिन वारणो योग काली, तारा, पोड़शी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, होता है। इस दिन यदि शनिवार और शतभिषा नक्षत्र : धूमावती, वगला, मातङ्गा, भोर कमलात्मिका । इन्हें हो, तो महामारुणो होती है। करोड़ सूर्यग्रहणमें गंगा- सिद्धचिद्या भी कहते हैं। इन महाविद्याका मन्त्र देने में स्नान करनेसे जो फल होता है, वहो फल महावारणोमें नक्षत्रविचार, कालादिशोधन, मन्लका शत्रु और मित्र गंगास्नान करनेसे होता है। आदि दोष कुछ भी नहीं होता । इनका मन्त्रमात भो "वागणेन समायुक्ता मधी कृष्णा भयोदशी । दिया जा सकता है। गंगामां यदि लभ्येत सूर्य ग्रहशतैः समा॥ "काली तारा महाविद्या पोहशी भुवनेश्वरी। शनिवारसमायुक्ता सा महावारुपी स्मृता । भैरवी निममता च विद्या धूमावती तथा।। गंगाएं यदि लभ्येत काटिसूर्य ग्रहै: सम॥" बगला सिद्धविद्या च मातमी कमलात्मिका (तिथितत्त्व ) । एता दश महाविद्याः सिद्धविद्या प्रकीर्तिताः ।। इस दिन स्नान-दान आदि पुष्पकार्य अनन्त फल-: नाप सिद्धाद्यपेक्षात न नक्षत्रविचारणा। दायक है। कालादिशोधन नास्ति न चामित्रादिदूषणम् ॥ महावाकिनी (स. स्त्री०) महावार्ताकुयक्ष, जंगली । सिद्धविद्यातया नात्र युगसेवा परिश्रमः। बैंगनका गाछ। नास्ति किञ्चिन्महादेवि दुःखसाध्य कथञ्चन ॥" महावात्तिक (स' क्ली०) कात्यायनकत पाणिनि-सूखकर (चामुपटातन्त्र) वार्तिक। महावापिका (स' स्रो० ) वृक्षभेद । तम्नमें लिखा है.-काली, नीला महादुर्गा, त्यरिता, महावालमिद (स.लि.) स्तोत्रभेद । छिन्नमस्ता, वाग्वादिनी अन्नपूर्णा, प्रत्यङ्गिरा, कामाख्या, महावास्तु (सली . ) महायतन । घासली, पाला, मातङ्गो सोर शैलवासिनी ये सब देवी महाबाहन (स: फ्ली) क पास पड़ी संख्याको मी महाविद्या हैं। नाम।। "अप वक्ष्याम्यहं या या महाविद्या महीतले । महावाहु- सह्याद्रि-वर्णित एक राजा। दोपजामेरसंस्पृष्टा स्ता: सर्वा हि पाने: सह ।। महाविमा (स.लि.) महान विक्रमो यस्य । १प्रयल काझी नीला महादुर्गा स्वरिता हिसमस्तका। पराममशालो, बड़ा प्रतापवान् । (पु०) २ सिंह । ३/ वागवादिनी चानपूर्या तथा प्रत्यगिरा पुनः ॥ नागमे । कामाख्या वारानी याना मातङ्गी शैक्षयासिनी । महाविक्रमिन् ( पु.) १ घोधिसत्यभेद । (वि.) इत्याद्याः सकमा विद्याः काली पूफिलम मिद्रमन्यतया नात्र पुगसंवापरिश्रमः। २ महाधिक्रपयुक्ता, जिसकी ग्यूब विको हो। भय चैता महाविद्याः कशिदोपान बाधिता" महाविघ्न ( स० पु०) प्रयल विघ्न, बड़ी बाधा। महाविक्ष ( स० त्रि.) महान् विज्ञः। अतिशय ज्ञानी, (नन्त्रमार ) महाविद्या देखो बड़ा हानवान् ।

मुण्डमालातन्समें लिखा -ये समी ,

voi. x/11 66