पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२९४

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२२ .. महावियु सभ-महांविषुवचन । 'Emaरहा था। इनमें से काटो रूपमें, तारिणो ! जाय। २ महाविप, एक प्रकारका कन्द। (ति। . मारने का की , हिम्नस्ता, महाविगविशिष्ट दहा जहरीदा। न रसन को विश नौक) वियु साम्यमस्पतति मित कर सिहा मरिहान्त इति यकः। पाशश ": ". .. .' इस संसारमा प्रत्ययःमय तद विषय अन शिराय: समस्यात् तदात्यं । मान र मोनराशिसे मेपराशिम भात .. Tom T a r महाविपुरसफान्ति कहते हैं। इस समय परता मान समान रहता है। इसीलिये इसका rerit मा नाम पहाविपुव हुमा है। इसका दूसरा नाम चैत्र. मकर फसन-रवि र संयन्ति भी है । चैतमाससे पेशाममास तक जिस समय हा व सूर्य संकम होता है, उसीको महायिपुयसंफान्ति कहते. । है। यह संक्रमण दिन बहुत ही पुण्यजनक है । इस पोशाप्रपादो- दिन मसूर और नीमपत्र खानेसे सर्पमय जाता Trarti ११.५ र, युको what TV २९, कमलामा "महाविदुयमाख्यातं कृतिभिचत्रचिहितम् ।" र १५ ARE FARोप पर, आंवले का तस्मिन मसनिम्यपत्यभन्नणं, यथा त्यचिन्तामणी २५. स र, म से। मिरमपूर्वक धोमो "मसूरं निम्बपराभ्यो योऽति मेषगते रवी। करे एक: RTE को प्रस्तुत करे। प्लीहा, अपि रेपान्वितस्तस्य तक्षकः किं करिष्यति" KARE RAM यो पर विशेष उपहारी है। पूर्वोक्त (तिथितत्य) होमो साना सोला यतलाई गई है। इस दिन सत्त और जल पूर्ण घटा दान करना दोता है। को रोग भवस्थानुसार इस अपघका | जो इस प्रकार दान करते हैं, ये परम गतिको प्राप्त होग MRP साता पाये। हैं। जलपूर्ण घड़ा दान करनेका मन्स- मVिA (NR) भार्याउन्दोभेद । "एष धर्मपटो दत्तो याविष्याशिवात्मकः । अस्य प्रदानान् सफशा मम सन्तु मनारया: ॥ महावित पु.) एक बहुत बड़ी संख्याका नाम।। घेशारी या घर पूर्ण समान्य खे द्विजन्मने । भिभूत सं० लि.) १ महापेभ्ययुक, वहा प्रतापी।। ददाति मुररागेन्द्र ययाति परमो गतिम् ।" तिथितष) पुर) विष्णु। पितृ मादिके उससे जालपूर्ण घड़ा, जूना, छाता महाविस (सं० पु०) विशेषेण राजते प्रकाशते इति । मादि दान करनेसे यहुन पुण्य होता है । जोस मिरा कि महाभासी विराट चेति । महाशयः। संकान्तिके दिन उक्त दान कर उनके समी पाप जाते (माययन पु. प्रतिख. ५१ .) रहते हैं। पिल (सं००) महरा तस् यिलम्चेति । १ माकाम। ...गदीशचनम्वुपटान्यितान।