पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/३६०

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महमूदशाह (१८)- महमूदशाह (२य) ५०७६० में पुंर्तगीजोंने जव घसाई और मादिम । मह मूदशाह (२य)-मालवराज सुलतान नासिरुद्दोनका नगरमें विद्रोह खड़ा कर दिया, तव सुलतान उनका दमन "तीसरा लड़का इतिहाँसमें यह सुलतान महमूद दिन करने के लिये दलेवलंके साथ रवाना हुए। मुसलमानी मासिरहोने नामसे मशहर है। पिताके मरने पर यह सेनापति मालिक आजिजके हाथ पुर्तगीजोंकी पूरी तरह १५११ ई० में मालवके सिंहासन पर बैठा। इसी समय 'हार हुई। १५०८ ६०में महमूद विगाड़ने 'शाशीर दुगको मालवाके उमरावाने बागी हो कर इसे गद्दी परसे उतार 'जीत' कर अपने नाती आलमखों दिन खांको चहाँका दिया और इसके छोटे भाई महम्मदको गद्दी पर बैठाया। मसिनाचनाया। ... . '. . .. .. .. अनन्तर मह मूदने सेना इकट्ठी करके माण्डु दुर्गमें लता मंत्राटी. . १५१० १० (११६ हि०)-में सुलतानने पत्तनको ओर घेरा डाला और महम्मदको वहांसे मार भगाया । महम्मद फंदम बढ़ाया। यहां उन्होंने मौलाना मुइनुद्दीन काजेणी ने गुजरातके राजा श्यं मुजफ्फरकी शरण ली। सुलतान और मौलाना ताज उद्दीन शिविरके साथ मुलाकात कर से सहायता पानेके पहले हो मालयके अंमोरीको विद्रोही ईश्वरतत्त्वको विशेष आलोचना की। चार दिन यहां पर देख वे सुलताने मुजफ्फरसे यिना सलाह लिये.ही मालय . रह कर अमदावादको वे चले गये । सरखेज नगरमें उन्हों। • आ कर उन लोगों के साथ मिल गये । मुसलमान अमीरों- मे शेख अह्मद खाट्टका मकबरा देखा था। को इस विद्रोहमें लिप्त देख कर सुलतान महमूदने अपने ___ अमदावाद भाते ही ये बीमार पड़े। तीन मास : विश्वस्त अनुचर मेदिनीरावको सेनापति बनाया। यहां रोग भुगतनेके बाद जब जीवनको आशा न देखी, तब तक कि उस समय मेदिनीराघ समस्त मोलयका हा. 'उन्होंने अपने प्रिय पुत्र शाहजादा. खलील खींको राज फिर्ता हो गया था। . . . . . . . . कार्यके सम्बन्धमें उपदेश देनेके लिये बड़ौदांसे बुला हिन्दुओंका इस प्रकार उन्नतिपय रोकनेके लिये स्वयं भेजा। किन्तु दुर्भाग्यवशतः खलोलके पहुंचनेसे पहले सुलतान मुजफ्फरने मालवाकी यात्रा कर दी। युवराज ही ६१७ हि०को रमजानको ५४ वर्ष राज्य करके इस सिकन्दर खा गुजराती सेनादलो अधिनायक हुए। लोफसे चल बसे । 'मृत्युकाल में इनकी उमर ६७ घर्पः । किन्तु मेदनीरायका वाल बाका भी न हुभाi. . की थी। .. ... .... . मेदिनीरावको 'मालय राज्य में प्रकृत राजशक्तिकी महमूदशाह (१म ) बङ्गालके एफ पठान शासनकर्ता परिचालना-करते देख • सुलतान महमूदने गुजरातके ११४४२-से १४५६ ई० तक ये बंगालके तख्त पर Jठे थे। 'राजासे सहायता 'मांगों आसिर मेदिनीराव एक महमूदावाद'नगरफे टकसालंघरमें अपने नाम पर उन्होंने विश्वस्त राजपूत अनुचरको सहायताले अपनी रानीको जो सिपके पनवाये थे उनमें से कुछ अभी वगुड़ा नगरसे साथ ले रातो रात गुर्जरपतिके यहां भाग आधे । राजा. मील उत्तर महास्थानगढ़में पाये गये हैं। इनके लड़के ने उनकी अच्छी, सातिर को थी। ... 'घरपाक शाहको कीर्ति दिनाजपुर आदि स्थानोंमें आज 1.11 चतुर मेदिनीरायको दण्ड देने के लिये गुजराधिपति भी विद्यमान है।' .. . ins दिल वलके साथ निकले। मालय सीमा पर देवल नगर महमूदीह (३ये) बट्लालके एक पठान सुलतान अला. में जब मुजफ्फरकी सेना पहुंची, तंव मेदिनीराव युद्ध उहीन हुसेनशाहके पुर्व और सुप्रसिद्ध नसरतंशाहक अवश्यम्भावी जान कर स्वयं धारा नगरकी घोर बढ़ने 'भाई । (१५३६ ई० दूसरेके मतसे १५३८ ई०) में शेर खाफे लगे। सादी खा राय पिथोरा, भीमकर्ण, यदन खाक् 'सेनापति खायाससाने वङ्गाल पर आक्रमण कर दिया। और उनसेनके हाथ माण्डुदुर्गका रिक्षा भार सौंपा गया 'मह मुदने भाग कर चुनार-दुर्गमे हुमायू की शरण ली। था। शव की सैन्य-संख्या अधिक देश मेदिनीरायने हुँमायू'ने दलयलके साथ आ कर पटना और गौडको भाग उलयिनीके राणाको शरण ली। इधर उनकी 'अधिकार किया। हुमायू'के लौटने पर शेरशाहने पुनः | सलाहसे माण्डुदुर्ग में जो सेना-मएडली थी उसने सुल. बङ्गाल पर कब्जा कर लिया। .. ! तान मुजपरफे पासासन्धिका प्रस्ताय करके भेजा।