पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/३६६

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१२० 'मात-पास . मांत ( हि० वि०) १ उन्मत्त, येसुध दीयाना, पागलं 1 घायु द्वारा धनीभूत होनेवाले पदार्थको मांसः' कहते हैं। ये रोगक, उदास । ४ हारा हुआ, पराजित । स्वकीय अग्नि कहनेसे रतधातु-गत धातुको अग्निको सम- मातना ( म० कि० ) उन्मत्त होना, पागल होना। झना चाहिये। मांसके कई भेद हैं। रससे रक्त धनता माता (हिं०.यि०) मतवाला, उन्मत्त। ..:. :. हैं, यहो रक्त गाढ़ा हो कर मांस हो जाता है। इस मांथ (हि पु०) माथा, सिर.... . . . .. .. , पफ रससे ही मेद, मस्थि आदि यनती है इसलिये । मांपघंधन (हि. पु.), १ सूत या ऊनको डोरी जिससे आहारजनित रसको ही मांस कह सकते हैं। क्योंकि नियां सिरके बाल वांधती हैं। इसे परांदा भी कहते हैं। मांस आदिका अश यदि रसमें नहीं होता, तो उस रक- २ सिर लपेटने या यांधनेका.फपड़ा, पगड़ी याः साफा। से.मांस नहीं बना सकता था। माँद (हि० वि०) १ ये रौनक, यदरंग। २ किसीके मुकायले- . . शोणितमिति शोणितस्थानगता में फोका, खराव या हल्का। ३ पराजित, हारा हुआ। दूस एवं शोणितसंशा लभते ।:::.. . (स्त्री०) ४ गोयरका यह देर जो पड़ा पड़ा झूख एवमो रमस्य व मांसादिव्यपदेशः ।" (भाषप्रकाश) जाता है और जो प्रायः जलानेके काम माता है। इसकी । यह मांस फिर पेशीके रूप में विभक्त होता है। मनुष्य- आंच उपलों की आंचके मुकाबले में मद या धीमी होती हाता शरीरमें शिरोपसे चाय वेगसे पहुंचती है। यह मांस है।५ हिंस्रक जन्तुके रहनका विवर, खोहा से टकरा कर इसके प्रयोजनानुसार मांसको पेशीफ माँदगी (फा० स्त्रो०) १ बीमारो, रोग। २ थकावर.. रूपमें परिणत कर देती है। इसमांसपेशीको संख्या माँदर (हिंपु०) एक प्रशारका मृदंग। इसे. मदल भी पांच सौ है। - शरीरके विभिन्न अशा मांसपेशीका कहते हैं। .....| ." ) रहना निणीत हो चुका है। पेशी देखो। .. ! मांदा (फा० वि०) १ थका हुआ । २ वचा हुआ, अवशिष्ट ."यथार्थमुष्मणा युक्तो वायुः सौतासि दारयेत् । (पु.) ३ रोगी, योमारी। . .

अनुविभ्य पिशितं पेशीविभजते तथा ॥

मापना (अ० कि० ) नशेम चूर होना उन्मत्त होना। | मापना देखो। मांसपेभ्यः सगाख्याता नृपा पञ्चरातानि हि मातानि चत्वारि शाखामु पंधितान्यय ॥" ...... माय (१० भव्य० ) में, यीच, मध्य। ...... .."" :"";. मांस ( सं० लो०) मन्यते इति ज्ञानार्थ मन्-सः दोधश्च ।। - .:::.:.:..:::. :: : (मने दीर्घच ।। उण ३१६४) रक्तनात धातुविशेष । इसे . . साधारणतः सभी तरहके मांसका गुण पायुनाशा, तृतीय धातु कहते हैं। चलित शब्द मांस है। सुख-शरीरका उपनयकारक, वलकर, पुष्टिजनक, प्रीतिक, गुरु, योधके मससे गर्भके पालकका आठवें महीनेमे मांस यनता हृदयनाही, मधुररस और, मधुरविपाक है।.. :: है। किन्तु भागयतका मत पृथक् है। इसके मतसे सर्व मांस वातयिध्वंसि गृष्य पयः रुच्य पृहणं तय मोस । चार महीने होम गर्भके पालझका मांस संयुक्त हो जाता देशस्यानच्यासात्मसंस्थं स्वभाव भयो नानारूपता याति नूनम् ।" । पर्याय:-पिशित, तरस,,पालल, प्या: आमिष, . .. : : ... (रामनि०) ..पल, मनज, जाङ्गल, कीर। .... मांस दो प्रकारका होता है, जाङ्गल मांस और अनुप मांसफा रूप कैसा है, किस ; पदार्थको मांसा: कहते मास। जाल, धिलस्य गुहाशय, वर्णमृग, विकिर, . है, इसके सम्बन्धमें भावप्रकाशमें लिखा है। .. प्रतुद, प्रसह भोर ग्राम्य पे ही आठ तरहको मांस जल- ....... "भोपित, स्वामिना पक यायुनोच घनीकृतम् । .., :: जातिके मांस है। इसोसे इसको जाल मास कहते सदेय मास जानीयात् तस्य भेदानपि प्रदे॥". ; : है। इनका, गुण मधुरं, पाय; रक्ष, लय, बलकारक, .. .... .(भायप्रकाश).! शरीरका उपचयकारक, शुक्रवक, अग्निप्रदीपक, दोषान ___ अर्थात् स्वकीय अग्नि द्वारा एकका परिपाक हो कर ' और मूकता, मिस्मिनता, गदगदता, अहित, यघिरता,