पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/३६८

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३२२ . मांस "कलेचराः नयाश्चापि कोशस्याः पादिनस्तथा । . . हरिणमांस शीतवीर्य, मलमूनरोधक अग्निप्रदीप मत्स्या एते समाख्याताः पञ्चधाऽनूपजातयः ॥ .. लघु, मधुररस, मधुरविपाफ, सुगन्धि पौर सन्निपात भानूपा मधुराः स्निग्धा गुरखो यहिनसादनाः। नाशक है। ग्लेष्मताः पिच्दशाश्चापि मांसपुष्टिप्रदा भृशम् ॥ एण अधात् काले हरिणका मांस-कपाय, मधुररसा तथाभिव्यन्दिनस्ते. हि प्रायः पथ्यतमाः स्मृताः ॥" ., धारक, चिकर, बलदायक और पित्त, रक्त, कफ, वायु (भावप्रकाश) और ज्वरनाशक। . . .. कुलेचर-मैंस, खड्ग (गैंडा), शूकर, चमरी और कुरङ्गमासका गुण-देहको उपचय करनेवाला, वल हाथी आदिको कुलेचर कहते हैं। इनका मांस वायु कर, शीतवीर्य, पित्तघ्न, गुरु, मधुररस, ' यायुनाशक, और पित्तजनक, शुक्रबद्धक, यलकर, मधुररस, शीतचोर्य, धारक और कुछ कफकारक है। स्निग्ध ( चिकना), मूत्रकारक और कफको पढ़ाने ऋष्यमांस--मधुररस, वलफारक, स्निग्ध, उग्णयोर्य घाला है। और कफ तथा पित्तवद्ध क। गवय, रोझ आदि भी __प्लष-हंस. सारस, वगुला, नन्दीमुखी आदिको प्लव | | मायके दूसरे नाम हैं। कहते हैं। ये सब पक्षी जलमें तैरते हैं और जलीय पदार्थ पृषत अर्थात् 'चीता बापका मांस-मधूर, रुचिकर, को हो खाते हैं, इससे इनका नाम प्राव हुआ है। जिस तथा दमा, ज्वर, त्रिदोष और रननाशक है। न्यङ्क: पक्षीकी चोंचके ऊपर मोटे, कठिन और गोलाकार जामुन- मांस-मधुरग्स, लघु,' बलदायक, शुक्रजनक और की तरह उभरा हुआ मांसपिण्ड रहता है, उस पक्षीको त्रिदोषनाशयः । 'सावरका मांस-चिकना, शीत. नन्दीमुखी कहते हैं। इन सबोंके मांस पित्तघ्न, स्निग्ध | 'घीयं, गुरु, मधुररस, मधुर विपाक, फफकारक और. (चिकना', मधुररस, गुरु, शीतवीय, सारक और वायु, । रक्तपित्तनाशक है। राजीव मांस पूर्वोक्त पृपत मांसकी फफ, बल और शुक्रवईफ हैं। तरहे गुणकारक है। मुएडोका मांस ज्वर, दमा, रन, ____ कोशस्य-शङ्क, सोप आदि इसी जातीय जीवोंको क्षय और खांसीको दूर करनेवाला है। यह शीतयीय है। कोशस्थ कहते हैं। इनका मांस मधुररस, चिकना, यातध्न, पित्तनाशक, शीतवीर्य, देहका उपचयकारक, 'लम्यकर्ण, लोमकर्ण, धूलो, पिलेयर, शश या शश- मलयद्धक, शुक्रजनक और पलकारफ है। . . ..; यह एक पर्याययाची शब्द है । इसका मांस-- ___पादी-कुम्भीर, फर्म, नक्र, गोधा, मकर ( घड़ियाल), शीतवीर्य, लघु, धारक, ' सक्षः मधुररस, अग्नि शङ्का और शिशुमार भादिको पादी कहते हैं। पादियोंके । व क; वायुका स्वधर्म रखनेवाला और ज्यर, अतिसाद मांसका गुण पूर्वोक्त कोशस्थ मासोंके समान ही है। | शाप, रक्तदोप, दमा, कफ और पित्तनाशक है। यह संय __ मत्स्प-मछली, मीन, विसार, झप, घुसारिण, . तरहसे हितकर है । संघी, शल्यक और यायित ये भएडज, शकलो, पृथुरोमा और सुदर्शन, ये कई एक. कई नाम साहीके हैं। इसका मांस दमा, खांसी, पर्यायके शब्द है। रोहित आदिको मत्स्य कहते हैं। रनदोष और निदोपनाशक है। .... इनका मांस चिकना, उणयौर्य, मधुररस, गुरू, कफयफ पक्षिमास-फलचर और अनूप देश भेदसे पक्षी दो पित्तजनक, वायुनाशक, देहका उपायकारक, शुक्र तरह के होते हैं । कुलचर पशोका मांस पलकारक, स्निग्ध (चिकना) और गुर होता है। पक्षियोंमें लाया पईक, गनिजनक तथा बलवर्धक है। मद्यपायो और मैथुनासक्त व्यकियोंके लिये मछलीका मांस बहुत ही चार तरहका होता है। पांशुल, गौरक, पौण्ड क' और . . . . . . . .दौर-इन चार तरह के लाया पक्षियोंके मामका गुण आनुप और जाइल मांसके साधारणतः गुणागुण । साधारणतः · आग्निकारक, चिकना, संयोग-विपनाशक, का वर्णन हो चुका, अब प्रत्येक मासका गुण अलगधारक.और हितजनक है। इनमें पांशुक, फरकारक, उष्ण- अलग लिखा जायगा। . . . . . . . ! घीर्य और यायुनानगुण है। गौरफ लघुतर, मश, मग्निः हितकर है।