पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/३७२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


३२८ मांस धर्मगारवकार यमने भी ग्राह्मण-कामनासे प्रोक्षित . स्तरते" इत्यादि मन्दसे मांसको शुद्ध कर लेना चाहिये। मांस भोणनको ध्ययस्था दी है। . ...... पञ्चमकार शोधनको जगह लिखा है, कि मध, मांस कदनेसे "मनयेत् प्राक्षितं मांस सवामणकाम्यया। . .. जो मालूम होता है, वास्तवमें यह उसका यथार्थ रूप नहीं देवेनियुक्तः श्राद्ध या नियमे च वियजयेत् ॥" है। कुलकुण्डलिनीशक्ति ही सुरा, परम शिव हो मांस, स्वयं (तिथितत्त्वधृत यमपचन.)। भैरव हो भोक्ता हैं। जिस समय शिवशकिका योग होता तन्त्रमारमें वैष्णवाचार निर्णयमें मांसभक्षणका है उस समय मोक्षमूल आनन्दका उदय होता है। आनन्द निषेध दिखाई देता है। नित्यातन्तके प्रथम पटलमें ही ब्रह्माका स्वरूप है। यह आनन्द साधकके शरीरमें ही लिखा है-येणयाचारपरायण व्यक्तिको मैथुन, मैथुना- मौजूद है। मुरा इसका ध्यक्षक है, इसीलिपे योगी सुरा. लाप, हिना, निन्दा, कौटिल्य और मांसभक्षणका परि- पान करते हैं। जो षट्चका भेद फरने में समर्थ है, जो त्याग कर देना चाहिये। पीठस्थानों को पार कर महापद्मवनमें पिहार या विवरण "मैथुनं तत्कयामापं कदाचिन्नेव कारयेत्। ...: कर सकते है, जो मूलाधारसे ग्रहलरन्ध्र तक बार बार जा हिंसा निन्दाच कौटिल्य' वर्जयेन्मांमभोजन ॥" फर चिन्मय परम शिवके साथ कुएडलिनी शक्तिका (मागतोपिणीधृत नित्या०) मामरस्य सम्पादनपूर्वक सहस्र दल, कमलमध्यगत तन्वमें मांस पञ्चमकारके द्वितीय मकार रूपसे उल्लि चन्द्रमण्डलसे अमृतपान करते हैं, वे हो यथार्थ में मय. शित है। पञ्चमकार देखो। पान करते हैं। - दूसरा जो लौकिक मय है, यह पाप- तन्त्रमें लिखा है,- जनक है। "मासन्नु प्रिविध शेय जलखेचरभूचरम् । . जो योगी शानरूप खड़ग द्वारा पुण्य और पापरूप त्रिविधं मांसस प्रोक्त देयताप्रीतिकारणम् " पशुका बलिदान फर परमवाहसमें चित्तलय हो जाते हैं, मांस तीन तरहका होता है-जलचर भूचर और उन्हीका मांस भक्षण करना यथार्थ होता है । अथवा जो म्येचर । इन तीन तरहके मांस देवताओंको प्रिय है। मनुष्य मनःप्रसूत इन्द्रियगणको संयमपूर्वक आरमागे । योजना करते हैं, ये हो यथार्थ मांसाहारी है और मांस गोमांस, भेडा, घोड़ा, भैसा, गधा, वकरा, ऊंट और खानेवाले प्राणिघातक हैं। मृग यह सब मांस भूचरमांस है। इन भूचरमासीको - "मुरा शक्तिः शिवो मांस तद्भोक्ता भैरवः रायम्। महामांस कहते हैं। तबोरक्य रामुत्पन्ने पानन्दो मान उच्यते ॥ "गोमेपारव महिपकगोधा जोष्ट्र मृगोद्भयम् । आनन्द बहायो रूप तप देह व्यास्थितम् । महामासाटक प्रोक्त देवता प्रीतिकारकम् ॥" (तन्त्रसार) . ' तस्याभिव्यञ्ज द्रव्य' योगिभिस्तेन पीयते ॥ " मांस द्वारा देवीकी पूजा करना चाहिये । यदि किसी निममयविशेषशः षटचक्रपाभेदकः। ... " तरह मांस न मिले तो उसके बदलेमें क्या करना चाहिये। पोठस्थानानि चागत्य महापद्मयनं प्रजेत् ॥ उसको व्यवस्था भी लिखी है। . भानूसाधारमानदारन्ध्र गत्या 'पुनः पुनः। । .. मांसका प्रतिनिधि-लवण, अदरक, पिण्याक, 1 . चिच्यन्द्रकुटनोनिसामरस्य महोदयः॥ . तिल, गोह, उड़द धीर लहसून ये मय मांसक प्रति व्योमनिस्यन्दमुधापानरेती नरः। निधि हैं। मांसके ममायमें यह सव चौतें दी जा सकती. मधुगनमिदं देरि तर मापानमम : ' ' . पुपयापुपपपर हत्या ज्ञानसन योगवित् । "लवण्याकपिपयाक तिनगोधूम मापकम् ।। परेम नदेधिपमाशीति निरायने। . लशुनय महादेवि मास प्रतिनिधि स्मृतः ॥" मानगादोन्द्रियगण संयम्यात्मनि गोजयेत् । . .(वन्यसार) मोसाशीच भयह शिवरे प्रायपनाशकः॥", , मांस गूप शुद्ध करके जाना चाहिये । प्रतद्-विष्णु , (गणार )