पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/३८७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


३४७ माड़-माणकादिगुड़िका माड़ ( स० पु० ) ताडको जातिका पफ पेड़। पर्याय--1 किसी किसी पुस्तकमें 'माड़व'फे स्थानमें 'मातर' .माहाद्रम, दोर्घ, ध्वजवृक्ष, वितानक मद्यद्रम | इसका। ऐसा भी देखा जाता है। गुण-मोहकारी, श्रमनाशक और श्लेप्मकारक । (राजनि०) माड्य ( हिं० पु०) माड़ो या मण्डप देखो। माड़ (हिं० पु०) मांड़ देखो। माड़वाड़-राजपुतानेके अन्तर्गत एक सामन्तराज्य । आज माड़-छोटा नागपुरमें रहनेवाली कृषिज्ञोधी एक जाति । कल यह योधपुर नामसे परिचित है। ये मालया राजपूत नामसे भो परिचित हैं। प्रवाद है, मारवाड़ और योधपुर देखो। कि उनके पूर्वपुरुप मालय क्षत्रिय थे। इनमें जनेउ माड़ाय्य ( स० वि०) मड़ाका सम्बन्धीय। पहरनेकी भी प्रथा यो । जलसे आ कर अपनो जियिका माह, ( स० पु० ) मड डुकवादनं शिल्प मस्पेति निर्वाहका कोई उपाय न देख वे खेती करने को बाध्य हुए। (मडु कममरादणन्यतरस्या। पा ४४५६) इति अण नीच वृत्ति प्रहण करनेसे हो ये संस्कार-विहीन हो पड़े। मह, नामक वाद्यवादक, मह नामक बाजा बजानेयाला । माइकिक (सं० पु.) माह क देखो। इनको आकृति प्रकृति आर्यवंशोद्भव असो मालूम माढ़ा ( हिं० पु०) १ अटारी परका वह चौबारा जिसकी पड़ती है। किन्तु जङ्गलमें वास करनेके कारण इनमें ! छत गोल मंडपके आकरफो हो । २ अटारी परका अनार्यका रक्तस्त्रोत बद गया है। बहुताने अनार्यकी । चौवारा । ३ मठा देखो। उपाधि प्रहण की है। मादि ( स० स्त्री० ) माहतोति माह ( अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते । ये हिन्दूकी सभी देव देवियोंका बड़े भक्ति भावसे उणे ४११०५) इति क्तिन् । १ देशमेद्र, एक देशका नाम । पूजन करते हैं। पूजा तय विवाहादि कार्य में पे ब्राह्मण- २ गतशिरी, पत्ते को नस । ३ एक प्रकारफा दांत । ४ को ही बुलाने हैं। खन्द जातिकी तरह इनमें मी सती. पतमङ्ग, साटी। ५ दैन्यप्रकाश, दीनता प्रकाश करना। पूजाका वड़ा ही आदर है। पहले इन से जो 'सती') माढ़ी ( सं स्त्रो०) मादि कंदिकारादिति डोप। १ दन्त- रमणी जोवन उत्सर्ग कर स्वामीको महगामिनी हुई है। शिरा, दांतोंका मूल । २पर्ण शिरा, पत्तोंको मर्स। ३ उनकी आज भो देवोयत् पूजा होती है। पत्ते का मकुर। . सम्प्रति इनकी सामाजिक अवस्था बहुत कुछ निकृष्ट मादो (हि. खो० । मढ़ी देखो। तथा बड़ी ही शोवनीय हो गई है। विधवा-विवाह तथा माण (स.पु.) कन्दविशेष, एक प्रकारका कन्द। 'सगाईको प्रथासे ये भौजाईके साथ भी विवाह कर ! माणक ( स०पु० ) मोयते पूज्यते परिमीयते वेति मान- 'सकते हैं। ‘मा धा घन साथै कन्, निपातनापणत्या स्वनामख्यात माइम (म0पु०) १ म्वनामल्यात वृक्षविशेष। यह कन्दविशेष, मानवंद । पर्याय--स्थलपन, माण, गृहच्छद्र 'कोहाणदेशमें पाया जाता है। २ नारियल, नारियल- छत्रपत्र । गुण-स्वादु, शीतल, गुरु, शोथहर, कट्ठ। का पेड़। (राजव०) माड़ना ( 80 कि० ) ठानना. मचाना । . माणकघृत (संको०) शोधाधिकारमें घृतोपविशेष । माड़ना (हि. कि० ) १ मंडित करना, भूपित करना। प्रस्तुत प्रणाली- घी चार सेर, चूर्णके लिये मानकंद एक .२ आदर करना, पूजना । ३ धारण करना, पहनना। सेर, काढ़े के लिये मानकच्चू साढे वारह सेर; जल एक ४ मदन करना, पैर या हाथसे मसलना। ५ घूमना, ! .फिरना। . . . मन २४ सेर, शेष १६ सेर। पीछे घृतपाकके नियमानुसार माइय (संपु० ) एक वर्णसंकर जाति । लेटके यौरस इस घृतको प्रस्तुत करना होगा। इसका सेवन करनेसे भौर तीघरकन्याके गर्भ से इस जातिको उत्पत्ति हुई है। ! एक दोपज, द्विदोया और खिदोपज शोथ नष्ट होता है। ... नेटस्तीवरकन्यायो जनयामास घपणरान। . । (भावप्र० शौथरोगाधि ) .... .. माल माल माड़वञ्च भई कॉलञ्च कन्दरम् ॥" माणकादिगुष्टिका (स' खो०) एक प्रकारको पीपय जो (ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्मखण्ड १० अ०) प्लीहायकदरोगमें वहुत लाभदायक है। प्रस्तुत प्रणाली ..