पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/३८९

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माणिकगाङ्गुली-माणिकचन्द्र ४८ वर्ग मोल और जनसंख्या पांच लाखके करीय है 11 कुछ हो, उन्होंने अति शीघ्र हरिश्चन्द्र राजाकी कन्या इसमें माणिकगञ्ज नामक एक शहर और १४६१ ग्राम उदुना पुदुनाके साथ पुत्र का विवाह कर दिया। लगते हैं। .. देखने देखते १८वा वर्ग आ पहुंचा। मैना स्थिर • •२ उक्त विभागका प्रधान नगर और विचारसदर ।। न रह सको। वे जानती थो, कि पुत्रके संन्यासग्रहणके यह अक्षा० २३.५२.४५उ तथा देशा० १०४ पू०के सिवा रक्षाका और कोई उपाय नहीं है। इस कारण मध्य पलेश्वर नदीके पश्चिमी किनारे अवस्थित है। प्रति उन्होंने पुतको बुला कर कहा, 'वत्स ! यह जगत् माया. वर्ष यहां एक हाट लगती है। का खेल है, सभी क्षणिक हैं, जो आज है. वह कल नहीं • माणिकगाङ्गुलो-धममङ्गलके प्रणेता एक बङ्गकवि।। है। अतएव यदि चिर शान्ति चाहते हो, तो इसी समय माणिकचन्द्र-उत्तरबङ्गके एक धर्मशोल प्रसिद्ध राजा रङ्ग । संन्यास प्रहण करो। राजधानीको पशुशालामें हाडिपा पुर और दिनाजपुर अञ्चलमें इनके तथा इनके पुत्र गोपी- सिद्ध रहते है उन्हींका चेला बनो। पहले तो राजा चन्द्र के खार्थत्यागका गान आज भी दोन दुःखीके मुखसे गोविन्दचन्द्रने सखऐश्वर्याका परित्याग कर योगी होना सुना जाता है। नहीं चाहा, किन्तु पीछे माताके उत्साह और उपदेशसे माणिकचन्द्र के गानसे हो मालूम होता है, कि माणिक मुग्ध हो उन्होंने हाड़ोसिद्धकी शरण ली। म'सार परि- चन्द्र एक बड़े धार्मिक राजा थे । प्रजाफे ऊपर उन. त्यागके समय राजा गोविंदचन्द्रको रानियोंने जो विलाप का किसी प्रकार अत्याचार नहीं था। मालगुजारी किया था. वह मर्मस्पी है । संसारत्यागके कालमें निहायत कम थी। प्रति गृहस्थसे हल पीछे डेढ़ पेसा । उन्होंने कनफटे योगियों की तरह कान फड़वा वह कुण्डल लिया जाता था। जब नया सचिव नियुक्त हुआ तब पहन लिया था। उसने मालगुजारी बढ़ा दो : किन्तु प्रजा बढ़ाई गई। ___गोविन्दचन्द्र के गीतमें लिखा है, कि पहले हाडिपोने मालगुजारी देनको बिलकुल राजी न हुई। सर्वोन विद्रोह | शिष्यको परीक्षा लेनेके लिये उन्हें भिक्षार्थ भेजा किंतु खड़ा कर दिया, यहां तक कि प्रधान के परामर्शसे ये सभी " भिक्षाफे लिये बाहर निकलनेसे पहले हाडिपा एक दैवज्ञ- 'राजाका काम तमाम करनेको तुल गये। के वेशमें प्रति प्रामौ जा गृहस्थसे कह आये थे, कि “आज - माणिकचन्द्रको खो मैनावती सिद्धा थीं। गोरक्ष- एक नवीन संन्यासी भिक्षाके लिये आयेगा, जो उसे भिक्षा 'नाथके निकट उन्होंने योगज्ञान सीखा था। ध्यान में उन्हें | देगा उसका धन उट जायगा। अत एव सर्वोको उचित पतिकी विपदका हाल मालुम हो गया। अब यह पतिको है, कि अपने अपने दरवाजेके मामने कांदा गाड़ रखे। रक्षाके लिये यथासाध्य चेष्टा करने लगी, किन्तु धर्म- 'इससे वह नवीन मन्यामी दरवाजे पर चढ़ने नहीं राजके हाथसे रक्षा न कर सकी। पनिके मरने पर उनके पायेगा।" सभी गृहस्थोंने वैसा ही किया । गोविन्दचंद्र .हृदयमें प्रतिहिंसानल धधक उठा।. उनका जीवन उनके गांव गांव घूमा, पर भिक्षा कहीं नहीं मिली। इस पर लिये योझसा मालूम पड़ने लगा। इस समय रानोके

  • हाडिपाने कहा, "जहां घूमने पर भी भीख नहीं मिलती,

सात मासका गर्भ था । गोरक्षनाधकै घरस -अठारह वहां रहना उचित नहीं। अतः हाड़िपा गोविन्दवन्द्रको .मासमें उनके एक परम सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। लेकर दक्षिणकी ओर चल दिये। वहां हाडिपाने हीरा- गोपीचन्द्र या,गोविन्दचन्द्र उसका नाम रखा गया । मैना' . दारी नामक एक वेश्याके यहां गोविन्दको बंधक रखा। जानती थी, कि उनके प्रियपुत्रका जीवनकाल मिर्फ अठारह वर्ष है। गोपीचन्द्र के एक और छोटा भाई था। यह हाड़ीसिद्ध जालन्धर सिद्ध नामसे बौद्धग्रन्थमें प्रसिद्ध . जिसका नाम बेतुआ लङ्कवर था। . हैं। तिब्बतीय बौद्धग्रंथमें भी हाड़िया , नाम भाया है । वे

अकालमें पतिवियोग और फिर, १८ वर्णमें पुनः गोरक्षनाथके शिष्य थे । हिन्दूमात्र उन्हें हठयोगी कहा

वियोग होगा, इस चिन्तासे मैना अस्थिर हो गई।, जो करते थे।।.. ___rol. XVII. .88