पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/३९

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मसाजद रहने के कारण कोई बड़े मन्दिर बनवानेको अमरत नहीं: एक मेहराव या किवला मकाकी ओर बनाया जाता है। .. जान पड़ी । इसलिये पहले पहल छोटी-सी एक कोठरीफ इमके निकट ही बगल में एक उच्च नबूतरा रहता है। रूपमै मसजिदको नींव डाली गई। क्रमशः मुसलमानों- इमको 'मिम्यार' कहते हैं। इसके सामने दी और कुछ की सैसे जैसे ताकत बढ़ती गई और जैसे जैसे धनवलसे, उच्च एक पटा हुआ स्थान रहता है। कभी कमो इमाम घलयान होते गये, वैसे वैसे ये बड़ी बड़ी इमारतों, मक- (धर्मयाजक) यहां हो यैठ कर भूतप्रेत शैतानको छुड़ाने- घरों और मसजिदोंको बनाने लगे। धीरे धीरे इनका के लिये दुआया ताबीज दिया करता है। इसके बगलमें हौसला बढ़ता गया। फिर क्या था, बड़ी बड़ी आलो. बने मामनों पर येट कर मुल्ला और मौलयो मुसल- शान इमारत तथा बड़े बड़े मकवरे, नवायी महल, वाद मानोंको कुरान सुनाया करते हैं। • शाही महल बन गये। साथ साथ अपने राज्यका भी महम्मदके मदीनेसे भागनेके याद पचास वर्षों तक पिस्तार करते गये। जब इसलाम वादगाहन पश्चिम भो मसजिदके ऊपर कोई (चूड़ागृह) कोठरी वनानेका यूरोपफे स्पेन और अफ्रिकाके चयर राज्य तथा पूर्वम नियम नहीं था। इसके बाद एक कोठरी यनाई जाने भारत और भारत-महासागरके दोपपुष तक फैल गई लगो। इसी समयसे मसजिदके साथ साथ ऐसी एक थी, तब उन इसलामो विजेताओंके अपूर्व उत्साहसे | या अधिक कोठरियां बनती है। यह कोठरी या छत • कई स्थानों में गैर मुसलीमोंके लेहको प्यासे इन मुसल- पर जानेके लिये एक सीढ़ी परकी छत भी कही जा •मानोंको कीर्तिध्यज्ञा मसजिदफे रूपमें गदल गई थी। सकती है। इसकी ऊपरयाली सीढ़ी पर खड़े होकर भारतीय पठान, मुगल, तुर्क और सरासोन वगैरह | 'मुपदोन' बड़े जोरों से आम लोगों को मजान दिया मुसलमान सुलतान और बादशाह जिन मसजिदोंको करता है। जानका अर्थ है, नमाज पढ़नेके थकफी धना कर अपनी कोर्ति स्थापित कर गये हैं, वे आज सूचना। यह भावाज सुन कर मुमलमान जान जाने संसारमें अतुल ऐश्वर्यसम्पन्न मुसलमानों के धमान हैं, कि नमाजका समय हो गया और मसजिदमें जा कर मादकताका परिचय दे रही है। विजापुरको जुम्मा नमाज पढ़ते हैं। चौपीस घण्टेमें मात चार 'अजान' • • मसजिद तथा आगरेको मोतो मसजिद इसलामो मजहब देनेका नियम है, दिनमें पांच बार और रातको दो को अतुलनीय फोचि हैं। वार । आम तौर पर दोनों गांवके अन्धे ही इस काममें .. आम तौर पर खुदाकी इबादत करनेके लिये या धर्मः मोकरैर किये जाते हैं, क्योंकि आपयाला व्यक्ति छत .सेवा करने के लिये मसजिदमें जो स्थान नियत रहते है। पर चढ़ कर पुलकामिनियों को पुरी इटिसे देख • उनको फिहरिस्त नीचे दी जाती है। सकता है। ... इसके बाहर आंगन या शहन रहता है। इसके प्रायः सभी मसजिदों के गर्भ धर्मप्राण मुसलमान 'चारों भार चहार-दोयारी (लीयान) रहती है। इस! ही दिया करते हैं। कितने ही लोग धन-दौलत और घिरी हुई जगहके ठीक बीचमें 'मोड़या' नामक स्थान | कितने हो लोग जमान जायदाद मसजिदके नाम लिख रहता है। सलाम मजहयका माननेवाला हरेक आदमी देते हैं, जिसकी मायसे सकाम चलता रहता है। नमाज पढ़नेसे पहले यहां खुदाफे लिये शौरनी चढ़ाने । इस धन-दौलत या जमीन जायदादका निरीक्षण करने हैं। मसजिदका जो मश मझाको भोर रहता है. यह पाला एक नामिर मुकरर रहना है । इमाम या अन्य दूसरे .पका यनता है। यानी उसमें छत अवश्य रहती है उसका नौकरके रहने और जया नेका मलत्यार गाजिर- 'मकसूर' कहते हैं । इस गृहका नोचला हिस्सा मांगन को ही रहता है। .से लगा नहीं रहता, बल्कि एक चहारदीयारीसे अलग बड़ी पट्टी मसजिद में दो इमाम मुकरैर किये जाते कर दिया रहता है। इसी घरमें सभी मुसलमान मा है। ये प्रति शुक्रवार को इसलामधर्म प्रचार करने कर नमाज पढ़ते हैं। इस घरफे भीतर ठीक बोच लिये व्यापान दिया करते हैं। जो हरेक शुभयारको Vol. Xvil. 9