पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/३९५

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".. माणिकपुर. ३५१ माणिकपुर-१ अयोध्या प्रदेशके गोण्डा जिलान्तर्गत एक। माणिकपुर नगर उन्नतिको चरमसीमा तक पहुंच गया परगना। भूपरिमाण १२७ वर्गमील है। था। इस समय साम्राज्यके गण्यमान्य उमरावोंने यहां २ उक्त परगनेका प्रधान सदर। पहले यह स्थान | बड़ी बड़ी इमारतें बना कर नगरको शोभाको और भी 'थाय जातिके अधिकार में था। पीछे भर जातिने इस यढ़ा दिया। सम्राट औरङ्गजेवने आगरा जाते समय पर दखल जमाया। भर-सरदार मकने ही मणिकपुर। एक बार इस नगरमें पदार्पण किया था। उनके आदेशसे नगरको वसाया। भर सरदारोके छः पोढ़ी यहां राज्य | सुबहकी इबादत करने के लिये रात भरमें यहां एक सुन्दर करने पर नेवालशाई नामक किसी चन्द्रवंशी राजपूतने । मसजिद वन गई थी। इसे दखल किया। उनके चंशधरोंने यहां धारह पोढ़ी मुगल-शक्तिके अवसानके यादसे हो इस नगरकी तक राज्य किया था। अन्तिम राजा अपुत्रक थे, इस श्रीवृद्धिका हास होने लगा। १७५१ ई० में रोहिलोंने तथा फारण उनकी स्त्रीने गोएडाके विपेपा राजपुत्रको गोद १७६०-६१ ई० में मरहठोंने इसे टूट कर तहस नहस कर लिया। तभोसे यह स्थान, उन्होंके अधिकारमें चला डाला। १७६२ ई०में भयोध्याके नवाब वजीर सुज्ञा. • आ रहा है। उद्दौलाने मरहठोंको परास्त किया। तभीसे यहां और माणिकपुर-अयोध्या प्रदेशके प्रतापगढ़ जिलान्तर्गत एक । कोई विलय होने न पाया। , परगना। यह गङ्गानदीके उत्तरी किनारे अवस्थित है। २ उक प्रतापगढ़ जिलेका एक नगर और माणिकपुर भूपरिमाण ८४ वर्गमील है। परगनेका विचार मदर । यह अक्षा० २५.४६ ३० तथा ऐतिहासिक घटनासे समाधित होनेके कारण इस । देशा० ८१.२६ पू०के मध्य गङ्गानदीके उत्तरी किनारे स्थानने जनताको दृष्टिको आरुष्ट किया है। कन्नोज- अवस्थित है। यहां मुगल-जमानेके बने हुए राजप्रासाद, राज़ बलदेयके छोटे लड़के मानदेवने इस नगरको भट्टालिका, मसजिद, पुष्पवाटिका और मकवरे आदि असाया। फिर किसीका यह भी कहना है, कि इति-। अभी भी भग्नावस्था में पड़े नजर आते हैं। हास प्रसिद्ध कन्नोज-राज जयादके छोटे भाई माणिक-। माणिकपुरमें वर्षमे दो बार धर्ममेला लगता है। एक चांद द्वारा यह नगर वसाया गया था। यहांके मुसल- आपाढ़ मासमें जवालादेवीके उद्देशसे और दूसरा मान शेख लोग कहते हैं, कि उनके पूर्वपुरपगण सैयद- कार्तिक मासमें गङ्गाम्नान के समय । इस समय लाखों सलारके आक्रमणकाल (१०३२-३३ ई० ) में यहां आ की भीड़ लग जाती है। कर बस गये। १९९३.६४ ई०में कन्नोज-राजवंशके हिन्दूकीर्तिके मध्य राजा जयचन्द्रफे भाई माणिषय- अधःपतनके बाद यह स्थान सचमुच मुसलमानोंके | चन्द्रकी गङ्गातोरयत्ती दुर्गवाटिका, विलखानाथका 'अधिकारमुक्त हुमा । किन्तु उस समय यहां मुसलमानों. ! मन्दिर, कुछ सप्राय बौद्धस्तूप तथा गङ्गातीरवत्ती का प्रभाव पूर्णतया प्रतिष्ठित न होनेके कारण पार्श्व ज्यालामुखो आदिका आधुनिक शैव और शाक्तमन्दिर पत्ती राजाओं के साथ उनका हमेशा युद्ध हुआ करता प्रधानतः उल्लेखनीय है। काड़ा दुर्ग के पूर्व द्वारमें - था। दिल्लीयर पहोल लोदीने जौनपुर जीत कर इसे, यशपालका जो शिलाफलक है उसे पढ़नेसे मालूम होता दिल्लो-साम्राज्य मिला लिया। किन्तु उनके मरने पर है, कि यह स्थान प्राचीन कौशाम्यो राज्यके अन्त. अन्तर्विलपसे दिल्लीराज्य कई टुकड़ों में वट गया, 'माय भुत था। साथ लेहकी धारा भी यहा यह चली। मुगल बादशाह माणिकपुर-युकप्रदेशके वादा जिलेका एक नगर। यह अकबर शाहके सुशासनसे यहां पुनः शान्ति स्थापित अक्षा० २५३३० उ० तथा देशा० ८१.८ २० पू० हुई। उक्त बादशाहने इस स्थानको इलाहावाद सुवाका मध्य अवस्थित है। वहाँ इष्टइण्डिया रेलचेको जम्बलपुर एक सरकारमुक्त बना कर शासनरहला स्थापन की शाखाका एक स्टेशन है जिससे अमो यह बाँदा जिलेका यो। उनके परयत्ती तीन मुगल बादशाह के जमानेमें वाणिज्यकेन्द्र समझा जाता है। . . ..