पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/४२२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


माधवराव नार यण-माधवश्री जगनायो १७७०६० कात्तिक माममें उन्होंने गोपालराव पट : सचिोंकी चेष्टासे घे पेशया पद पर अधिष्ठित हुए तथा चीन और मलहारराव रास्तियरके अघोन बहुसंख्यक उनकी माता गट्टावाई पेशवा और महाराष्ट्र-राज्यकी अध्यारोही भेजे। पीछे आप मो वीस हजार अध्यारोहो/ रक्षयित्रो हुई। उनके समयका विस्तृत विवरण रघुनाए या और १५ हजार पदानिकको ले कर युद्ध के लिये निकले। पौर नानाफड़नवीस शब्दमें देखो। ... :: : उनको जय पताका तमाम उड़ने लगो । बहुतसे देग माधवरामानन्द सरस्वती (सं० पु०) एकविण्यात पण्डित । उनके हाथ लगे। किन्तु दुर्भाग्ययशतः जेठके महीनेमे ये माधववर्मा-दाक्षिणात्यके, विष्णुकुण्डिन-यंशीय. एक यक्ष्मारोगसे आक्रान्त हुए। उनको विश्वास था, कि प्राचीन राजा । . . . . . कोल्हापुर सरदारकी माता के अभिशापस ही घे ऐसे माधयवली (सं० स्त्री० लताविशेष, एक प्रकारको लता। कठिन रोगमें से हैं। जो कुछ हो, वे मामा वाम्यकके माधयविद्यारण्य-माध्याचाय देखो। . . . ऊपर युद्धका भार दे पूना लौट आये। १७७१ ई० में माधववैद्य-आनन्दलहरी टोकाके प्रणेता। - - स्वास्थ्यलाभ करके उन्होंने फिरसे मामाका साथ दिया। माधवशास्त्री-एक विख्यात पण्डित । संन्यास माधम किन्तु कुछ दिन याद हो ये पुनः रोगग्रस्त हो लौटे। इस लेनेके याद ये रामचन्द्र तोर्थ नामसे परिचित हुये । पार युद्धका फुल भार वलवन्तराव पर सौंपा गया था। १३१७ ई०में इनकी मृत्यु हुई। भापा यलयन्तयो कौशलसे हैदर परास्त और पश्यता माधवशुल--एक प्राचीन पण्डित । ये फुककं पुत्र और . स्वीकार करनेको बाधा हुए थे । वर्षाकालमें माधव व्यासनारायणके पोत थे। इन्होंने १६५६ ई०में कुएडल- बिलकुल बगे हो गये । किन्तु दुःखका विषय था, कि | कल्पद्रुम नामफ एक प्रन्थ लिखा। . .. .. .. चैतमानमें ये पुनः बीमार पड़े। इस बार का रोग सत्र : माधयश्री (सं० स्त्री०) वसन्तशोभा, यसन्त ऋतुको बहार। मुच दुस्साध्य था। अब पेशया मरनेको तैयार हो गये। माधवश्रामामकर--सामुद्रिकचिन्तामणि नामक अन्यके उन्होंने रघु नाथरावको बुला कर उनके चरण स्पर्श किये रचयिता। मौर पूर्व अपराधके लिये क्षमा प्रार्थना को । माधवराव माधवधो जगाया--एक चैष्णव साधु । नीलगिरि धाम. फो अवस्था देख कर सचमुच रघु नाथराव रोने लगे। में समुद्र किनारे उनका वास था। उन्होंने सांसारिक माना देशोसे उन्होंने वैद्य और साधु संन्यासी बुला कर धर्मको छोड़ कर भगवत् भजनमें अपना जीवन उत्सर्ग कर भतीजे की चिकित्सा कराई, पर कोई फल न निकला। दिया था। क्रमशः भोगस्पृहा त्याग करनेके लिये विषय. मृत्युसे पहले माधवरायने अपने छोटे भाई नारायणराव पासनाको भी उन्हें छोड़ना पड़ा। उनके तीन दिन को चचाके हाथ सौंप दिया । धेउर नामक प्राममें हिन्दू निराहार रहने पर जगन्नाथ प्रभु स्थिर न रह सके। पुलसिलफ महाराष्ट्र के एक उज्ज्वल रतने इस लोकका रातको सोनेको थालीमें जो नैवेद्य उन्हें नित्य मति परित्याग फिया (१८यो नम्वर १७७२ १०)। इस उत्सर्ग किया जाता था उसो थालोको उन्होंने लक्ष्मी- समय उनको उमर सिर्फ २८ यप थी। उनके तिरोभाव ठाकुरानो द्वारा माधवको कुटीमें भेज विण । इधर के साथ साथ महाराष्ट्रको भाषा आशा भो अथाह जल- सोनेकी थालोको न देख मन्दिरके पएडा घर उधर मैं व गई। चोरको खोजने लगे। गन्तमें माधयदासके घरमें यह माधवराव नारायण - महाराष्ट्रके सप्तम पेशवा । पे पेशवा थालो देख उन्हें ही चोर पतला कर यतको मार देने नारायणरायके पुत गौर माधवरायके भतीजे थे। लगे। ठीक इसी समय महाप्रभुने संयकों के प्रति आदेश १७७४से १७६५ ६० तक उन्होंने पेशयापदका भोग किया फर कहा, "मैंने ही मोजके साथ यह थालो माधयको या। नारायणरायको मृत्युफे समय माधवराय-नारा फुटीमें भेज दी है।" : पण गर्भ में ही थे इसीलिये उनके जामसे पहले तक रघः एक समय भीर जप घे गामाशपसे पीड़ित हो जलके माथराव पेशवा रहे। उनके जम्मके वाद सरदार मौर। कारण घालू पर पड़े थे. उस समय भगवान्ने उसके '