पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/४२५

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. माधवाचार्य ३७७ रचित 'विद्यारण्यकालज्ञान' नामक पुस्तक पढ़नेसे माधवा वेदभाष्यके अलावा उन्होंने और भी कितने प्रन्योंको चार्य विषयमें इस प्रकार मालम होता है, रचना की, यथा--अधिकरणमाला, जैमिनीय न्यायमाला- । माधवने भुवनेश्वरोको प्रसन्न करने के लिये विद्या-1 विस्तर नामक मीमांसामन्थ, अनुभूतिप्रकाश, अपरोक्षानु रण्यमें आ कर कठोर तपस्या की। उनकी तपस्यासे | भृतिटोका, अभिनव-माधवीय नामक धमशास्त्र, आत्मा- संतुष्ट हो घर महामायाने उन्हें उसी धनमें गुप्तधन दिखा नात्मविवेक, आशीर्यादपद्धति, कर्मविपाक, कालनिर्णय दिया। माधवने उस अपर्याप्त धनसे वन कटवा कर वहां/ वा कालमाधवीय, कुरुक्षेत्रमाहात्म्य, कृष्णचरणपरिचर्या- एक नगर यसाया । तभोसे विद्यारण्य 'विद्यानगर' । पोछे विति, गोत्रप्रवरनिर्णय, जातियियेक, शतप्रश्न, जीय- चलित भाषामें विज्ञानगरम् ) नामसे प्रसिद्ध हुआ। न्मुक्तिविवेक, ज्ञानयोगखएडभाप्य, णत्वभेद, प्रम्बक- माधव भी विद्यारण्यस्वामी कहलाने लगे। इस प्रकार भाष्य, दक्षिणामूर्त्यष्टकटौका, दत्तकमीमांसा, दर्शपूर्ण- १२५८ शकमें विद्यानगरको प्रतिष्ठा हुई। प्रवाद है, कि मासप्रयोग, दर्शपूर्णमासयज्ञतन्त्र, धातुवृत्ति, पञ्चदशी, उन्होंने हरिहर और चुकरायको ला कर विद्यानगरमें ! पञ्चसारव्याख्या, पराशरमाधव (पराशर-स्मृतिका • वसायां। नाना स्थानों की शिलालिपि पढ़नेसे मालम आचार और व्यवहाराध्यायको विस्तृत व्याख्या ), पाणि- होता है, कि पण्डितप्रयर माधवाचार्य कम्पराजपुत्र सङ्गम- जीय शिक्षाभाष्य, पुराणसार, पुरुषार्थसुधानिधि, प्रमेय- राजके प्रधान मन्त्री थे। इन्हीं मङ्गमके पुनका नाम सारसंग्रह, ब्रह्मगोताटीका, भगवद्गीताभाष्य, महावाक्य- हरिहर भोर युक्कराय था । माधवकी अरण्य उपाधि देखने निर्णय, माधवीयवेदातभाष्य, मुक्तिखण्डटीका, मुहूर्त से मालम होता है, कि वे शङ्कराचार्यके दलभुक्त थे। माधयीय, यशतन्तसुधानिधि, यशवैभवखण्डटीका, शङ्करमठके संन्यासिगण केवल विद्यागौरवमें ही नहीं, योगवाशिष्ठतारसंग्रह, रामतत्त्वप्रकाश, लय जातकटीका, धनगौरवमे भी तमाम प्रसिद्ध थे। अधिक सम्भव है, ध्यासदर्शनप्रकार, शङ्करविलास, शिवखएडभाप्य, शिव कि प्रबल प्रतापी मुसलमानोंका प्रभाव ध्वस फरनेके माहात्म्यमाप्य, सर्वदशनसंग्रहः सहस्रनामकारिका, लिये उन्होंने सङ्गम वा उनके लड़के हरिहरको हिन्दूधर्म-/ सिद्धान्तविन्दु, स्कन्दपुराणीय सूतसंहितातात्पर्यदीपिका, रक्षा में नियुक्त किया था। उन्होंने जो इस दारुण दुर्दिनमें स्मृतिसंग्रह, स्वरविप्रहशिक्षाभाष्य, हरिस्तुतिटीका । ६० भी वेदमार्गप्रवर्तनकी यथेट चेष्टा की थी तथा विजय- वर्षको अवस्थामें इनका परलोकवास हुआ। नगरफे राजगण जो उनके अनुवती हुए थे उसको प्रष्ट परिचय उनके विराट चेदभाष्यसे मालम होता है। माधवाचार्य-विश्वेश्वराचार्य और भगीरथाचार्य नामक सायणाचार्य देखो। और तो फ्या, माधयाचा एक प्रसिद्ध दो मित्र थे। दोनों एक ही गांयमें रहते थे। दोनोंकी राजनैतिक परम तापस तथा जाति और स्वधर्मरक्षामें स्त्रियां भी एक दूसरेको वहिनके समान देखती थीं। तत्पर थे। वे एक हाथमें शास्त्र और दूसरे हाथमें शस्त्र | विश्वेश्वरको खोका नाम महालक्ष्मी था। एक दिन ले कर कर्मक्षेत्रमें उतरे थे। जिन्होंने गोआके इतिहास महालक्ष्मी वोमार पड़ी। सखीको देखने के लिये भगी. की भालोचना की है, ये ही जानते हैं, कि १४यी रथाचार्यको स्त्री जयदुर्गा उसके घर गई। महालक्ष्मीने शताब्दी में जब मुसलमानोंने गोमन्त (गोआ) जीत कर | जयदुगोको देख धेयं वाधा और अपने पुत्र माधवको हिन्दूवेयालय तथा देवमूर्तियोंको तोड़नेको कोशिश की सखोके हाथ सौंपा। इसके बाद ही यह इस लीकसे चल थी, तब किस प्रकार माधवाचार्यके प्राण रो उठे थे।। बसी । जयदुर्गा अपने पुत्रके समान माधयका लालन- पोछे उन्होंने बहुत-सी सेना ले कर १३१३ शकमें मुसल. पालन करने लगी। विश्वेश्वरने ग्रहको त्याग कर संन्यास मानोंके करालकपलसे गोमा नगरीका उद्धार किया। धर्म ग्रहण किया। इसलिये माधव भगीरथके हो तृतीय उनके वंशधरीने सौ वर्ष तक यहांका शासन किया था। पुवरूपमें गिने जाने लगे। यही माधव आगे चल कर गोया देखो।। नाना शास्रम - पारदशी हो भाचार्यको उपाधिसे Vol, XVII, 95