पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/४३१

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माध्यन्दिनेय-माध्याकर्षण माध्यन्दिनेय (सं० पु.) १ मध्यदिन सम्बन्धी यज्ञ, दो-। होता है. इसके निरोध या भाव नहीं है। सभी स्वप्न-

पहरका यश २ मध्य, बोच ।

वत् है। यथार्थ में जिन्होंने निर्वाण प्राप्त किया है माध्यम (स.नि.) मध्ये भवं मध्य ( अन्तःपूर्व पदाट । और जिन्होंने नहीं किया है, दोनों ही समान हैं, कुछ ठञ् । पा ४१३१६०) इत्यस्य काशिकासूबवृत्ती 'मणमीयी भी विशेषता नहीं है। माधवाचायने सर्वदर्शनसंग्रह- च प्रत्ययो यतथ्यो' इति मग। १ मध्यमय, मध्यका, में भी ठीक इसी प्रकार माध्यमिक मत प्रकाश किया धीचवाला। है,-'माध्यमिक मत कुछ भी नहीं है--सभी शून्य है। ... "मध्यम माध्यम मध्यमीय माध्यन्दिनञ्च तत् ॥" (हेम) जो सब वस्तु स्वप्नमें देखो जाती हैं वह गतेमें कुछ .. (पु०)२.वह जिसके द्वारा कोई कार्य सम्पन्न हो, भी देखो नहीं जाती। फिर जो वस्तु जगते में दृष्टि फायसिद्धिका उपाय या साधन । गोचर होती है, स्वप्नमें वह कुछ भी नजर नहीं आती, माध्यमक (सं० वि०) काउके अन्तर्गत मध्य शाखा। सोतेमें कोई वस्तु दिखाई नहीं देती है । इससे स्पष्ट माध्यमकेय (सं. पु.) जातिविशेष । ज्ञात होता है, कि वस्तुनः कुछ भी नहीं है सभी स्वप्न माध्यमिक (स० पु०) १ मध्यदेश । २ मध्यदेशका यत् है केवल शून्य हो तत्व है।' निवासी। माध्यमिकगण 'माया' शब्दको नहीं मानते । साडाक माध्यमिक-बौद्धोंका दार्शनिक मतभेद । बौद्धोंका चार प्रधान और प्रकृतिकी तरह वे 'प्रज्ञा' और 'उपाय'-का मंत बड़ा ही प्रवल हुगा था जिनमें वैभाषिक और व्यवहार करते हैं। उनके मतानुसार मूल जो सत्य • 'सीलान्तिक हीनयानमतानुवत्ती तथा योगाचार और है उसमे भला बुरा कुछ भी नही है। माया हीसे पाप माध्यमिक महायान समर्थक हैं। महायान देखो। पुण्य होता है- माध्यमिक लोग बहुत कुछ शन्यवादी या पूर्ण नास्तिक "मायापुरुषघातादौ चित्ताभावानपापकान् । । समझे जाते हैं। यहुतोंका विश्वास है, कि सुप्रसिद्ध चित्त मायासमेते तु पापपुण्य समुद्भवः ।।" ( शान्तिदेय ) नागार्जुगने हो आदि युद्धमतका सार संग्रह फर इस मतका प्रचार किया । सांख्यप्रवचनभाष्य ( १२२२) में माध्यामिनेय ( स० पु० ) मध्यमाका अपत्य । - . विज्ञान भिक्ष ने जिस नामरूपका खण्डन किया है, माध्य- माध्यस्थ (सनि०)१ मध्यवर्ती, दो मनुष्यों या.पोंके मिक भी पैदान्तिकके समान उस चूहान्त नामरूपको पोचमे पड़ कर किसी वाद विवाद आदिका निपटेरा स्वीकार कर गये हैं। वेदान्त-भाष्यकार शङ्करने जिस | करनेवाला, पंच । २ पक्षपातशून्य, निरपेक्ष । ३ कुटना । प्रकार 'पारमार्थिक' और 'व्यवहारिक' इन दो स्थूल | ४ दलाल। ५ध्याह करानेवाला ब्राह्मण, घरेखो। . -सत्यको स्वीकार किया है, माध्यमिकोंने भी उसी प्रकार माध्यस्थ्य ( स० की.) १ मध्यस्थ होनेका भाव, मध्य. 'परमा' और 'संपति'को माना है। बोधिचर्यायतारमें स्थता। २ श्रीदासोन्य, उदासीनता। शान्तिदेवने लिखा है,- . माध्याकर्षण ( स० लो०) पृथ्वीके मध्य भागका यह "संवृति: परमार्थ च सत्यद्वयमिदं मतम् । आकर्षण जो सदा सव पदार्थों को अपनी ओर खींचना पुरंगोचरस्तत्त्व बुद्धिः संवृतिरुच्यते ॥ २ रहता है और जिसके कारण सब पदार्थ गिर कर जमीन एव न च निरोधोऽस्ति न च मावोऽस्ति सर्वदा। पर आ पड़ते हैं। .... प्रजातमविरुद्धश्च तस्मात् सर्वमिदं जगत् ।। १५० . ____ इङ्गलैएडके प्रसिद्ध तत्त्ववेत्ता न्यूटनने वृक्षसे एक T.: स्वप्नोपमास्नु गतयो विचारे कदलीसमाः । सेवको जमीन पर गिरते हुए देख कर यह सिद्धान्त 1.नि तानिवृतानाच विशेषो मास्ति वस्तुतः ॥" १५१. स्थिर किया था, कि पृथ्वीके मध्य भागमें एक ऐसी तरवद्धिकी, अगोचर यही धुद्धि संवृति है। यह आकर्षणशक्ति है जिसके द्वारा सब पदार्थ यदि धीचमें . समस्त संसार फंभी उत्पन्न नहीं होता और न बद्ध हो। कोई चीज वोधक न हो, तो उसकी ओर खिच माते Pol. AYII, 96