पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/४३७

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३८५ माध्वब्राह्मण कार्योपलक्षमें प्रस्तुन पिएकाटिका धाद्धादिमें नया श्राद्ध । हैं। केवल राजा और रानी अपने पैरों में सोनेके अल- 'कार्य में प्रस्तुत पिटकादिका विवाहादिमें व्यवहार विल- कारादि पहन सकती हैं। क्योंकि जनता उन्हें देवता 'कुल निषिद्ध है। भोजके समय पहले कुल सामनो विष्णु, समझ कर पूजती है। लक्ष्मी और हनुमानको उत्सर्ग करते और तव लोगोंके माध्यब्राह्मण साधारणतः कार्यदक्ष, विनीत, परि. चोच परोसते हैं। शुभकार्यादि उपलक्षमें भोजन के समय । फार परिच्छन्न और अतिथिवत्सल होते हैं। शास्त्रान- केलेके पत्ते का जो अंश वाम भागमें रहता है, श्रादादि । मोदित क्रियाकलाप तथा नानाविध व्रतनियमादिके अनु- उपलक्षमें भोजनके समय वह अंश दक्षिण भागमें रखना । टानमें सभी तत्पर रहते हैं। शिवराल तथा होलीमें होता है। सभी उत्सव मनाते और एकादशी तथा जन्माष्टमीमें ___ छोटे छोटे बच्चोंको छोड़ कर सूर्योदय और सूर्यास्त- ; उपवास करते हैं । विष्णुपञ्चरात तथा चान्द्रायणका के मध्य कोई भी दो बार नहीं पाता। विधवा दिनमें ' अनुष्ठान भी सर्वत्र दिखाई देता है। समय समय पर ये एक वार नाती और रातको सिर्पा जल पी कर रहती। काशी, वदरिकाश्रम आदि प्रधान प्रधान तीर्थों के भी है। पर्वाह, पक्षान्त, मकरसंक्रान्ति, विषयसंक्रान्ति आदि, दर्शन करने जाते हैं। हरपकको दीक्षागुरसे मन्त्र लेना दिनों में ब्राह्मणमात्रको ही एकाहारी रहना होता है। पड़ता है । विवाहित व्यक्ति भी दीक्षा-गुरु हो सकते हैं। ___ माध्वत्राह्मणोंकी धारणा है, कि रातमें ब्राह्मण-भोजन किन्तु दीक्षागुरु होनेके बाद वह स्त्रीका मुखदर्शन अथवा करानेसे अत्यन्त पुण्य होता है। भोजन करने के बाद किसी कन्याको पाणिग्रहण नहीं कर सकता। गर्भा- फोई पान खाता, कोई तमाकू पोता और कोई नस | धानसे ले कर अन्त्येष्टि तक सोलह प्रकारके संस्कार लेता है। प्रचलित हैं। प्रथम प्रसबके समय कन्याको अपने मैके इनकी स्त्रियां फुरता पहनती हैं। विधवा सफेद | जाना होता है। प्रसवफे समय जब अधिक वेदना मालम साड़ी पहनती और उत्तरीयसे अपने शरीरको ढके रहती होती है, तय पुरानी मुहरको जल में धो कर वही जल है। ब्राह्मण शिखामान रख कर शिर मुड़वाते हैं। उसे पिलाया जाता है। इससे प्रसूति सुन्नपूर्वक प्रसव उपनयनसे पहले वालकोंका मस्तकमुण्डन नहीं होता। कर सकती है। शिशुके भूमिष्ठ होते ही एक पद्दुत पुरानी पुरुषमात्र ही मूछ रखते हैं। वालिका और विवाहिता सोनेको अंगूठीको मधुमें डाल कर दो एक वूद यही स्त्रियां जुड़ा बांधती है और उसे तरह तरहकी पुष्प-.मधु उसको मुख में दिया जाता है। जातकर्मसे निकमण मालासे सजाती सी हैं। और अन्नप्रशनसे विवाह पर्यन्त सभी संस्कार नियम- ___पाश्चात्य शिक्षा और सभ्यताके प्रादुर्भावसे अङ्ग- पूर्वक होते हैं। लड़केको मासी हो उसका नाम रखती रेजी शिक्षित युवकों से कितने बिलायती पोशाक है । इस समय उसे नया कपड़ा मिलता है। शौकीन हो गये हैं। माध्य-संन्यासीको वेशभूषा स्वतन्त्र बालकका उपनयन संस्कार बड़ी धूमधामसे होता है। वे सिर्फ गेस कौपीन पहनते हैं। ये लोग यज्ञोपवीत । है। जिस वालकके यज्ञोपवीत हो गया है, वह तीन बार अथवा अलङ्कारादिका ध्यवहार नहीं करते। किन्तु सभी | सन्ध्योपासन करता है। ललाटमें जातीय तिलक धारण करते हैं। उनके हाथमें इन लोगोंमें वाल्यविवाह प्रचलित है। पालकोंका उडा और पैरमें खड़ा रहता है। माधवनाहाणों में से २० यपके भीतर और बालिकाओंका ४से ११ वर्पके पालविधवायें भी किसी प्रकारका गलङ्कारादि नहीं भीतर विवाह होता है। अर्थके लोभसे माता-पिता पहनती। ६०७० वर्षके वृढ़े साथ कन्याका वियाह देनेसे भी पुरुष और स्त्री दोनों ही शरीरकी शोभा बढानेके | बाज नहीं आते। लिये अलङ्कार पहनते हैं। जो धनी हैं उनके पैरके भूषण- . कन्याका पिता ही पहले वरकी तलाश करता है।' को लोड़ कर और सभी भूपण सोने, मणिमुक्ताफे होते | घर मिल जाने पर कन्याका पिता घरके पिताके पास Fol, XPII. 97