पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/४४१

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पान सूर्यको किरण आती है, उसमें बहुतसे छोटे छोटे अणु | सरसोंका एक जौ, २ जीका एक गुंजा, ३ गुजेका एक दिखाई देते हैं, उसी एक अणुको ध्वंसी कहते हैं। छः । बल्ल, ८ रत्तोका एक माशा (कहीं कहीं ७ रत्तीका) 'ध्य'सीको एक मरीचि, छः मरीचिकी एक राजिका, तोन | ४ माशेका एक शान, ६ माशेका एक गद्यान, १० माशेका राजिकाको एक सरसों, आठ सरसीका पक जौ, चार एक कप, ४ कप का एक पल, १० शानका एक पल जीका एक गुक्षा ( रत्ती), छः रत्तीका एक माण, और ४ पलका एक कुड़व होता है । प्रस्थादि करके (पर्याय-हेम और घामक ) चार माशेका एक शान | अन्यान्य सभो मान पूर्ववत् है। मान शब्दसे मालाका (दूसरा नाम धरण और टङ्क), दो शानका एक कोल भी योघ होता है। मात्राका कोई निर्दिष्ट नियम नहीं (पर्याय-अ द्र, वटक और क्षण), दो कोलका एक है। काल, अग्नि, घल, याक्रम, प्रकृति, दोप और देश 'कर्ष (पाणिमानिक, पोड़शिका, फरमध्य, हंसपद, आदि विषयोंका विचार कर मालाका प्रयोग करना होता अक्ष, पिचु, पाणितल, किञ्चितपाणि, तिन्दुक, विडाल । है । उपयुक्त मालासे कम या वेशी औषधका प्रयोग करने. पदक, हंसपद, सुवर्ण, कवडग्रह और उडम्बर, ये सब से कोई फल नहीं। जिस प्रकार धधकती हुई आगमें के पर्याय हैं), दो कर्पका एक अर्द्ध पल (पर्याय-- थोडा जल डालनेसे वह नहीं बुझती उसी प्रकार कठिन । शुक्ति और अष्टमिका), दो अर्द्ध पलका एक पल (पर्याय- रोगमें फम भोपध देनेसे रोगको शान्ति नहीं होती। मुष्टिमात्र, चतुर्थिका, प्रकुञ्च, पोडशो और विल्व ), दो फिर जिस प्रकार खेतमें अपरिमित जल होनेसे फसल- पलकी एक प्रमृनि, दो प्रसूतिको एक अंगुलि (पर्याय-1 की नुकसानी होती है उसी प्रकार सामान्य रोगों पुड़य, अर्द्ध शराय और भष्टमान), दो कुड्य या अंगुलि ! अधिक औषधका प्रयोग करनेसे रोग घटता नहीं, बढ़ता को एक माणिका ( पर्याय-शराय और भएपल ), दो ही जाता है। (भावप्रकाश मानपरिभाषा ) परिमाणं देखो। शरायका एक प्रस्थ, चार प्रस्थ या ६४ पलका एक आढ़क २ सङ्गीत-शास्त्रानुसार जहां तालका विराम होता .(पर्याय--भाजन, कस और पाल), चार आढ़कका एक! है, उसे मान कहते हैं। यह मान चार प्रकारका है, द्रोण (पर्याय--कलश, लल्यण, अर्मण, उन्मान, घट और सम, विषम, मतीत और अनागत। (सङ्गीतशास्त्र) राशि ), दो द्रोण या ६४ शरावका एक सूप (कुम्भ), (पु.) मन्यते युध्यतेऽनेन इति मन घम् । ३ चित्त दो सूप को एक द्रोणी, चार द्रोणी या ४०६६ पल (५१२ को समुन्नति, अभिमान, शेखी, धनादिके कारण किसी लेर)-को एक खारी, दो हजार पलका एक भार और विषयमें यह समझना, कि हमारे समान कोई भी ...एक सौ पलको एक तुला होती है । नही है। माशा, टड्डू, अक्ष, यिल्य, कुड़व, प्रस्थ, आढ़क, राशि, द्वषं दम्भञ्च मानञ्च क्रोधं तैष्णश्च वर्जयेत् । द्रोणी और पारी यह पक दूसरेसे यथाक्रम चार गुना (मनु ४१६३) भारी है अर्थात् माशासे टङ्क, टङ्कसे अक्ष आदि। द्वेष, दम्भ, मान तथा क्रोधादिका परित्याग करना _ 'मागधपरिभाषा-चरकके मतसे ६ रत्तीका एक ही उचित है। 'यात्मनि पूज्यता बुदिर्मानः" ( नीलकण्ठ) माशा, २४ रत्तीका एक टड्डु, १६ रत्तीका एक कर्ष और अपनेको श्रेष्ठ समझनेका नाम मान है। सुश्रुतके मतसे ५ रत्तीका एक माशा, २० रत्तीका एक "अतिद हता लक्षा अतिमाने च कौरवाः।" टङ्क और ८० रत्तीका एक कप होता है। (चाणक्य,) • कालिङ्गपरिभाषा-८ रत्तीका १ माशा, ३२ रत्तीका अत्यन्त मानसे कौरव भी विनष्ट हुए थे। १ रङ्क, ढाई र अर्थात् ८० रत्तीका एक कपं होता है। । न्यायदर्शनके अनुसार जो गुण अपनेमें न हो, उसे · कालिझमान । कलिकालमें मनुष्य मन्दाग्नियुक्त, भ्रमसे अपनेमें समझ कर उसके कारण दूसरोंसे अपने खर्व काय और सत्त्वगुणविहीन होते हैं। अतएव उसी. आपको श्रेष्ठ समझना मान कहलाता है। ...... के अनुसार मानका प्रयोग करना उचित है । १२ सफेद । ४ पुराणानुसार पुष्कर द्वीपके एक पर्वतका नाम