पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/४४५

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३८६ मानव-मानतुङ्ग मानकवि-चरखारोके रहनेवाले एक बन्दीजन। ये , मालवराजको 'भक्तामर-स्तवन' सुना कर प्रसन्न किया विक्रमशाह बुन्देला राजा चरखारीके दरवारमें थे। था। भट्टिभर' प्रारम्भसूचक स्तोत्र भी उसीकी रचना मानकवि-पक कवि। ये वैसवारेके रहनेवाले ब्राह्मण , है। प्रभावक चरितमें मानतुङ्गका वरित सविस्तार थे। इनका जन्म संवत् १८१८में हुआ था। इन्होंने लिखा है, किन्तु उनमेसे कितने किंवदन्ती और अनैति- कृष्णकल्लोल नामक एक ग्रन्थ वन या और कृष्णखएडका हासिक वातोंसे पूर्ण है। वाराणसीमे हर्पराजको सभामें अनेक छन्दोमें भाषा किया। इस प्रन्यमें इन्होंने कई वाण और मयरक साथ .मानतुङ्गका तर्फयुद्ध चला था। राजाओंको वंशावली भी दी है। यही विवरण बहुत बढ़ा चढ़ा कर प्रभारचरितमें लिखा मानत ( सं नि० ) सम्मानजनक । गया है। भाषाकल्पसूत्रके मतसे मानतुङ्गका भक्तामर- मानकोट-शिवालिक पर्वतके अन्तर्गत एक छोटा सामंत स्तयन ८०० विक्रम सम्बत्में रचा गया। किन्तु उज. राज्य । सम्राट अकबर शाहने ६६४ हिजरीमें इस यिनोसे १०३६ सम्वन्में उत्कीर्ण मालवराज वाक्पतिकी नगर पर चढ़ाई कर राजा भक्तमल्लको परास्त किया था। जो शिलालिपि पाई गई है उसमें मालवराजाओंकी मानकोड़ा ( स० सी०) सूदनके अनुसार एक प्रकारका तालिका इस प्रकार है,-१म कृष्णराज, २य चैरसिंह, छन्द । ३य सियक, ४र्थ अमोघवर्ष वा वाक्पति । (१०३६ स०) मानक्षति (स स्त्रो०) मान हानि । ____ मानतुङ्गरचित परिग्रहप्रमाण-प्रकरण और द्वादशवत. मानगांव-१ वम्बई प्रदेशके कोलावा जिलान्तर्गत एक निरूपण नामक दो मागधी ग्रन्थ पाये जाते हैं । जो कुछ उपविभाग। भू-परिमाण ३५३ वर्गमील है। हो, उनके भक्तामरस्तोत्र और भयहरस्तोत्रका जैन- ____२ उक उपविभागके अन्तर्गत एक बड़ा गांव । यह ! पण्डित समाजमें बहुत आदर है । १३६५ सभ्यत्मे जिन- प्रसिद्ध राजगददुर्गसे १५ मील दूर पड़ता है। यहां डाक- | प्रभसूरिने भयहरस्तोत्रकी तथा शान्तिसूरिने भक्तामर घर, महकमेकी कचहरी आदि हैं। स्तोत्रको एक एक टोका लिखी थी। मानगृह ( स० पु० ) रूठ कर बैठनेका स्थान, कोपभवन । ३ सिद्धजयन्तीचरित्रके रचयिता। उनके शिप्य मलय- मानन्धि ( स० पु०) मानस्य प्रन्धिरिख बाधकत्वात् ।। प्रभने १२६० सम्यत्में सिद्धजयन्तीचरित्रकी टोका रची ११ अपराध, जुर्म । २ अभिमानवर्द्धन। है। मलयप्रभने अपने गुरफे सम्बन्धमें लिखा है, कि मानचित्र ( पु.) किसी स्थानका बना हुआ नकशा, प्राग्वाट (पोवार)-वंशसे वट वा वृहद्गच्छ उत्पन्न हुथा। जैसे ऐशियाका मानचित्र । इस गच्छमें सर्वदेवने आचार्य-पद लाभ किया । सर्वदेव- मानज ( स० पु०) १ क्रोध, गुस्सा। (पु०) २ मानसे | के शिष्य जयसिंह, जयसिंहके शिष्य चन्द्रप्रभ, धर्मघोप उत्पन्न। और शीलगण थे। इन्हों तोनोंसे पूर्णिमागच्छ उत्पन्न मानतर ( स० पु०) पर्पटक, खेतपापड़ा। हुआ। मानतुङ्गने शीलगणसे दीक्षा ली। उनको एक मानतस (स अध्य०) मान पक्षम्याः सप्तम्या या तसिल। और शिष्यका नाम प्रद्युम्नसरि था। इन्ही प्रद्यु ग्नने , मानसे या मान विषयमें। १२६२ सम्वत्में हेमचन्द्र के योगशास्त्रविवरण नामक मानता (हि.स्त्री०) मनौती, मन्नत । प्रन्थके शेपमें लिखा है, कि मानदेव, मानतुङ्ग और बुद्धि- मानतुङ्ग ( स० पु०) इस नोमके एकसे अधिक जैनाचार्य | सागर ये तीनों ही चन्द्रफुलमें प्रधान आचार्य थे। उक्त और जैनप्रन्थों के नाम मिलते हैं, यथा-१ शातवाहन- | मन्थके शेपमें २य मानतुङ्गकी गुरुपरम्परा इस प्रकार राजके समसामयिक एक आचार्य। २मालयके चौलुक्य- लिखी है,- राज पयरसिंहका एक मन्त्री, जैन-श्वेताम्बरोंका तपा- धुद्धिसागर, पीछे प्रद्युम्नसूरि, प्रद्युम्नके वाद देव गच्छ फुलोद्भय । तपागच्छ-पट्टावलीसे जाना है, कि ] चन्द्र, देवचन्द्रफे बाद मानदेव और पूर्णचन्द्र और सबसे उसने घाराणसी धाममें वाण और मयूरके कूइफसे मुग्ध । अन्तमें मानदेवके शिष्य मानतुड़ हुए।. Vol. Xv.1. 98