पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/४५३

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मानवतत्व • एक दुर्श य या अज्ञय सम्बन्ध है। भूतत्व-विद्या या । उंगलीके सङ्केत ( इशारे )से दिखा रही है, कि विशाल. पदार्थ विद्या जीवविज्ञानका सोपानयत् मार्ग है। काय सर्प ( शेषनाग ), कच्छप आदि लीलाक्षेत्रमें वसु. "प्राच्य मंतसे-प्रकृति और तद्विकार बुद्धि, मन, इन्द्रिय ! धराके विशालवक्ष पर मानव शिशुका पदचिह नहीं है। और भूत-ये दृश्य और भोग्य हैं। प्रकृतिके साहाय्य भिन्न भिन युगमें जिन्होंने जोर धरित्रीको लोलाभूमिसे विना पुरुषको जानना असम्भव है। प्रकृतिको उपा- अरसर ग्रहण कर इह जीवलीलाकी समाप्ति की है, भूत. सना द्वारा ही पुरुपका अनुसन्धान करना होगा, जड़- धात्रो धरिखोने मातृस्नेहको प्रेरणासे उनको यत्नपूर्वक विज्ञानसे ही जीव विज्ञानका परिचय मिलता है। इसी अपने हृदय में रखा है। उन समप्र तत्वोंकी पर्यालोचना कर लिये भगवान् कपिलने मुक्तकण्ठसे प्रकृतिदेवांकी स्तुति और भूगर्भस्थित मनुष्योंकी आदि अयस्थाको व्यवहृत की है ।पयोंकि प्रकृति विना पुरुपके नहीं रहतो । वस्तुओंके नमूनों को देख पाश्चात्य प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक विश्वजगत् केवल जाप्रतिका कार्य नहीं-जगत्के उच्चस्यरसे चिल्ला रहे हैं, कि बहुत सुनतम प्राणी, विवत्त प्रत्येक गणुमें पुरुष और प्रकृतिका युगलरूप विद्यमान के अनन्त आवत्त में परिवर्तित हो कर और नमामि । पुरुष भीर प्रकृति एक ब्रह्मकी ही दो मूर्तियां हैं। व्यक्तिको शक्तिसे मार्जित हो कर क्रमशः उन्नत प्रकृति के यही वेदमे भी कहा गया है। वैज्ञानिकोंने जड़देहमें , जोय और अन्तमें मनुष्यरूपमें परिणत हुआ है। इस चैतन्यका अस्फुट स्फुरन माना है । इसलिये जड़विज्ञान । असंख्य प्रधिमय जोयशृङ्खलाका मनुष्य हो उच्चतम को साहाय्य लिये विना जीवविज्ञानको उच्चतम श्रेणीमे प्रीथि (गांठ) है। इन सब विपर्याको पर्यालोचना कर समारूढ़ मानवतत्वका रूप किस तरह निर्णय होगा। मानबके यथार्थ तस्यको जानना हो मानवतत्त्वका 07 : प्राच्यमतका विवरण सृष्टितत्त्वमें देखो।। उद्देश्य है।। पाश्चात्य मतमें समाभिव्यक्तिवादको मित्ति नैसर्गिक ____ शारीर-विज्ञान के साथ सायन्ध। . . नियमों.पर ही स्थित है। पहले-शरीर विज्ञानसे मनुष्य विभिन्न जोयोंके शरीरोंके अवयवोंके जानकार रोगको गठन भौर क्रियांकी बात जानी जा सकती है। पण्डितोंने मनुष्य के साथ अन्य जीवोंके सादृश्य-निरूपण- "मनोविज्ञानसे मानवको मानसिक क्रिया और शारीरिक के लिये अग्रसर हो कर सम्पूर्ण रूपसे अस्थिसमूहकी मियाके साथ मानसिक क्रिपाका सम्बन्ध मालूम किया परोक्षा कर उल्लासके साथ यह स्वीकार किया है, ठठरियों जाता है। वागविज्ञान या शब्दविज्ञानसे भिन्न भिन्न | (कङ्काल )के सादृश्यमें मनुष्य अनन्त शृङ्खलावद्ध जीव- भापतित्त्वक गूढ़ रहस्योंका पता चलता है। नीतिविनान- जगत्का ऊतन शृङ्गलमाथि है। इस नियममें मनुपसे से मनुष्यकी स्वेच्छामणोदित कार्यावलीको समालोचना) तिर्यग जातिका सम्बन्ध अविच्छिन्न है । केवल अस्थि. 'द्वारा मनुप्यके प्रति मनुष्यका कर्त्तव्य स्थिर किया जाता संस्थानके साद्दश्यसै सन्तुष्ट न हो कर उन्होंने शरीर- हैं। समाजविज्ञान द्वारा भिन्न भिन्न समाजको मानव । यन्त्रके क्रियाकलापकी भी पर्यालोचना को है। उसमें जातिको सामाजिक प्रतिष्ठा, शिल्प और विज्ञानको उत्पत्ति देखा गया है, कि मनुष्पके साथ इतर जीवको विशेष परिपुष्टि, उसे विषयमें विद पुरुषका विश्वास और | भिन्नता नहीं। अध्यापक ओयन (Owen ) कहते हैं,- मन्तव्य तथा विभिन्न समाजकी रोतिनोतिको मालो-1 बन्दरके सामने के दोनों पैरोंसे मनुष्य के दोनों हाधीका चना की जा सकती हैं। भूविद्या और प्रनतत्य भूस्तर | विकाश दिखाई देता है । बन्दरोंके हाथको गपेक्षा 'स्थित प्रस्तरीभूत जीवको उठरियों और अन्यान्य छिद्रों! : गरिला (Gorilla ) के हाथ बहुत कुछ फौशल सम्पन्न को देख कर अनुमानमें न आनेवाले दश हजार वर्ष | है.1. चन्दरों के शरीर पर अधिक रोमावली रहने पूर्व के पृथ्वीके विवरणको बताता है । 'पृथ्वोके प्राचीन- | कारण ही मनुष्यको तुलनामें इतना अधिक वाहावैषम्य तम अधिवासियोंके विवरणको संग्रह करनेमें अतीत हुआ है। फिर भी मनुप्यके साथ बन्दरफे पाहावैपस्य साक्षी इतिहास जहां निर्वाक है, यहां भूततत्सविद्या, कुछ होने पर दोनोंके भन्तर्जगत्में, दोनोंके मानसक्षेत्र में Tol. ITII. 100