पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/४५४

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३१८ मानस्तत्व जो विषम सादृश्य है. उसे कल्पगापथमें लाने पर अन्तर्मुच करने पर भी और विमिस विधान में मनुष्य दोनोको एक जीयको दूसरी भाषा कहने की प्रवृत्ति नही सम्पकीय सभी तरयोंफे उपादान रहने पर भी मानय. दोती। इसके उत्तरमै हकसली का कहना है, पर तत्यकी एक सीमा निर्दिष्ट है। मनुष्य के शारीरिक भोर । मनुष्य-समाजफे माय इस समय के सम्म मनुष्य समाज. मानसिक प्रति तथा यमुन्धराफे विशाल यसमें मानय. की तुलना करने पर जो पाथफा दिग्नाई देता है, उसोमे के प्रथम पाविर्भावसे अब तरफे मानवजातिके इतिहास . इम विषयको मोमांसा हो सकता है। मनुष्य शरीरके की पोलोचना करना मानवतसका उद्देश्य है। अस्यिसंस्थानका पर्यवेक्षण कर परोपकारसके पण्डितो. ___तिर्यग जातिके साथ गनुष्यका सम्बन्ध (मोयन और हकमली )ने स्थिर किया है, कि मनुष्य मानयतत्त्व शास्त्र के प्रथम प्रणेता दार पिकाईने और यन्दरमें विशेष कना नहीं। मनुष्य और वन्दरमें मनुष्यके साथ इतर प्राणियों के शारीरिक सादृश्य और वाहुत सामीण है। किसी किसी विषयमें पृथकता प्राकृतिक येसादृश्यको आलोचना कर कहा है, कि यह दिखाई देने पर मो नर वानरफे अस्थि संस्थान में अनेक अतीत समयकी बात है कि मनुष्य साधारण जोपका मामाइश्य है। अत्यन्त पढ़े हुए आयतनयाले गरिले. देहमान धारण कर विश्यरटिके गूढ़ रहस्यका अनु- का मस्तिष्क कमसे कम २० औंस (२० छटांक) और सन्धान करता है। विकास प्रारम्भिक अवस्थाके मनुष्यके मस्तिष्कका मनोविशनको समानता। पान ३२ ओम १६ छक) होता है। किन्तु गरिलेका माणितत्त्वयि पण्डित मनोविज्ञान विभागके मायतन मनुष्यको अपेक्षा अधिक है। शारीरिक प्रतिफ ! अनुसार मनुष्यको जीयजगत्के साथ तुलना करने पर कारण गरिला मनुष्यको निकटका हो जीव है, इसमें जरा | पड़ी हो गहराडोमें पड़ गये हैं। किस तरह माय एटिके मोसन्देह नदी। अद्यतन जोय गरिलेसे मनुष्यको मानसिक उन्नतिका प्रायितत्व-विपक-श्रेणीविभाग। अनन्त पैचित्रा दिखाई दिया इसको ध्यान रखने किसी प्राणितत्वयिम् पण्डिनने स्थिर किया है, कि पर मनुष्यको कमो भी जोयसृष्टिको विकाशलाका मनुष्य शारीरिक और मानसिक प्रगतिमें तिर्यग जातिम उपतम जीय न कह सम्पूर्ण रूपसे नई सरदके प्राणो सम्पूर्णतः विभिन्न प्रकृतिका जीय है। किन्तु हम समय- कहा जा सकता है। ऐसा कहनेको प्रति नहीं होतो, फे प्राणियिद पाएएन एक स्वरसे इसी पातफा समर्थन कि यह अनन्त वैषम्प सामान्य देदिक गठन पर दो कर रहे है। उनका कहना है कि यिभिन्न जातिफे। अपलम्बित है। इन्द्रियकी अनुमय-शचिौ किसी किसी यन्दरों में जिननायिषय विभेद दिखाई देता उतना । यातने मनुष्य तिर्यगनातिसे पराजित हो जाता है। अपूर्ण मनुष्यसे पूर्ण गरोलेमें नहीं। फिर भी पोकोदरदर्शनोरि और कुत्तों को प्राण-शकि मौंको प्राणितस्य पण्डिाने बन्दरों की श्रेणोंमें ही (घनेको शक्ति ) मनुष्यके पूर्ण विकशित इन्द्रिय. मन्तपिनिष्ट किया है। हमलो इसी युकिसे प्राणिनिकोमपेक्षा अधिक बलवती होने पर मी मनुष्य सस्य विषयक दिमागमें मनुश्यको उराम श्रेणीका सोय भनुमयमै बहुत बड़ा बढ़ा हुआ है, यद सर्यया स्वीकार कहना चाइमें हैं। तियंग सानियों में पुद्रियत्ति और समानयोति गएकुट रूपसे रहने पर भी मनुष्य हो, करना होगा। मानयिक-कात्ति। उसका पूर्ण विकास दिनाई देता । मानसिक उत्कर्षफे विषयौ, तियंग जातिके साथ मनुष्य विशाल काप दापोंके शरीरफे सामने एक मनुष्यका जो पिरम पापप दियाई देता शारीर छोटा जीय तथा सिंद या वाय मुकाबले में बहुलदी पिकानफे साथ सुम्ममा परने पर उतना पार्यपय दिसा कममोर दोने पर भी फेयल युनिपलसे मानेको मुर. मदों देना। शित रस प्रतियाग्दिता करता है। प्रतिके मापसमाम

जोदो, मिन मित्र म्यता विहानको मानयतरपमें, में मनुष्य किसी समय पति होने पर भी प्रतिके