पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/४५७

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मानवतत्व ४.१ 'वित जीका ( Brocn ) के जातिचित्र में दिखाई देता रहता है। किसी जातिका नाश हो रहा है, तो कोई जाति है। यह देख विभिन्न जातियोंके वर्णचित्रकी अच्छी अपना विस्तार कर रही है। देशको प्राकृतिक या नैस- तरह परीक्षा को जा सकती है। गिक नियमोंके साथ उस देशको जातिका सामञ्जस्य या . २ केशका गठन-केशकै वर्णकी अपेक्षा गठन-प्रणालो सङ्गति न रहनेसे घे जातियां शीत ही विलुप्त हो जाती और साज बहुत अंशमे जातिकी विभिन्नता प्रदर्शित हैं। इसी तरह पृथ्वीको अतीत जातियां विलुप्तप्राय हो करती है। अनुवीक्षण यन्त्र द्वारा केशके फटे हुए भागकी गई है। कोई ज्ञाति उद्यमशील है, कोई शोधशील, परीक्षा करने पर इस विषयका सुस्पष्ट प्रमाण मिलता है। फिर कोई लजाशील, कोई समाजप्रिय, कोई जाति- . ३ अवयव और अङ्गसौटव-गठनप्रणाली और अङ्ग निर्जनताप्रिय हैं-इत्यादि जातीयवैचिला जातिविशेषके सौष्ठव जातिचिहका एक प्रधान अङ्ग है। किन्तु अवयव तारतम्य निर्धारणके लिये उपाय बतानेवाले हैं। सिवा संस्थानका कोई सार्वभौमिक नियम नहीं। इसके जातीय रितके चिहका अवलम्बन ले कर जाति- . ४ कपालको आकृति या मस्तकका गठन जाति- का निरूपण होता है। विविध जातियों का संघर्ष कभी विभागका चतुर्थाङ्ग है। वर्ण वैचित्राके नीचे ही कपालके कभी विजित जातियों के अनिष्टका कारण बन जाता है। गठनको स्थान देना उचित है। कपालके सूक्ष्मतत्त्वके जातिविभागका साधारण नियम। निर्धारणमें बहुतेरे शारोरतत्त्वज्ञ पाश्चात्य पण्डितोंने पूरी सभी जातियों में ही कुछ न कुछ विशेषत्व रहता है। चेष्टा की थी। उनमें ब्लूमेनवाक ( Blumenbach), ! यही देख कर उनके अवान्तरके भेदका निर्णय किया जा रेजियम (Regius), भन्ठ्यार ( Non Bear ), पेलकर : सकता है। भाकृति या प्रकृतिगत चैपम्य ही जाति- ( Velker) डेविस (Davis), योका ( Broka), वास्क) निर्णयका मूलसूत्र है। ( Buslk ), लुके ( Lucae ) आदि मनुष्यों का नाम केटिलेट (Quetelete ) मायने जातिके संशानिर्देश उल्लेखयोग्य है। इसी तरह अष्ट्रेलिया-वासियों तथा करनेमे विज्ञानसे काम लिया है। उन्होंने प्रत्येक जाति- याशियोंकी सुच्यन-चिबुकास्थि, यूरोपियोंके चिबुकको ! में उच्चताका निरूपण कर उसीको उस जातिको उताफा अपेक्षा विशेषरूपसे विभक्त है। कपालविद पण्डितोंने आदर्श वताया है। उन्होंने सिवा इसके अन्य किसी कपाल तन्त्रके विषयमें बहुतेरे अविष्कार किया है। प्राच्य विशेष गुणका अवलम्बन, अर्थात् आकृति, वर्ण, मार हिन्दू शास्त्रों में भी कपाल गठनके तारतम्यके निर्धारणमें । आदिको भी आदर्श यतलाया है। ५२ प्रकारफे उपाय निर्दिष्ट हैं। जातिकी सहरता। ५ मुखाकृति--मनुष्योंके समस्त शरीर थिच्छिन्न विविध जातियोको मिलावरसे ये हिसाब सडर करने पर भी एकमात्र मुखाययय देख कर जाति विचार | जातिको उत्पत्ति हो रही है। दो भिन्न भिन्न जातियों किया जा सकता है। मुखाकृतिके साधर्म्य और वैधा-! को मिलावटसे कितनी तरहको सडरता होती है, उसके को देख कर मनुष्यको जातिका निर्णय सहज हो हो। निर्णय करनेमें हाक्सिली सावने बहुत प्रयत्न किया है। सकता है। उनमें नासिकाका गठन और गालका स्थान केवल प्रयत ही नहीं, वरं उन्होंने सफलता भी. पाई है। गोष्ठाघरकी भाति और नेत्र गठन पर हो विशेष ध्यान । उनका कहना है, कि हटेण्टेट जाति मूलजाति नहीं है। देना चाहिये । मुखका पार्थपर ही जातीय चिहका प्रधान ! चुशमेन और निग्रो जाति ( इयशी) की मिलावटसे, यह • उपादान है। । सडूर जाति और दक्षिण यरोपवासी मिश्रयर्णके ( गोरे ६ धानुवैचित्र्य या प्रकृति -( Constitution ) और और कालेको मिलावटसे उत्पन्न वर्ण) लोग सभी गोरे, चरित्र-मनुष्यजीवनका जीवन वृत्त जलवायुके प्रभावसे । उत्तर यूरोपवासी और दक्षिण-पशियाखएडवासी जातियों- भौर देशकै प्रभावसे बहुत गोंमें परिवर्तित हुआ करता के सम्मेलनसे उत्पन्न है। है। देशमेदसे शरीर सामध्य का भो न्यूनाधिक होता . इस मानवतत्त्यशास्त्रका मूल उद्देश्य है, कि वह ' Voin AII. 101