पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/४८

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. . . मसूद ( सिपा-सलार.) : ... . . . . असल नाम आला उद्दौला था। पिताको मृत्युके याद . १२ वर्ष की उमरमें मसूदने रायलफे अधीश्वर सातु.. मसूद १६ वर्ष राज्य फरके १११४ ई०में परलोकको गानको हराया और सपरियार फैद किया। सुलतान सिधारे। महमूदके सोमनाथ-माममण काल में सलार मसूद भी मसूद (सिपा-सलार)-गजनीफे एक मुसलमान साधु ।। वहां गये थे। उन्होंने मन्दिरको भनेक देयदेवीको ये इस्लाम-धर्मको प्रतिष्ठा करने में प्राणत्याग करके सर्व मूर्तियोंको तोड़ फोड़ कर स्वधर्ममें विशेष आस्था दिख- साधारणके पूज्य हो गये हैं। उत्तर-पश्चिम भारतके लाई थी। बहराइच जिलेमें इनका समाधि-मन्दिर विद्यमान है। इस प्रकार मसूर धीरे धीरे मह मूदके प्रियभाजन हो यह मुसलमानों के निकट एक पवित्र तीर्थ समझा गये। यह देख कर उनके यजीर म्याजा इसान मेमन्दीके . जाता है। भारत वर्षके पठान और मुगल-यादशाह यहां हृदयमें हिसानल प्रज्वलित हो उठा। ये अपने कर्तव्य मा कर समाधिके ऊपर पहुमूल्य वस्तु चढ़ाते थे। सुल. कार्यमें उदासीनता दिखलाने ठगे जिससे राज्य भरमें . तान फिरोजशाह १३१४ ई०में मसूदका कनिस्तान देखने | अशान्ति फैल गई। महमूदने जय देखा कि यजीरको आये थे। संतुष्ट रखे यिना राजकार्य सुचाररूपसे चलना मुश्किल ___ अबदर रहमान चिस्तीफे बनाये हुए 'मोरट-इ-मसूदी' है, तब उन्होंने - सराल मसूदको .यहांसे हटा देना हो प्रन्यमें इनकी जोधनी लिली गई है। उक्त मन्य पढ़नेसे अच्छा समझा। तदनुसार सलार मसूदको कुछ दिनके मालूम होता है, फि धर्मात्मा मसूद सुलतान सबुक्तगीन- लिये पिताके पास रहनेको आशा हुई। यहांसे विदा के अधीन नौकरी करते थे। कुछ दिन बाद वे धर्मराज्यके | होते समय घे बड़े दुःखित थे. किन्तु सुलतानका प्रेम कर्मचारी हुए। गजनीपति सुलतान महमूदके आदेशा- उनके प्रति अक्षुण्ण धा. . .. नुसार सेनापति सलार शाह मुजाफर खांको सहायतामें सेनापति सलार शाह यह खबर पाते. ही फाघुल भारतवर्ष आये। उनको स्त्री सितारमुसुल्ला भी उनके नगरसे स्त्री समेत मसूदके शिविर में उपस्थित हुए। साथ आई थी। अजमीर नगरमें (४०५ हिजरी) सितार- मसूदको देखते हो उनको आखें उपया आई और उन्हें मुमुल्लाके गर्भसे सलार मसूदका जन्म हुआ। पालक ) अपने साथ रहनेका अनुरोध किया, किन्तु मसूद राजी' मसूदका सौन्दर्य और शरीरका लक्षणादि देख्न फर सयों न हुए। उन्होंने मुदक्ष सेना और कुछ पारिषद्को ने अनुमान किया था कि यह भविश्यमें एक असाधारण साथ ले भारतवर्षको और कदम बढ़ाया। सिन्धुनदीके प्रतिभाशाली पुरुप होगा। किनारे पहुंच कर मसूदने अपने सदवमिसे २ अमीरको सुलतान महमूद बालक मसूदको मनोहर मूर्ति देख | ५० हजार घुइसबार सेना ले फर सिन्धुनदीके दूसरे कर बडे. प्रसन्न हुए थे। यहां तक कि उन्होंने मूल्यवान् । पारफे देश जोतनेका हुकुम दिया। तदनुसार दोनों .. फपडे. और रत अलङ्कारादि भी जन्मोत्सवमें वितरण अमोर सिन्धुनदी पार कर गये और यहां के राजा भजुगा। फिपे थे। जव मसूदको उमर ४ वर्ष ४ मास ४ दिनकी रायके प्रासादको ध्वंस कर पांच लाख खर्णमुदाफे साथ हुई, तब यह मीर सैयद इयादिमफे पास पढ़ने मेजा मसूदफे समोप हाजिर हुए। अनन्तर मसूद बलबल गया। मसूदको ऐसी अस्वाभाविक धीशक्ति थी, कि समेत सिन्धुनदो पार कर उसोके किनारे छापनी पाल वर्ष की उमरमें हो उसने सब विद्या सोस ली। अनन्तर फर रहने लगे। यहां उनका अधिकांश समय भारखेटमें १० वर्ग में घे अपना सारा समय चरकी माराधनामें | घ्यतोत होता था .. विताने लगे। धीरे धीरे घे सभी विषयों में सुदक्ष हो। इसके बाद ये मुलतान नगर पहुंचे। यह नगर मद गपे । उनका चरित बिलकुल निर्मल था, कलङ्क लेशमात मूदफे आझमणसे मलियाभेट हो गया था। किन्तु इसके भी न था। पाप उनकी देसको ने नहीं पाया था। उनको पहले ही उक्त नगरके अधिपति राय मनुन और मना. पयित आत्मा सदाभ्यरफे ध्यानमें निमग्न रहती थो।। पाल मसूदफे निकट दुत मेत चुके थे। दूतने भाकर