पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५२०

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मारवाड़ी पारि विवरण दिया गया है ) देता है। दूसरे दिन घर कन्या । यहां किसी देवताको पाठ वाचने जाया करता है। और ससुराग्में पाये हुए उपढ़ीकनको ले कर उसो समा-| मध्याहमें अपने अपने घर आकर फिर स्नान कर रोहसे घर लौट आता है। मकानके चौकमें या आंगनमें वैश्वदेव आदि नित्यनैमित्तिक' किया करते हैं। सात पात क्रमसे · वर-कन्याके सामने रखे भोजन के बाद कोई कोई एक आध घण्टा विधाम करते जाते हैं। पर अपनी तलवारसे 'एक "एक" पालको | हैं। कोई कोई देवस्त्रोत्र पढ़ा करते हैं। इसके बाद फिर , हरा देता है । इसके बाद गङ्गा और शीतलादेवीको पूजा | यह यजमानोंके यहां जाते है । सन्ध्या समय घर लौट की जाती और घर-कन्याका कंकण छुहाया जाता है। कर ये सन्ध्या ' आदि किया करते हैं। "..... ..' ___ मृतप्राय व्यक्तिको घरके वाहर ला कर सुलाते हैं। - इनमें 'स्मा और भागवत 'दोनों 'मतके लोग देखे . जहां सुलाते हैं, वहां पहले गोवरसे लोप लेते हैं । मृत्युः। जाते हैं। शिलांसप्तमी, अक्षय तृतीया, दशहरा, पोप. . . फे. पादामृतकके लिये पिण्डदान और शवदाह करते हैं। संक्रान्ति, घसन्तपञ्चमी 'हो कई इनके प्रधान पर्व है। : अन्त्येटिकियाको पद्धति उच्चवंशीय हिन्दुओं की तरह है।। ये शुक्लपक्षीय एकादशी, चतुर्दशी,' रामनवमी, गोकुला. मारवाड़ी (हि.पु०१ मारवाड़ देशका निवासी २ एमी, गणेश चतुर्थों और शिवरात्रिके उपलक्षमें उपवास मारवाड़ देशकी भाषा ।' (वि० ३ मारवाड़ देशका, करते हैं। कोई तो पाक्षिक चान्द्रायणवत करते हैं और मारवाड़देश-सम्बन्धी । ' . .. .! । स्वश्रेणीसे ही अपना पुरोहित नियुक्त कर लेते हैं। मारवाड़ी-ब्राह्मण-महाराष्ट्रवासी एक श्रेणोफे ब्राह्मण'। स्मात सम्प्रदायके एक द्राविड़ ब्राह्मण इनके प्रधान ये पञ्चगौड़के मन्तभुक्त हैं। मारवाड़ देशमें इनके पूर्व- आचार्य हैं । शृङ्गेरी-मंठ के शङ्कराचार्य इनके धर्मगुरु है। पुरुषोंका यास था। इसलिये सपनेकों ये मारवाड़ी पेसोलह संस्कारों में गर्भाधानको छोड़ सभीको पालन ब्राह्मण कहा करते हैं। ये अपनेको पड़जातीय कह कर | : फरते हैं। बालकको ८ वर्षकी उम्र में "यज्ञोपवीत . भो अपना परिचय देते हैं। दापन, गुजर, 'गीड़, सार संस्कार और २१ वर्षकी उम्र में विवाह संस्कार हो जाता खत, रण्डेलवाल, गौड़ पारिका और शिखांवाल यही । । है। सदास कन्याओं का आठसे १५ वर्ष के भीतर विवाह पड़जाति हैं। इनमें परस्पर खान-पान रहने पर भी पर होता हैा. अशीचकाल केवल दश दिन रहता है। स्पर विवाह प्रचलित नहीं है। इनके नाम मारवाड़ियों- समाज-विधिक विरुद्धाचरण करनेवाला पञ्चायतसे की तरह ही होते हैं।., मारवाड़ियोंके पौरोहित्य करते दण्ड पाता है। पालक सोलह वर्ष तक विद्यालयमें करते इनको, चाल-ढाल वेषभूपा मारवाड़ी-सी हो गई शिक्षा पाते हैं। इसके बाद पैतृक 'यजनादि किया करते है। ये प्रायः तीन:सौ वर्षों से मारवाड़ देशमें रहते आये | : हैं। इनको यजमानी-त्ति हो प्रधान जोविका है। हैं। इनमे भरद्वाज, काश्यप, वशिष्ठ और पत्स 'चार | मारवों (सस्रो०) संगीतको एक माता ...' .. गोत्र देखे जाते हैं। सगोत्र-वियाह प्रचलित नहीं है। मारवीज ( स० क्लो०) मन्त्रधिशेष, एक प्रकारका मन्त्र ।

, तिरुपतिके यायाजी, सूर्यनारायण और देवी इनके मारात्मक ( त्रि०) मा आत्मा यस्य, कप। १

प्रधान उपास्य देवता हैं। यह एकाहारी, सभी निरामिप-हिना २ खलसभाये, दुष्ट। '३ सांघातिक, प्राणनाशक'। भोजी, या जातिच्युतिके भयसे कोई भी मदिरा मांसका मारामिभु'('स. पु०) मार अभि भयति मार अभिभू सेवन नहीं कर सकते। गेह और याजड़े को रोटी और युद्धदेव, मारजित।" : .. ... . दाल.घोफे साथ.रोज भोजन करते हैं। भात भी कमी मारामार र हि वि० कि०) १'अत्यन्त शीघ्रतासे, बहुत कभी खाते हैं सही, किन्तु उसमें दिना चीनी और घो। जल्दी । २ मारपीट देखो।' : . . " दिपेनहीं खाते। ये नित्य सयेरे उठ कर गंडास्नान मारीरिनारीरजसो०) गन्धक

फर अपने इष्ट देवताको पूजा फर; यजमानोंके यहाँ मारि(संखो०) मार्यते इति मृ-णिघाइन् । १ मारण, पञ्चाङ्ग सुनाने जाया करते हैं। कोई अपने यजमानके मार डालना, वध करना।२ जनमय, मरो रोगी । -nigm.. . ...... ..: Fer . -.- manarmus- ,