पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५२५

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मार्कटि-पाण्ड ४६ मार्कटि (संपु०) मंकट का गोवापर। किया गया है। इसमें शिवलिङ्ग स्थापित हैं। यह मार्फण्ड ( ०) कण्डोरपत्यं मृकण्ड-अण् । मार्क मन्दिर कब बनाया गया था, इसका कोई लिपि. पयेय मुनि । वद्ध प्रमाण नहीं मिलता। नागपुर और येरार. मार्कण्ड (मार्कण्डेयार्क)-१ मारा जिलेका सौरतो. प्रातके मन्दिरोंके सम्बन्धमें जैसी कहावत प्रचलित है, 'भेद। यह भारासे '३७ मोल' दक्षिण-पश्चिममें अय. ' 'यहाँके मन्दिरोंको सम्बन्ध भी ठीक चैसी ही है। कहते स्थित है। उक्त स्थानके नामानुसार प्रसिद्ध विहार । है, ये सभी मन्दिर एक रातमें ही हेमाडपरग द्वारा 'के शाकद्वीपी ब्राह्मणों को एक विभाग । बनाये गये थे। भाण्डकसे कामो तक सभी मार्कण्ड-दरभंगा, पूर्णिमा, सपाल परगना तथा भागल। मन्दिर हेमाइपन्थके हो बनाये हुए हैं। हेमाडपन्य 'पुर आदि स्थानों में रहनेवालो कपिजीवी एक जाति । के ग्राह्मणके पुत्र थे। गौडराज लक्ष्मणसेन इस जातिके लोग ग्बेती करके अपनी जीविका चलाते और 'इनका जन्मवृत्तान्त भो प्रायः एक ही तरह है। कहते हैं, कि मार्कण्डेय मुनिसे इनकी उत्पत्ति हुई है. है। प्रसववेदना होने पर हेमाइपन्यकी माताने देवा, किसी मााणका जूठा खानेसे मार्कण्डेय जातिच्युत कि इस समय यदि लड़का भूमिष्ट होगा, तो अशुभ हुए थे। उसी समयसे उनके वंशधर मार्कण्ड कहलाने । योगळं पड़ेगा। यह देख दासियोंको उन्होंने हुक्म दिया, लगे हैं। ; .. .... . । फि प्रसवको रोकने के लिये तुम लोग यत्न करो। उनके इनमें वाल्यविनगद तथा 'बहुविवाहका प्रचलन है। -हुक्मके मुताविक उनके दोनों पैर रस्ती बांध कर सर विधवा दूसरो वार मनमाने पति से व्याद कर सस्ती है। नीचे और पैर ऊपर करके टांग दिया। शुभ लग्न माने पर . . यदि कोई सोध्यमिचारिणी हो जाय तो वह जातिसे दाइयांने उनको बन्धनमुक्त कर पूर्वपत् सुला दिया। निकाल' दी जाती है। ... . . लेटते हो हेमाडपन्यका जन्म हुमा । किन्तु माता यच न {" मार्कएंडोंका यांचार व्यवहार कट्टर हिन्दू-सा नहीं है। सकी। शुमलग्नजात हेमाइ (हमादि) शुक्लपक्षीय शशिधर- बड़े बड़े देवपूजनमें ये ब्राह्मणको पुरोहित नियुक्त करते को तरह बढ़ने लगे और थोड़े दो समयमें सब शास्त्रों में हैं। ग्राह्मणं उनको पुरोहिताई करनेसे निन्दाभाजन नहीं। सुपण्डित हो उठे । विशेषतः चिकित्साशास्त्र में उनकी प्रगाढ़ होते।। : : .. ... .. व्युत्पत्ति हुई । विमीषण जब बीमार हुए थे, तय हेमाड़ने . सामाजिक मर्यादासे घे ग्याले और कुर्मियोंके सम- हो उनको मच्छा किया था। उस समय पुरस्कारस्वरूप 'कक्ष हैं । ब्राह्मण उनके हाथका जल तथा मिठाई आदि उनको एक वर मिला था। उसी वरसे उन्होंने राक्षसों- प्रहण करते हैं। . . ! ।। की सहायतासे गोदापरीके वोचमें इन मन्दिरों का निर्माण मार्कण्ड-नागपुरसे १० मील दक्षिण-पूर्व कोण पर किया था। पे मन्दिर १७६ फीट लम्बे और ११८ फोट घेणावती नदोके किनारे पर बसा एक प्रसिद्ध तीर्थ- चौड़े हैं। चारों ओरसे चहारदीवारी दी हुई है। मंदिर स्थान। यहां बहुसंख्यक मन्दिर शैलभूमि पर श्रेणीवद्ध । देखने में बहुन सुन्दर हैं । योचमें मार्कण्डेयका मन्दिर है। मावसे खड़े हैं। यहांके सबसे बड़े मन्दिरका नोम | इस मन्दिरके चारों ओर श्रेणीपद्धमायमें अन्यान्य मंदिर मार्फएड है । मन्दिरफे नीचे नदीका जल केवल दो फीट खड़े हैं। मन्दिरोंका निर्माण परिपाटी देखनेसे मादम • गहरा है। नाय आदिके विना नदीको पार कर सकते हैं। होता है, कि ये १०यों या १४वों शताब्दीके बने हुए हैं। निकटफे गौवका नाम माफएडी है। बहुत पहले यहां दक्षिण और प्रधान प्रवेशद्वार तथा अगल बगल एक 'जनाकोणं नगर था। वारंवार वाद मानेके कारण यहां एक ओर दरयाजा है । मन्दिरफे भेतर १२ तरहके शिय. 'के लोग बाहर चले गये हैं। . . . . . लिङ्ग प्रतिष्ठित हैं। सिवा इनफे दशावतार आदि देव- । मार्कण्डेय मुनिके नाम पर हो इस मन्दिरका नाम: मूत्तियां भी हैं। . . . करण हुआ है। किन्तु मन्दिर शियके नाम पर उत्सर्ग {- “मार्फएडेय भूपिका मान्दर ही सबसे बड़ा है और ol. xvll. 118 da