पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५२६

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४७० पार्कण्डिक-मार्कण्डेय कासकार्य सम्पन्न है। दो सौ वर्ष पहले एक वज्राघातसे | "चिरजोयो यथा त्वं भो भविष्यामि , तथा मुने। :: मन्दिरका शिखर टूट गया है। . .... - रूपवान वित्तवा चैव. भिया युक्तच सर्वदा॥ , . , . - शिवलिङ्गका ऊपरो भाग पोतलसे मढ़ा हुआ है ।या | मार्कपडेय महाभाग ससकल्पान्तजीवन। .. ... यो कहिये, कि शिवलिङ्गको मुफुट पहनाया गया है। ... थायुरिष्टार्थसिध्यर्थ मस्माकं वरदो भव ॥" . (सिथितत्त्व) : मुकुट के चारों ओर पांच नरमुण्ड धीर. ऊपरमें फण । मार्कण्डेयपुराणमें मार्कण्डेयका उत्पत्ति विवरण इस उठाये नागका चन्द्राताप है। .... . प्रकार लिखा है.-महात्मा भगके ख्याति smar . बाकी मन्दिरको निर्माण-प्रणाली खजूराहुफे मन्दिर और विधाता नामक दो पुत्र हुए। ये दोनों ही देवता आदिकी तरह है।. दो फीट तीन इञ्च लम्यो खोदित | थे। नारायणकी पत्नी श्री भी इसी -सपातिके गर्भसे मनुष्य मूर्ति चारों ओर थेणीबद्ध खड़ी है। प्रत्येक उत्पन्न हुई थीं। मेरुके दो कन्या थी; मामति और श्रेणीमें ४५ मूर्तियों के हिसायसे तीन श्रेणियों में १३५ / नियति । पाता और वि ताने दोनोंका पाणिग्रहण मनुष्यमूर्ति है। मनुष्य श्रेणीके बाद हस श्रेणी, फिर किया था । यथासमय आयतिके प्राण और नियतिके धन्दर श्रेणो, इसके बाद चार श्रेणीमें मनुष्य-मूर्ति खड़ी मृकण्ड नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। मुकटुकी स्त्रीका - है। वास्तवमें मन्दिरको सम्मुम्न भाग नाना प्रकारके | नाम,मनस्विनी.था। इन्हों मनस्विनके गर्भसे मार्कण्डेयने भास्करशिल्पसे सजा हुआ है। किसी किसो स्थानमें | जन्म लिया। इनकी स्त्रीका नाम धूमावती और पुत्रका नर्तकियोंकी मूर्तियां खोदी गई हैं। फिर कहीं घोणावादन | वेदशिरा था । . ( मार्कपडेयपु :५२ भ० ): ..... .. परायण अलङ्कार भूपिता सीमन्तनियोंकी मूर्तियां ।' नरसिंहपुराणमें लिखा है, कि भृगुके , एक पुत्र थे। शिल्पियों के निर्माणनैपुण्यका साक्ष्य प्रदान कर रही है। मृकण्डु उनका नाम था। मृण्डफे मार्कण्डेय नामक. शिवमूर्तिका प्रशान्त भाव सर्वत्र ही परिस्फुट है। एक पुत्र हुआ। पुत्रके उत्पन्न होते ही मुफण्डको मालूम समरांगणमें रोदरसको अभिव्यक्तिमं घसन्त पुष्पाभरण | हो गया, कि इस पुत्रको वारहवें घर्षमें मृत्यु होगी। इस विलोलनयना गौरीके साथ प्रेमालापके कमनीय भावमें | पर वे बड़े दुःखित हुए। एक दिन मार्कण्डेपने अपने सर्वत्र हो शियका प्रशान्त गाम्मोर्ग. रक्षित हुआ है। पितासे उनके दुःखका कारण पूछा। पिताने उनकी सिवा इसके नन्दिकेश्वर, 'मृत्युञ्जय, यम, उमा महेश्वर, मृत्युका हाल जैसा सुना था, कह सुनाया। मार्कण्डेयने राजराजेश्वर आदि मन्दिर भी विशेषरूपसे उल्लेख- पितासे कहा, 'आप इसके लिये जरा मी चिन्ता न करें, नीय है। . . . . . . . . . : मैं अपने पाहुवलसे मृत्युको परास्त कर : चिरजीवी हो माण्डिका ( स० स्त्री०) भूम्याहुल्य, भूईखखसाघल्ली।। सकता। पोछे मार्कण्डेय पिता और मातांको आश्या. मार्कण्डीय (सलो०) भूम्याहुल्य, भूईखनसावल्ली।। सन देकर तपस्याफे लिपे जंगल चले गये। यहां विष्णु- मार्पण्डेय (सं० पु०) मृकण्डोरपत्यं, मृकण्ड (शुभ्रादि. मूर्तिको प्रतिष्ठा करके कठोर तपस्या करने लगे। इस भ्यश्च 1पा १११२३ ) इति ढक् । मृकण्डु मुनिके पुत्र । तपोवलसे ये सत्यको परास्त कर चिरजीवी हो गये। जन्मतिथि और संस्करादि कार्य में इनकी पूजा करनी . ... . . . . . . (नरम्हिपु०) होती है। गर्भाधानादि संस्कारकाय में पष्ठीपूजाके वाद ! पद्मपुराणमें लिखा है-महामुनि मृकपडु सस्त्रीक मार्कण्डेय पूजा की जाती है। इनका ध्यान इस प्रकार है- तपस्या कर रहे थे। इसी समय उनके मार्कण्डेय "द्विभुज जटिलं सौम्य सुवृद्ध चिरजीविनम् । नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्रको पाठ वर्षे मृत्यु

' मार्कपडेय नरो भक्त्या पूजयये चिरायुपन् ।' - " होगी, यह उन्हें अच्छी तरह मालूम था। इसलिये

..' :.":.

(तिथितत्त्व) पुत्रको यहोपवीत दे कर मृकण्डने कहा, 'तुम ऋषियोंकी

इस ध्यानसे विधिपूर्वक पूजा करके निम्नोक मन्त्र | अभिवादन करो। माफएडेय पैसा ही करने लग बारा प्रार्थना करनी होती है। प्रार्थनामन्त्र इस प्रकार है- गपे। इसी समय सप्तर्षि यहां पहुंचे मार्कएढे यने उनकी