पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५२७

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मार्कण्डेय कवीन्द्र-माकपलो ४७५ अच्छी सेवर्टिहल को। जाते समय 'तुम चिरायु हो' 'समय मार्कपलोको उमर १५ वर्षकी थो। दो वर्ष बाद ' कह कर ऋपियोंने इन्हें आशीर्वाद दिया। किन्तु जब मार्कपलो और एक पुरोहितको साथ ले चे भ्रमणमें उन्हें मालूम हुआ, कि बालकको आयु थोड़ी है, तव चे . निकले। पुरोहितने पोपको पनादि दे कर उन सबोंका उसे ले कर ब्रह्माके पास गये। ब्रह्माके घरसे ब्रह्माकी साथ छोड़ दिया। एकरसे ले कर सिरिया उपकूलं परमायुफे समान इनकी आयु हुई । माईण्डेय इस प्रकार : भागमें उन्होंने तीन वर्ष तक भ्रमण किया। पोछे वाग. 'दीर्घायुः लाभ कर अपने घरको लौटे । इनके विषयमें दाद और हमुंज होते हुए वे फर्मान, खोरासन, वालस ऐसा प्रसिद्ध है कि ये अब तक जीवित हैं और रहेंगे। और पदकसान तक गये। बदकसानमें मार्कपलो वीमार - मार्कण्डेपेन प्रोक्त मण । २ पुराणविशेष, मार्कण्डेय पड़ा जिससे उन्हें यहां बहुत दिन तफ ठहरना पड़ा था। पुराण। यह अठारह महापुराणों में सातयां महापुराण वदाक्मानसे वे कच और श्रीकोल हदको पार कर पमोर है। पहले स्वयम्भुने मार्कण्डेयको जो उपदेश दिया था उपत्यकामें पहुंचे। यहांसें काशगर, यारकन्द और उसीको ले कर यह पुराण आरम्म किया गया है। यह खोटान होते हुए एशियाको गोयो मरुभूमि पार पर पुराणं पढ़ने या सुननेसे आयु द्धि और सभी कामनायें : चीनदेशके उत्तर-पश्चिममें आये। सिद्ध होती तथा समस्त पाप जाते रहते हैं। विपसे चीनदेशकी चहारदीवारी घुसने पर कुखला खका बचने के लिये घर घर जो चण्डी पाठ होता है यह इसी कर्मचारी उनके समीप आया। उस समय फुबला पाँ पुराणके अन्तर्गत है। पुराया देखो। । चहारदीयारोले ५० मोल उत्तर सांट नगरमें राज्य करते ., नाड़ोपरीक्षाके प्रणेता। थे। पीछे पिता-पुत्र पिकिन नगरमें थाये। मार्फपलोको मार्कण्डेय कवीन्द्र-प्राकृतसपस्वके रचयिता। उमर उस समय २१ वर्ष थी। ये थोड़े ही समयमै चीन- मार्कण्डेयंचूर्ण (सं० पु०) ओपविशेष । प्रस्तुत प्रणालो भाषा सीख कर चीन-सम्राट्फे प्रियपात्र हो गये। पीछे पारा, गंधक, हिंगुल, सुहागेका लावा, लिकंटु, जायफल, २६ वर्ष तक यहां रह कर मार्कपलोने बहुतसे राजकीय लवङ्ग, तेजपत्र, इलायची, चितामूल, मोथा, गजेपीपल, तथा उच्च कर्मचारीके कार्ण भी किये थे। राजकन्याके सोंड, अतिवला, अवरक, प्रयका फूल, अतीस, सहि- साथ तातारवंशीय पारस्वराजकुमारका वियाह सिर जनका घीया, मोचरस और अफीम प्रत्येक एक पल ले | हुआ था-मार्क पलो राजकन्याफे रक्षकरूपमें पारस्यदेश कर अच्छी तरह चूर्ण करे। इसोका नाम मार्कण्डेय- गये थे। उन्होंने एक बार और यूनानमदेश होते हुए चूर्ण है। चीनीके साथ प्रतिदिन १ माया सेवन करने सीमान्त-प्रदेशकी यात्रा की । पीछे धे कोटिलान्तर्गत सं संपदणी-रोग आरोग्य होता है। काराकोरम नगरमें पहुंचे। यहांसे भारत महासागरके ... .......(भपज्यरत्नावली ग्रहणयधिकार ) सुमात्रा द्वीपमें जलपथसे रवाना हुए । कुवला सांके मार्कपलो. एक प्रसिद्ध पर्याटक । भिनिस नगरके किसो | भतीजे अर्गान सांके विवाह के लिये एक सर्याङ्गसुन्दरी संम्रान्त वंशमें इनका जन्म हुआ था। निकलो और कन्याको तलाशमें मार्फपलोको मुगल-देश भी जाना पड़ा माथु नामक दो भाई थे। कुस्तुनतुनिया और क्रिमिया | था। इनके पहले सुमाता नोपका हाल किसीको भी उनका पाणिज्यकेन्द्र था। उन्होंने १२५४ ई में मिनिस- मालूम नहीं था. मार्क पली १२६५६० में मिनिस लौटे। का परित्याग कर पूर्वकी यात्रा की। १२६० ई०में थे | अनन्तर १२६८ ई०में फुर्जलाकी लड़ाईमें ये कैद किये कुस्तुनवनियाको छोड़ कर योपारा होते हुए कुबल खाँ- गये। खदेश लौट कर इन्होंने अपना भ्रमणवृत्तान्त हाय. • के राज्य में गये। कुयल खाने उन दोनोंको पोपके निकर से लिस्त्र कर जनसाधारणमें प्रकाशित किया। जेनोधा. दूत बना कर भेजा। तदनुसार वे १२५६ ई० एकर यासी राष्टिजिया नामक एक व्यक्तिने सबसे पहले इनके "मगरमें पहुचे। निकलोने वहां जा कर देखा, कि उनको | अपूर्व भ्रमणत्तान्तको . लिपिवद्ध कर जनसमाजमें . सी-पुत्र मार्कपलोको छोड़ परलोक सिधार गई है । उस ! प्रनार किया। यह वृत्तान्त १३२०६०को लारिन-भाशमें